मेरा समर्थन भाजपा या मोदी को क्यों है?

ऐसे लोगों के बीच तमाम ख़ामियों के बावजूद अगर भाजपा लगातार लोगों का विश्वास जीत रही है तो मुझे उस बहुमतदायिनी जनता के फ़ैसले पर सवाल करने का कोई हक़ नहीं क्योंकि वही रास्ता संवैधानिक है। जो भी ज़्यादा वोट लाएगा उसकी नीतियाँ सही हैं। सारी नीतियाँ सही न हों, पर लोग लार्जर पिक्चर देखते हुए उसे चुन रहे हैं।

बंगाल चुनावी हिंसा: रवीश जी ने नाक में काग़ज़ की सीक डालकर छींका, किया इज़ इक्वल टू

पूरे आर्टिकल में प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं लिया गया है। उस सांसद का नाम नहीं लिया गया है जिसने इस हिंसा के आँकड़े को सामान्य बताया है। क्यों? ट्रेन में बिकते जनरल नॉलेज की किताब में ‘कौन सी चिड़िया उड़ते हुए अंडे देती है’ के बाद वाले पन्ने पर ‘राज्य और मुख्यमंत्री’ वाले हिस्से में बंगाल की ममता का नाम नहीं छपा है क्या?

झारखंड रेप-हत्या कांड: इन गाँवों के लोग किस दुनिया में रह रहे हैं?

क्या दलित द्वारा दलित का बलात्कार और हत्या से शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए? क्या वो शर्मिंदगी और क्रोध सिर्फ़ हिन्दू-मुसलमान, दलित-सवर्ण वाले मामले में ही लागू होता है?

गीता रेप कांड: …तो मैं अब ये लिखूँ कि अल्लाह कितना शर्मिंदा हो रहा होगा?

रेप के कारण वैयक्तिक ही रहेंगे, सामाजिक या राष्ट्रीय नहीं हो सकते। किसी अपराधी के अपराध का बोझ पूरा धर्म, पूरा समाज अपने सर पर क्यों लेगा? क्यों थोप दिया जाय ऐसे घृणित और जघन्य कुकर्म का पाप पूरे राष्ट्र पर?

रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।

काहे बे चूतिये, राम काहे शर्मिंदा होंगे?

अल्लाहु अकबर कहकर बम फोड़ने वालों पर अल्लाह को तो शर्मिंदा होते नहीं सुना! तुम जैसे लिब्रांडुओं को कहते और लिखते सुना और देखा कि ये असली मुसलमान नहीं है। फिर अभी कौन सा कीड़ा पिछवाड़े में घुस जाता है कि सौ लोगों की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती दिख जाती है?

चुनावी दौर में खेल परसेप्शन मैनुफ़ैक्चरिंग का है

बाकी समय दलित, अल्पसंख्यक, दंगाई सब गाँव में घुइयाँ की खेती में व्यस्त रहते हैं। चुनाव आते ही अचानक से कोई किसी को पीट देता है, किसी को मार देता है, कहीं दंगा हो जाता है।

उत्तराखंड मेडिकल कॉलेज फीस कांड: क्या मेडिकल की पढ़ाई इतनी सस्ती है?

विरोध इस बात से है कि जब सरकारों को और भी सरकारी कॉलेज खोलना चाहिए तो वो वैसा न करके, स्वास्थ्य और शिक्षा का बजट घटाकर, निजी संस्थानों को बढ़ावा दे रहे हैं। हर व्यक्ति न तो इतना पैसा देने में सक्षम है, न ही लोन लेने में। लोन लेने की प्रक्रिया इतनी भयावह है कि ग़रीबों को शिक्षा संबंधित लोन मिल भी नहीं पाता।