कर्णाटक चुनाव: जब अनैतिक लोग नैतिकता की आशा करने लगें तो समझो ग़ज़ल हुई

आप जो माँग रहे हैं वो धूर्तता है। आपकी बेचैनी दिखती है क्योंकि आप जिस विचारधारा को पालते रहे हैं, उसकी सारी मक्कारी जनता पकड़ रही है। आपकी मक्कारी हमारे जैसे लोग पकड़ रहे हैं क्योंकि आपको विकास या आदर्श से कोई लेना-देना नहीं है। आप कार के पीछे भागते गली के वो कुत्ते हैं जिसे ये भी नहीं पता कि उसे कार से उतरकर आदमी पूछ ले कि क्यों भौंक रहा है तो वो क्या जवाब देगा। और तो और, उसे दो बार पुचकारकर बिस्किट फेंक देगा तो वो कार में बैठकर पैर चाटता उसके घर पहुँच जाएगा।

रवीश जी का हर झूठ टायटेनियम है, उसकी ढाल बनाकर उनको कैप्टन भारत बन जाना चाहिए

जब आपको मोदी लगता है कि बातों को छुपा रहा है, तो क्या उसके विपक्ष में खड़े हर नेता की रैली में आदर्श लोग आदर्श बातें कर रहे हैं जिनका कुर्ता पूरा सफ़ेद है?

पत्रकारिता के गिरते स्तर में ज़्यादा ज़िम्मेदारी किसकी?

मीडिया का काम सत्ता की आलोचना तक ही सीमित नहीं है। मीडिया का एक काम सूचना पहुँचाना है, और एक काम विवेचना है। विवेचना और चर्चा सिर्फ नाकामियाँ और खोट गिनाने के लिए नहीं होती, न ही सिर्फ हर बात को देवत्व के स्तर पर ले जाकर बताने के लिए होती है। जहाँ सत्ता सही कर रही है, जिस अनुपात में कर रही है, उसी अनुपात में आलोचना और विवेचना होनी चाहिए।

भारत के हिन्दुओ, प्रोपेगेंडा का जवाब देना कब सीखोगे?

ये एक अघोषित युद्ध है, और मैं अपने धर्म को त्रिशूल में लिपटे कॉन्डोम और लिंग में घुसे भगवा झंडे के स्तर तक गिरता नहीं देखना चाहता।

प्राइवेसी एक पब्लिक विषयवस्तु है, आप इंटरनेट पर हैं तो नंगे हैं

जब सारे नाइट टॉक शो होस्ट हर रात ट्रम्प के ख़िलाफ़ विषवमन कर रहे थे, और आज भी करते हैं, तब लोग प्रभावित नहीं हो रहे थे? क्यों? क्योंकि वो सोशल मीडिया नहीं है! जब फ़ॉक्स न्यूज़ को छोड़कर बाकी के अधिकतर न्यूज़ चैनल पैनल डिस्कशन और चर्चाओं में ट्रम्प को खुल्लमखुल्ला आड़े हाथों लेते थे तब क्या वोटर इन्फ्लूएन्स नहीं हो रहा था? मतलब मेमस्ट्रीम मीडिया स्टूडियो से कैम्पेनिंग करे तो ठीक, यहाँ आपकी पब्लिक में रखी बातें कोई ले रहा है तो आप बवाल कर रहे हैं!

प्रिय रवीश जी, पत्रकारिता के आलोकनाथ मत बनिए

आप स्टूडियो में बैठे वो दंगाई हैं जो शब्दों से दंगे करवा सकता है। आप बार-बार अपनी बातों को साबित न कर पाने की स्थिति में ऐसे तर्क रखते हैं जिन्हें सत्यापित करना नामुमकिन है। जैसे कि ‘भाजपा के राज में लोगों को बल मिल रहा है’। ये कैसे नाप लें कि लोगों को बल मिल रहा है? लोग पागल हो रहे हैं तो सरकार कैसे ज़िम्मेदार है?

नालायक वामपंथियों पर तर्क के हमले होते हैं तो वो ‘महान विचारों’ के पनाह में छुपता है

चूँकि ये सत्ता में नहीं हैं तो जो सत्ता में है वो हिटलर और ज़ार हो जाता है। चूँकि ये अपनी बातों से जनता को वोट करने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते तो ‘आर्म्ड रेबेलियन’ जायज़ हो जाता है। चूँकि तुम्हारा मैनिफ़ेस्टो बकवास है इसलिए ग़रीबी एक हिंसा है, जो कि किसी दूसरे ग़रीब को काट देने के बराबर वाली हिंसा के समकक्ष हो जाती है।

प्राइम टाइम: नीरव मोदी कांड में फ़ेसबुकिया विश्लेषकों की गट फीलिंग का दम्भ देखने लायक है

आप ये किस बिना पर मान लेते हैं कि आप ही सही हैं, और आपके पास सिवाय चार आर्टिकल्स के कोट करने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो कम से कम जाँच एजेंसियों के बयान तो हैं? आपने कहाँ से जाँच करवाई? अंदेशे, संदेह, और इस बात पर कि आपको ऐसा लगता है? या इस बात पर इसमें मोदी शामिल न हो ये हो ही नहीं सकता?

अंकित की मौत ऑनर किलिंग नहीं, मुसलमानों द्वारा की गई नृशंस हत्या है

मैं उस मुसलमान से क्यों न डरूँ जो चंदन, नारंग, पुजारी, रवीन्द्र, अंकित की भीड़ हत्या पर चुप रहता है और अखलाख तथा जुनैद पर फेसबुक पर दिन में दस पोस्ट डालता है ये कहते हुए कि वो बहुत डरा हुआ है?