जश्न मनाइए क्योंकि मोदी के राज में एक और दुर्घटना हुई है! येय!

मुंबई में भगदड़ मचने से बाईस लोग मरे, कई घायल हुए। आम तौर पर आपको इस बात पर लोग उदास दिखेंगे। लेकिन कुछ लोगों की बाँछें हर ऐसी दुर्घटना पर खिल जाती हैं क्योंकि केन्द्र में मोदी सरकार है। संवेदनशीलता का लबादा ओढ़े उनके शब्दों से ऐसी दुर्घटनाओं के वक़्त घटिया चुटकुले, बेकार की तुलनाएँ और ‘हो-हो’ करते हुए कुत्तों को भगाने वक़्त किया जाने वाला शोर ज्यादा दिखता है।

भगदड़ कैसे मची? कोई कह रहा है कि शार्टसर्किट के बारे में किसी ने हल्ला किया तो उससे मची; किसी का कहना है कि ट्रेन आई थी और लोग दौड़ पड़े; कोई बारिश में बिना छाता के खड़े लोगों के बारे में कह रहा है; तो कोई बिहारियों और यूपी वालों को कोस रहा है कि मुंबई की भीड़ उन्होंने बढ़ा दी है।

ऐसी भगदड़ तब तक मचती रहेगी जब तक हमारे देश में इतनी जनसंख्या है। ये भगदड़ छठ के समय मचती है, जिसके बारे में सरकारें भीड़ नियंत्रण के तरीक़े अपनाती है क्योंकि पता होता है कि फलाने समय में भीड़ बढ़ेगी। ये भगदड़ मंदिरों में मचती है, रैलियों में मचती है और स्टेशनों पर मचती है।

वो ब्रिज सँकड़ा है तो कम लोग चढ़े थे, चौड़ा होता तो ज्यादा लोग खड़े होते। बात ब्रिज के सँकड़ें या चौड़े होने की है ही नहीं। बात है कि क्या वो ब्रिज कभी भी खाली रह सकता है, चाहे उसे तीन मीटर की जगह दस मीटर चौड़ा कर दिया जाय? हमलोग इतने ज्यादा हैं कि फुटपाथ पर सोते हैं, सड़कों के डिवाइडर्स पर सोते हैं, और हर सुबह ज़िंदा बच जाते हैं। इसी में कभी दुर्घटना भी हो सकती है।

लोग कह रहे हैं कि ये तो होना ही था, और फलाने जगह भी होगा। लोग कह रहे हैं कि सरकार को समझना चाहिए कि इतने लोग आते-जाते हैं, तो स्टेशन को भी उसी हिसाब से अपग्रेड करना चाहिए। कुछ लोगों को बुलेट ट्रेन को फिर से चर्चा में लाने का मौक़ा मिल गया है। कुछ लोग वही पुरानी ‘भक्त’ और फलाना-ढिमकाना लिखकर अपनी लेखकीय ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं।

ये बात सच है कि इस देश में आत्महत्या एक गुनाह है और इच्छा मृत्यु की इजाज़त नहीं है। ये बात सच है कि हर मौत की ज़िम्मेदार सरकार है। लेकिन एक बात जो हम हमेशा भूल जाते हैं वो ये है कि हमारी जनसंख्या इतनी ज्यादा है, और हम इस पर बात नहीं करते, कि ऐसे हादसों को आप रोक नहीं सकते।

सरकार को कोसना उचित तब होता जब ब्रिज टूट जाता, पटरी से उतर जाती है ट्रेन। क्या इतनी समझ हम में या आप में नहीं है कि भगदड़ लोगों के एक साथ भागने पर मची, इसमें सरकार कहाँ से आ जाती है? क्या ये सामान्य विवेक का सवाल नहीं है कि ये कार्य समुद्र के किनारे भी हो सकता है, मंदिर के प्रांगण में भी, या कहीं और भी? कुचले गए लोगों को भीड़ ने कुचला।

आप आज बाईस की मौत से आहत हैं न, तो एक आँकड़ा और सुन लीजिए। जिस मुंबई लोकल को मुंबई की लाइफ लाइन कहा जाता है उसमें लटककर चढ़ने से हर साल (सरकारी आँकड़ों को मुताबिक़) 1500 से ज्यादा लोग मरते हैं। एक सप्ताह में तीस से ज्यादा। चूँकि ये मौतें रोज होती हैं तो आपको न तो भीड़ दिखती है, ना मोदी, ना रेल मंत्री, न बुलेट ट्रेन।

दोनों तरह की मौत का ज़िम्मेदार भीड़ है। बिहार के लिए जब तीन से पाँच ट्रेन हुआ करती थीं, तब हम रोते थे कि ट्रेन ही नहीं है दिल्ली से। अब अठारह ट्रेन से ज्यादा है, फिर भी भीड़ कम नहीं होती। किस सरकार ने इस पर काम नहीं किया? लालू से लेकर नीतिश, ममता सबने लगातार ट्रेन बढ़ाए। पटरियाँ बिछाने की कोशिश चल रही है। उसमें फिर भूमि अधिग्रहण बिल आ गया। एक पार्टी दूसरे पार्टी का काम रोकती है, किसानों से जाम लगवाया जाता है कि बिल पास न हो। सारे हथकंडे लगाए जाते हैं। फिर बिल पास होता है और पटरी को गुज़ारने के लिए ज़मीन मिलती है। ये सब तीन साल में नहीं होता।

मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में जनघनत्व हमेशा बढ़ता ही रहेगा। आप बिहारियों को, यूपी वालों को नहीं रोक सकते। उनके न होने से दुर्घटनाएँ बंद नहीं हो जाएँगी। न ही उनको शौक़ है उस भीड़ में जान हथेली पर लेकर चलने और मर जाने का। उनके घरों में अगर सरकारों ने उद्यम लगाए होते, रोजगार और शिक्षा के संस्थान बनाए होते तो वो भटकते नहीं फिरते। खैर मुंबई और दिल्ली किसी के बाप की है भी नहीं। महाराष्ट्र राज्य में होने भर से वो मराठियों की बपौती नहीं हो जाती। महाराष्ट्र भारत में है, और मुंबई को मिट्टी से भरकर बनाया गया था। दिल्ली की बात बाद में होगी, रिफ्यूजियों का शहर है ये।

ऐसी बढ़ती भीड़ में, आप किस स्टेशन को तीन से पाँच साल तक अपग्रेड करने के नाम पर बंद कर देंगे? क्या ज़मीन है आस-पास उसको अपग्रेड करने के लिए? क्या इन इलाकों में भीड़ कभी कम होगी? एक बार एक स्टेशन बंद करके देख लीजिए, और फिर आंदोलन झेलने को तैयार हो जाइए। अख़बारों की ख़बरें होंगी कि मोदी के कारण हजारों खोमचे वाले, मज़दूर, रिक्शा और ऑटो वाले बेरोज़गार ‘कर दिए गए’। ख़बरें आएँगी कि आम आदमी टैक्स देता है फिर भी असुविधा उठा रहा है।

कुल मिलाकर आपको चाहिए कि एक स्टेशन दिल्ली में कहीं बनाया जाय, फिर उसको हवाई जहाज से ले जाकर रात के दो बजे से चार बजे के बीच, पुराने स्टेशन के ऊपर रख दिया जाय। ज्ञानी लोग इतना तक पढ़ने के बाद कहेंगे कि मैं सरकार को बचाने के लिए जानबूझकर ये सारी बातें कर रहा हूँ जिसकी कोई ज़रूरत नहीं है।

बात ये है कि बढ़ती भीड़ के लिए न तो हम बच्चे जनना बंद करेंगे, न ही हमारी सरकारें हमारे इलाकों में वो अवसर देंगी कि हम बाहर न जाएँ, और मेट्रो शहरों की जनसंख्या का संतुलन न बिगाड़ें। इन शहरों में सरकारों को या तो परमिट का सिस्टम लागू करना होगा कि जो यहाँ काम करता है वही रहेगा, उसका परिवार नहीं, या फिर बुनियादी ढाँचे को सुधारने के लिए आम पब्लिक को हमेशा असुविधा सहने के लिए तैयार रहना होगा।

मुंबई का कौन सा स्टेशन है, या इस देश का कौन सा स्टेशन है, जहाँ दो सौ लोगों की भीड़ हो, और बीच में मैं चिल्ला दूँ कि ‘वहाँ आग लग गई, भागो’ और वहाँ आपको दस लोग मरे नहीं मिलेंगे? ज्योंहि उस भीड़ में एक आदमी गिरता है, उसके कारण दो तीन और गिरते हैं, भागने वाले भागते रहते हैं, फिर कुछ टकराकर गिरते हैं, और बाद में गिरे हुए लोग मरे हुए पाए जाते हैं। इसमें सरकार कहाँ से आ जाती है, ये मेरी समझ से बाहर है।

मुख्य समस्या जनसंख्या है, जिसको आप मैनेज नहीं कर सकते। या तो चीन की तर्ज़ पर बड़े शहरों में रहने के लिए ज्यादा टैक्स इत्यादि की व्यवस्था होनी चाहिए, या फिर बाकी के राज्यों में कंपनियों को वैसा अवसर मिलना चाहिए कि वो हर जगह ऑफ़िस खोलें। 130 करोड़ की आबादी में आपका एक शहर ऐसा नहीं है जो व्यवस्थित है, और वर्ल्ड क्लास है। मुंबई या दिल्ली में लोग कहाँ नहीं मर जाएँगे? किस बाज़ार में कम भीड़ होती है? कहाँ कोई बम रख कर गायब नहीं हो सकता?

हम शहरीकरण की ओर बढ़ने को लालायित हैं लेकिन गाँवों को शहर, या टायर थ्री शहर को टायर टू या वन बनाने की जगह एक अजीब सी परंपरा निभाई जाती दिख रही है: गाँव के लोग शहर चले जाते हैं! छोटे शहर के लोग बड़े शहर चले जाते हैं। इस हिसाब से तो बड़े शहर का जनघनत्व बढ़ेगा ही। जहाँ लोग बढ़ेंगे वहाँ आपको संवेदनशील होने के लिए रोज नई ख़बर मिलेगी।

याद है गोरखपुर में बच्चों की मौत? भारत में हर साल तेरह लाख बच्चे कुपोषणजनित बीमारियों से मरते हैं। गोरखपुर में इस साल कम बच्चे मरे। आँकड़े खोजकर पढ़ लीजिएगा। आदर्श स्थिति में वो आँकड़ा शून्य होना चाहिए। गोरखपुर त्रासदी के बाद मीडिया में भाजपा शासित राजस्थान के किसी हॉस्पिटल से बच्चों की मौत का आँकड़ा ले आया गया। क्यों? क्योंकि बच्चों के मरने की ख़बर ट्रेडिंग थी। आप संवेदनशील होते रहे, और सरकार को कोसते रहे।

आपने सामान्य बुद्धि नहीं लगाई। आप उस जगह पर गए जहाँ मौत एक सामान्य घटना है। हॉस्पिटल में लोग बचते भी हैं, मरते भी हैं। ऐसी ख़बर, आप सोकर उठिए और किसी अस्पताल के बच्चों वाले वार्ड में जाइए और बना लीजिए कि फलाने अस्पताल में इतने मासूम की हो गई मौत! तेरह लाख मासूम मरते हैं हर साल। आप कुपोषण पर बात नहीं करेंगे, आपको सरकार को घेरने के लिए कोई झुनझुना पकड़ा देता है, आप हिलाते रहते हैं।

तेरह लाख मौतों की बात करके आप किसी भी दिन सरकार को घेर सकते हैं कि आपके कार्यकाल में मौंते क्यों नहीं घट रहीं? उसी तरह इन बाईस मौतों पर मोदी, भक्त, बुलेट ट्रेन करने से कहीं बेहतर है कि हर साल मरने वाले 1500 यात्रियों की भी बात हो। मुंबई वाले क्या इसके लिए तैयार हैं कि एल्फिन्सटन स्टेशन को तीन साल के लिए बंद कर दिया जाय ताकि उसे बेहतर बनाया जा सके? क्या आपके तमाम बांद्रा, कुर्ला, अंधेरी आदि स्टेशन वर्ल्ड क्लास हैं? क्या आप उन्हें हर तीन साल पर, या कई स्टेशनों को एक साथ भीड़ को डाइवर्ट करके अपग्रेड करने की बात कर सकते हैं?

आप जान पर खेलकर इंजनों के ऊपर, खिड़कियों से लटक कर ट्रेन पर चढ़ते हैं क्योंकि शायद नौकरी पर समय से पहुँचना आपकी जान से ज्यादा ज़रूरी है। इन लटकते नौजवानों में से पाँच हर रोज मर जाते हैं। इनके साथ जो लटके हुए हैं वो दूसरे दिन भी लटककर ही जाते हैं। क्यों? क्योंकि वो बच जाते हैं, और मानवीय दम्भ कि मैं तो बच ही जाऊँगा। हर दिन बढ़ती जनसंख्या के लिए कितनी ट्रेन चलवा दे सरकार? क्या पब्लिक कभी इस बात पर शिक्षित हो सकेगी कि उसकी जान की क़ीमत ज्यादा है और वो किसी भी मजबूरी से कहीं ज्यादा मायने रखती है?

अंग्रेज़ों के बनाए तमाम पुलों के बाद, भारत में पाँच से कम ही नए रेल पुल बने हैं (अगर मैं गलत हूँ तो सही कर दीजिएगा)। इन सब पुलों की एक्सपायरी डेट पचास साल ही थी, लेकिन सब भगवान भरोसे चल रहे हैं। किस सरकार ने इस पर ध्यान दे दिया? बुलेट ट्रेन क्यों नहीं बनेगा? उसका भीड़ की भगदड़ से क्या लेना देना है? कहने को तो मंगलयान और चन्द्रयान पर भी आप मज़े ले सकते हैं क्योंकि उसका पैसा भी स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च होना चाहिए।

बात ये है कि आप बहुत ही नीच क़िस्म के इन्सान हैं। आपको मौतों पर संवेदनशील होने से कहीं ज्यादा इस बात पर जश्न मनाना होता है कि मोदी के राज में एक और दुर्घटना हुई। ऐसी नीचता आप बहुत ही सहज तरीक़े से कर पाते हैं, आप आँकड़े छुपा लेते हैं। आपकी संवेदना मिसप्लेस्ड है अगर आप इसमें सरकार की ग़लती ढूँढ रहे हैं। किसी आदमी को बस ये कहना होता है कि ‘अरे बिजली का तार गिर गया’, और इतना कहना भर ही काफ़ी होता है बाईस लोगों की जान लेने के लिए। इसमें सरकार कहाँ हैं?

 

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