साहित्य और समाज: शुद्धता, व्याकरण, अच्छी भाषा, बुरी भाषा

साहित्य अपने आप में इतिहास है, मनोविज्ञान है, पत्रकारिता है, धर्मग्रंथ है। इस बात को समझिए और भाषा को सिर्फ कम्यूनिकेशन का माध्यम मत बनाईए, ये उससे कहीं ज़्यादा बड़ी बात है।

जौन एलिया: बेतकल्लुफ़ी से गहरे सवाल पूछने वाला शायर

ज़िंदगी का ख़ालीपन, होने ना होने का उहापोह, आने-जाने की बेचैनी, किसी के ज़िंदगी में रहने या ना रहने की बेख़बर, एक बौखलाहट जीवन और जीने के ढर्रे को लेकर, ख़्यालों की एक बेतरतीबी कि कहीं प्रेमिका के होंठ काटने के मंसूबे और कहीं लाखों बोसे ले लो, मैं नहीं गिनता का एटीट्यूड, ये सब जौन की एक किताब में ही दिख जाता है।

साहित्य में एनकोडिंग होती है, होनी चाहिए, नहीं कर पा रहे तो मत लिखिए

जो लेखक कल्पना को, भावनाओं को, अपने समय और पात्रों के चिंतन में गूँथता है, उसको डीकोड करने के लिए आपको इतिहास, मनोविज्ञान दोनों की समझ होनी चाहिए।

विश्व रंगमंच दिवस: जीवन की नाटकीयता और छिछले संवाद

हमारी पूरी ज़िंदगी दूसरे के जैसा बनने में, दूसरों के पास की चीज़ों को पाने में, दूसरों के विचार अपने नाम करके बोलने में, और दूसरों की सफल ज़िंदगी का पीछा करने में बीत जाती है। हमारा अपना क्या है, हम कौन हैं, इस सवाल का उत्तर बहुत कम लोग दे पाएँगे।

भन्ते! वही प्रेम है

लेकिन,
प्रेम शायद मिनैण्डर का रथ है
जिसके अवयवों को नागसेन ने
अलग-अलग हटाकर पूछा था,
“महाराज! क्या ये रथ है?”
“क्या ये रथ है?”
“क्या ये रथ है?”

पुस्तक समीक्षा: प्रवीण झा रचित ‘चमनलाल की डायरी’

सपाट, भावहीन शैली जहाँ लेखक कहीं एकदम से बाहर है कथानक से, तो कहीं अपनी टिप्पणी करता दिख जाता है। ड्रामा आपको ख़ुद फ़ील करना होगा, लेखक ने उसके लिए कोई कोशिश नहीं की है।

आपके पास दो गायें हैं: कम्यूनिज्म, सोशलिज्म, कैपिटलिज्म, फासिज्म

आपके पास दो गायें हैं। आप लाल सलाम कहते हुए गायों को काट देते हैं और हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए सड़कों पर ‘बीफ़ ईटिंग फेस्टिवल’ मनाते हैं।

NSFW: एकांकी: हमको चाहिए आजादी

अगर सुबह बताएगी तो हमारे कामरेड सब तो ‘विक्टिम शेमिंग’ में आगे रहते ही हैं। फिर बाबा लोग समझा देंगे कि एक बलात्कार पीड़िता को ये पितृसत्तात्मक समाज कैसे देखता है। शर्म के मारे मर जाएगी। फिर भी नहीं मानेगी तो उसको रंडी बनाकर बदनाम कर देंगे…

मातृभाषा दिवस पर ठेठी में फेसबुक लाइव: बोलियों को बचाईए, उन्हें बोलिए, लजाईए मत

उनके लिए जो मैथिली और ठेठी भाषा समझ सकते हैं। इसमें मैंने बात की है कि मातृभाषा (जो भी हो) उसको बचाना क्यों ज़रूरी है। कैसे उसे बचाया जाय।