Observations from a visit to Beijing

In the past one month many ‘firsts’ happened to me. I authored and published my first book; published my first research paper; for the first time some stranger recognised me and asked for an autograph, sat on an airplane for the first time; and finally visited a foreign place (other than Nepal) for the first […]

‘ज्वलंत’ मुद्दों के बीच मैं पार्टी बदल कर तटस्थ हो गया हूँ

वैसे तो समय तटस्थ रहने वालों का भी अपराध लिखेगा, दिनकर ने कहा है, पर कई मौक़ों पर जब समझ में ना आए तो खेमा पकड़ने से बेहतर है तटस्थ रह जाना।  जेएनयू और एन्टी-नेशनल काँड पर मैं अपने इग्नरेन्स के साथ तटस्थता की तरफ बढ़ रहा हूँ। आज पता चला वीडियो डॉक्टर्ड हैं! साला […]

First few days in Beijing 

It’s been a few days here in this land with more population than ours but there is nothing callous about it. I love my country but I can see how people make their nation great. It is very small things from keeping the roads clean to let the traffic lights get green to move ahead; […]

मैं एक टुटपुँजिया विचारक हूँ

किसी एक विचारधारा के होने में बहुत दिक़्क़तें हैं। कोई भी एक विचारधारा बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चलती, आदमी चलता रहता है। आदमी बनिए वरना ब्रा खोल कर निप्पल प्रदर्शन करने वाले नारीवादी विचारक भी हैं और चड्डी पहनकर घूमने वाले राष्ट्रभक्त भी। और आपको अच्छे से पता है कि दोनों ही अलग अलग श्रेणी के चूतियाप हैं।

Selective sensitivity and cool quotient of crises

Do you remember that Syrian toddler washed ashore? Yes, the kid in red shirt, tiny shoes, face down in sands of time (pun intended)… Must have wrenched your heart. It is also likely that you remember the Charlie Hebdo killings. How about Boko Haram? You must have read or heard it somewhere, may be, in […]

कन्या लौंडा विमर्श: कन्या बुलाए तो चले ही जाना चाहिए

सुबह सुबह एक विद्यार्थी का फोन आया। शिक्षक दिवस विश नहीं किया, सीधे पूछा, “सर, हम फेसबुक पर लिखे कि बुक फ़ेयर जाना है किसी को तो एक लड़की ने लिखा कि हाँ जाएँगे लेकिन कल चलो तब। लेकिन हमारा मन तो आज ही जाने का है। क्या करें।” अब बताईए कि इसमें दुविधा कहाँ […]

श्री राधे माँ के पक्ष में 

कामसूत्र, भक्तिकाल के बाद बने मंदिर और गुफ़ाओं की कलाकृतियों के बाद हमारे हिंदू, या सनातन, धर्म से ‘सेक्स’ गायब ही हो गया था। आई मीन देयर वॉज़ नो सेक्स एट ऑल लेफ़्ट इन हिंदू वे ऑफ़ वरशिप। एंटर सेक्स क्रेविंग गुरूज़… एण्ड लिबरेटेड, डान्सिंग घर्मगुरू श्री राधे माँ… ओह या… या बेबी… यू हर्ड […]