अमरनाथ यात्रा: ड्राइवर सलीम आदमी है, उसको मुसलमान और हीरो मत बनाओ

मैं ये इसलिए मानता हूँ क्योंकि अगर वो जिहादी होता तो बस से कूदकर भाग जाता और बस को घाटी में गिरने को छोड़ देता। उससे तो ज्यादा हिन्दू मरते, और आतंकियों की गोली भी कम ख़र्च होती। जन्नत में बहत्तर गुणा हूरें मिलती पैकेज डील में सो अलग!

अगर गाय सिर्फ खाने की चीज़ है तो ‘हर मुसलमान आतंकवादी है’ भी सही है

ऐसे विरोधों का फ़्रंट जुनैद होता है, और पोस्टर पर मोदी, ब्राह्मणवाद, मनुस्मृति से लेकर तमाम बातें दिखती हैं।

लिंचिस्तान इज़ द न्यू इन्टॉलरेंस: सीट से मीट से बीफ़ तक, बात वही, नैरेटिव नया

ये जुनैद की माँ के आँसू, अखलाख के ख़ून, वेमुला के शब्दों की ताप पर रोटियाँ सेकते हैं।

घृणा की खेती करते फेसबुकिया बुद्धिजीवी की फ़र्ज़ी संवेदना

आप ये जताने की भरपूर कोशिश में हैं कि सरकारों ने ‘मॉब लिंचिंग’ का कोई कोर्स शुरु किया है जहाँ से प्लेसमेंट हो रहा है।

वामपंथी सूअरों, पिगलेट्स को पहचानिए, फिर कीचड़ में उतार कर भाग जाईए

ऐसे लोगों को लगता है कि गाँजा पीकर वो बॉब मारले हो जाएँगे, और सिगरेट (चूँकि सिगार पी नहीं सकते) पीकर चे ग्वेरा।

बिहार छात्र-दुर्दशा पर आश्चर्य क्यों?

ग़रीबी के कारण सरकारी स्कूलों में अटके बच्चे, जहाँ के शिक्षकों को सैलरी आठ महीने में मिलती है, क्या पढ़ाई करेंगे? उनके सिर्फ फ़ॉर्म भरे जाते हैं।

मुद्दा नंबर छः: स्वास्थ्य में हम वहाँ हैं जहाँ से हमको कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

जब तक नयी सोच के साथ रोडमैप बनाकर आगे नहीं बढ़ा जाएगा तब तक लोकलुभावन ‘जेनेरिक दवाई’ और फलाने दवाईयों के मूल्य कम कर देने वाली बातों के लॉलीपॉप से कुछ ख़ास नहीं होने वाला। नेशनल हेल्थ पॉलिसी एक जुमला बनकर रह जाएगी और देश का पैसा, समय और जानें बर्बाद होती रहेंगी।

केरल में सरेआम काटी गई गाय, हाय-हाय, हाय-हाय, हाय-हाय

लेकिन हिन्दू चुप रहेगा। क्योंकि ये साइंटिफ़िक नहीं है। गाय कट रही है, जानवर कट रहा है। मूर्ति पूजना मूर्खता है, पत्थर चूमना साइंटिफ़िक है।

मुद्दा नंबर पाँच: रोजगार जिसके आँकड़े 2012 के बाद से अपडेट नहीं हुए

60% इंजीनियरों के पास नौकरी नहीं है। 93% एमबीए वाले नौकरी के लायक नहीं हैं। उनके पास बस डिग्री है, किसी काम के नहीं हैं।