जब भंसाली जैसे सक्षम लोग क्रिएटिविटी से ज्यादा कॉन्ट्रोवर्सी पर दाव लगाते हैं

जब बात औक़ात से बाहर जाने लगी तब ट्रेलर में ‘…वो राजपूत’ और ये राजपूत वाला एंगल डाला गया। ये ट्रेलर में डैमेज कंट्रोल हेतु दिया गया है। हो सकता है पहले से ही डालना हो, पर अब तो मैं इसे ऐसे ही देखता हूँ। जब फ़िल्म पद्मावती की है तो ख़िलजी की प्रमोशन को इतना महत्व क्यों?

लुटेरों, बलात्कारियों, आतंकियों की मेनस्ट्रीमिंग कब तक होती रहेगी?

हमलोग एक निकम्मी, मूर्ख, कायर और अव्यवस्थित जनसंख्या थे, जिन्हें महान बलात्कारियों, लुटेरों, और हत्यारों तक ने जीने का तरीक़ा सिखाया। यही तो कारण है कि ग़ुलामी का हर एक प्रतीक हमारे लिए पर्यटन स्थल है।

जहाँ सभ्यताएँ ऐसी रही हैं कि खुदाई में हथियार नहीं मिलते

जहाँ लड़ाई की आवश्यकता है, बेशक हथियार उठा लीजिए, लेकिन तय कीजिए कि हर बात पर लड़ाई ज़रूरी है क्या? अपनी गहरी, फैली जड़ों से नमी खींचिए।

प्रिय कॉन्ग्रेस, चुनाव जीतने हैं तो बिहेव लाइक अ नेशनल पार्टी

‘राहुल’ को ‘राज’ का हुलिया देकर ‘हाय ब्रो, आप एम कूल’ कहने से पिक्चर हिट नहीं होगी।

पैराडाइज़ लीक्स: पार्टी, सरकारों और देशों से परे, पैसेवालों के क़ब्ज़े में टैक्स क़ानून

इसमें पार्टी, देश और सरकारें एक साथ, मुस्कुराते हुए खड़े हैं, और जिसके पास पैसा है वो अपने हिसाब के क़ानून बनवा कर चिल मार रहा है।

जंतर-मंतर: प्रोटेस्ट के लिए निर्धारित जगह एक चुटकुला है

एक प्रजातंत्र में विरोध मुखर रूप से होना चाहिए जिसके लिए हर सड़क, हर गली, हर सरकारी कार्यालय के दरवाज़े के सामने की जगह उपलब्ध होनी चाहिए।

एक सीनियर पत्रकार के पास किसी नेता की 3000 सेक्स सीडी क्यों है?

आपके पास किसी की सेक्स सीडी आज के ज़माने में क्यों है जबकि क्लिप की सॉफ़्ट कॉपी फोन पर व्हाट्सएप्प आदि के ज़रिए मिल जाती है?

फ़ेसबुक लाइव (मल्टीपल स्ट्रीम): नैरेटिव मेकर मीडिया पर नया प्रहार

सूचना पूर्णरूपेण प्रजातांत्रिक हो गई है कि ये किसी के भी हाथों में जा सकती है, और किसी के भी हाथों से आ सकती है।

बिकी हुई पत्रकारिता के दौर की ख़बरों में प्रोपेगेंडा कैसे पहचानें

जब ख़बरों में अनावश्यक बातें और संबंध बनाए जाने लगें तो समझ जाइए कि वो प्रोपेगेंडा है।