अनुष्का को निकाल दें तो ‘सुई-धागा’ एक सपाट फ़िल्म है

इसके औसत होने की ज़िम्मेदारी पटकथा लिखने वाले और निर्देशक को लेनी चाहिए। इन दोनों जगहों पर फ़िल्म औंधे मुँह गिरी। इस फ़िल्म में पति-पत्नी के इस संघर्ष को दर्शक हिस्सों में, कहीं-कहीं, महसूस कर पाता है, जब कहानी भावनात्मक स्तर पर कभी-कभार आपको छू जाती हो।

फ़िल्म समीक्षा: विवेकशील निर्देशक बताता है कि ‘स्त्री’ की कहानी स्त्री की कहानी है

वेश्या के प्रेम की बात, उसकी शादी की बात और फिर गाँववालों द्वारा एक तरह की ऑनर किलिंग की बात को, उसी गाँव के कुछ बच्चे जो अगली पीढ़ी के हैं, संवेदना के साथ सुनते हैं और सकारात्मकता के साथ चर्चा करते हैं कि जो हुआ वो गलत था। ये एक अच्छी कहानी और निर्देशन का द्योतक है।

‘गोल्ड’ एक औसत दर्जे की फ़िल्म है

बात यह है कि हर फ़िल्म चालीस दिन में आप नहीं बना सकते। आपको एक बेहतर फ़िल्म के लिए शूटिंग पर जाने के पहले भी कई महीने लग सकते हैं। आप नकली मूँछ चिपकाकर और ‘एक’ को ‘ऐक’ बोलकर बंगाली नहीं बन सकते।

‘सेकरेड गेम्स’ एक बोरिंग, प्रेडिक्टेबल और दोहराव वाली सीरीज़ है

समीक्षकों को अनुराग कश्यप, नवाज़ुद्दीन और राधिका आप्टे का नाम सुनकर ही चरमसुख प्राप्त होने लगता है। मतलब ये है कि ये लोग कहीं भी हों तो ऐसे चिरकुट समीक्षकों को लगता है कि एक मार्टिन स्कॉर्सेजी है, दूसरा जैक निकॉल्सन और तीसरी मेरिल स्ट्रीप। जबकि ये लोग उनकी एक बहुत बुरी फ़ोटोकॉपी भी नहीं कहे जा सकते।

‘अवेन्जर्स: इनफ़िनिटी वार’ एक दर वाहियात फ़िल्म है, पायरेटेड भी न देखें!

ये आपको भावनात्मक स्तर पर कहीं से नहीं छूती क्योंकि मानवों के होने के बावजूद ये देश, दुनिया, ग्रह, नक्षत्र, सौर परिवार, गेलेक्सी बचाते-बचाते मानवों की समझ के हद से बाहर चले गए हैं।

लिप्सटिक वाले सपने: हर रोज़ी का द्वंद्व, सब के होंठ गुलाबी हैं, सब बुर्क़े में क़ैद

सबका नाम रोज़ी है। सब के होंठ गुलाबी हैं, सब बुर्क़े में क़ैद है। सबको बाहर पंख फैलाने है। सबका अपना आकाश है। सबके पंखों का रंग अलग है।

सचिन: अ बिलियन ड्रीम्स: अपर क्लास हिन्दू मेल ब्राह्मण का फ़र्ज़ी ग्लोरिफिकेशन

मैं उनमें से नहीं हूँ जो हॉलीवुड डायरेक्टर का नाम या फ़िल्म का कंटेंट देखकर समीक्षा कर दूँ। समीक्षा तो पहले ही मेरे दिमाग़ में हो चुकी होती है, फ़िल्म तो बस टाइमपास होती है।

दंगल देखिए, और फ़र्ज़ी फ़ेमिनिज़्म की चरस मत बोईए

ये जीवटता और जुनून की कहानी है जो बाप के हृदय से उतर कर बेटियों की बाँहों के द्वारा जी ली जाती है। इसे देखिए क्योंकि इसे देखना चाहिए।

ये फ़िल्म धोनी का वर्ल्ड कप वाला छक्का है, कितना भी देखो, मन नहीं भरता

लाजवाब एक्टिंग, बेहतरीन निर्देशन, कसी हुई कहानी और अच्छी एडिटिंग के कारण ये फ़िल्म आप धोनी के वर्ल्ड कप फ़ाइनल के छक्के की तरह बार बार देखना चाहेंगे, देखेंगे, और चाहेंगे कि फिर से देखूँ।

पिंक कोई बेहतरीन फ़िल्म नहीं है, फिर भी देखना सबको चाहिए

कॉलेज के लड़कों को ख़ासकर देखनी चाहिए और अमिताभ के हर डायलॉग को अपने अंदर उतारना चाहिए कि लड़की तुम्हारे बाप की जायदाद नहीं है, वो हँसे, दस के साथ रहे, मिनी स्कर्ट पहने, तुमसे हँसकर बात करे, चाहे वो तुम्हारी गर्लफ़्रेंड ही क्यों ना हो, उसकी सहमति के बग़ैर उसको छूना भी ग़लत है।