रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।

काहे बे चूतिये, राम काहे शर्मिंदा होंगे?

अल्लाहु अकबर कहकर बम फोड़ने वालों पर अल्लाह को तो शर्मिंदा होते नहीं सुना! तुम जैसे लिब्रांडुओं को कहते और लिखते सुना और देखा कि ये असली मुसलमान नहीं है। फिर अभी कौन सा कीड़ा पिछवाड़े में घुस जाता है कि सौ लोगों की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती दिख जाती है?

चुनावी दौर में खेल परसेप्शन मैनुफ़ैक्चरिंग का है

बाकी समय दलित, अल्पसंख्यक, दंगाई सब गाँव में घुइयाँ की खेती में व्यस्त रहते हैं। चुनाव आते ही अचानक से कोई किसी को पीट देता है, किसी को मार देता है, कहीं दंगा हो जाता है।

उत्तराखंड मेडिकल कॉलेज फीस कांड: क्या मेडिकल की पढ़ाई इतनी सस्ती है?

विरोध इस बात से है कि जब सरकारों को और भी सरकारी कॉलेज खोलना चाहिए तो वो वैसा न करके, स्वास्थ्य और शिक्षा का बजट घटाकर, निजी संस्थानों को बढ़ावा दे रहे हैं। हर व्यक्ति न तो इतना पैसा देने में सक्षम है, न ही लोन लेने में। लोन लेने की प्रक्रिया इतनी भयावह है कि ग़रीबों को शिक्षा संबंधित लोन मिल भी नहीं पाता।

असम में 50 लाख बंग्लादेशियों की शिनाख़्त पूरी, मीडिया के मातम का इंतज़ार करें

कहानी शुरु होगी कि नूर के छः बच्चे हैं, पति मर चुका है, और उसका कहना है कि वो हमेशा से असम में ही रहे हैं। उसके बेटे को ग़ालिब बहुत पसंद है, और वो कविता करता है।

दंगों का दौर शुरु हो गया है, कमर-पेटी बाँध लीजिए

ये सच्चाई है कि पहले जो समाज हिंसक नहीं था, उसे अब हिंसक बनाया जा रहा है, या वो खुद ही एक का तुष्टीकरण देखकर हिंसक प्रवृति दिखाने लगे हैं। इस हिंसा और वोटबैंक का सहारा एक तरह के लोग उठाते रहे, अब दूसरी तरह के लोग भी दंगे करा रहे हैं, और आगज़नी में शामिल हैं।

प्रिय रवीश जी, पत्रकारिता के आलोकनाथ मत बनिए

आप स्टूडियो में बैठे वो दंगाई हैं जो शब्दों से दंगे करवा सकता है। आप बार-बार अपनी बातों को साबित न कर पाने की स्थिति में ऐसे तर्क रखते हैं जिन्हें सत्यापित करना नामुमकिन है। जैसे कि ‘भाजपा के राज में लोगों को बल मिल रहा है’। ये कैसे नाप लें कि लोगों को बल मिल रहा है? लोग पागल हो रहे हैं तो सरकार कैसे ज़िम्मेदार है?

अवनि जी, बाइसन-21 की बधाई, आप हम सबकी आदर्श हैं

तीनों बहनों को सलाम, आपको एक एक्सट्रा! राफ़ेल आ जाए तो उसको उड़ाइएगा, तब हम आप तीनों का पोस्टर रूम में लगा लेंगे।

‘टाइम्स अप’: दोस्ती, सेक्सटिंग, सेक्स, सेक्सुअल फ़ेवर्स और विक्टिमहुड

मैं सिर्फ उन महिलाओं के साथ हूँ जो अक्षम थीं, जिनके पास क़ानूनी सहायता का कोई विकल्प न था, जिन्हें क़ैद करके रखा गया, जिनके साथ ज़बरदस्ती हुई और पुलिस या समाज ने उन्हें चुप कर दिया।