ग़ुलामी के प्रतीकों पर गर्व करने वाली अकेली प्रजाति भारतीय ही है

कुल तीन पन्नों में आपको गुप्त वंश, मौर्य वंश, चोल, पांड्य, चेर, सातवाहन आदि को पैराग्राफ़ दे-देकर समेट दिया जाता है। बताया जाता है कि हम पर बलात्कार करने वाले और तलवार की नोक पर मुसलमान बनाने वाले आतंकी राजाओं के साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था और फलाना आदमी कितना महान था!

वामपंथी नेतृत्व चुने हुए प्रधानमंत्री को बम से उड़ाकर लोकतंत्र को बचाना चाहता है!

अगर ये लोग दलितों और आदिवासियों के हिमायती हैं तो ऐसे राज्यों और इस देश में उनकी सरकार क्यों नहीं बनती? देश में तो तीन-चौथाई आबादी दलितों और आदिवासियों की ही है, इनके सांसद विलुप्तप्राय प्रजाति क्यों हो गए हैं?

‘ठंढा आ रहा है’ वामपंथी आतंकी पिल्लो, कोंकियाओ और नए नैरेटिव गढ़ो

तुम्हारा ट्रेडिशनल आर्गुमेंट और वोटबैंक दोनों ही तुमसे भाग रहे हैं क्योंकि इस सरकार ने तुम्हारे आर्गुमेंट को भी तोड़ा है, और वोटबैंक को भी। दोनों को अपने काम से। चूँकि आँख में घोड़े का बाल और बवासीर वाले पिछवाड़े में गुस्से से तुमने कैक्टस डाल रखा है तो तुम्हें नहीं दिखेगा कि सड़के बनीं, गैस सिलिंडर मिले, फायनेंसियल इन्क्लूजन हुआ, इकॉनमी की हालत बेहतर है, टैक्स देना सहज हुआ, एक करोड़ नए कर दाता जुड़े, तुम्हारे चाचा द्वारा दिए गए लोन को लेकर भागने वालों पर कार्रवाई हो रही है…

मेरा समर्थन भाजपा या मोदी को क्यों है?

ऐसे लोगों के बीच तमाम ख़ामियों के बावजूद अगर भाजपा लगातार लोगों का विश्वास जीत रही है तो मुझे उस बहुमतदायिनी जनता के फ़ैसले पर सवाल करने का कोई हक़ नहीं क्योंकि वही रास्ता संवैधानिक है। जो भी ज़्यादा वोट लाएगा उसकी नीतियाँ सही हैं। सारी नीतियाँ सही न हों, पर लोग लार्जर पिक्चर देखते हुए उसे चुन रहे हैं।

बंगाल चुनावी हिंसा: रवीश जी ने नाक में काग़ज़ की सीक डालकर छींका, किया इज़ इक्वल टू

पूरे आर्टिकल में प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं लिया गया है। उस सांसद का नाम नहीं लिया गया है जिसने इस हिंसा के आँकड़े को सामान्य बताया है। क्यों? ट्रेन में बिकते जनरल नॉलेज की किताब में ‘कौन सी चिड़िया उड़ते हुए अंडे देती है’ के बाद वाले पन्ने पर ‘राज्य और मुख्यमंत्री’ वाले हिस्से में बंगाल की ममता का नाम नहीं छपा है क्या?

झारखंड रेप-हत्या कांड: इन गाँवों के लोग किस दुनिया में रह रहे हैं?

क्या दलित द्वारा दलित का बलात्कार और हत्या से शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए? क्या वो शर्मिंदगी और क्रोध सिर्फ़ हिन्दू-मुसलमान, दलित-सवर्ण वाले मामले में ही लागू होता है?

गीता रेप कांड: …तो मैं अब ये लिखूँ कि अल्लाह कितना शर्मिंदा हो रहा होगा?

रेप के कारण वैयक्तिक ही रहेंगे, सामाजिक या राष्ट्रीय नहीं हो सकते। किसी अपराधी के अपराध का बोझ पूरा धर्म, पूरा समाज अपने सर पर क्यों लेगा? क्यों थोप दिया जाय ऐसे घृणित और जघन्य कुकर्म का पाप पूरे राष्ट्र पर?

रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।

काहे बे चूतिये, राम काहे शर्मिंदा होंगे?

अल्लाहु अकबर कहकर बम फोड़ने वालों पर अल्लाह को तो शर्मिंदा होते नहीं सुना! तुम जैसे लिब्रांडुओं को कहते और लिखते सुना और देखा कि ये असली मुसलमान नहीं है। फिर अभी कौन सा कीड़ा पिछवाड़े में घुस जाता है कि सौ लोगों की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती दिख जाती है?