कॉन्ग्रेस का अंतिम दाव: न्यायपालिका को उठल्लू बताना

आज से साल-दो साल पहले तक सर्वोच्च न्यायालय को कमोबेश एक निष्कलंक संस्था माना जाता रहा है। निचली अदालतों में भ्रष्टाचार आदि होने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं के निर्णयों पर सवाल नहीं उठाए जाते थे। कहीं जुडिशियल ओवररीच होता था, तो मनमोहन सिंह कह देते थे कि न्यायपालिका को अपना काम देखना चाहिए। काम चल रहा था, सुबह के चार बजे आतंकियों के हमदर्द न्यायालय खुलवाकर रिव्यू करवा लेते थे। 

कोर्ट ने हमेशा, ऐसे मामलों को ‘एक बार और सही’ कहते हुए देखा। फिर एक दौर आया कि कोर्ट के फ़ैसलों को ‘एक्सट्रा जुडिशियल किलिंग’ कहकर मीडिया में फैलाया जाने लगा। कॉन्ग्रेस और लिब्रांडुओं के गिरोह ने हमेशा इस बात को हवा दी जब भी किसी मुसलमान या नक्सली पर आरोप सिद्ध हो जाता था, और उसे सजा मिलती थी। तब न्यायालय के लिए शर्मनाक दिन के नाम पर ढोल पीटा जाता था। 

इसके बाद भी न्यायपालिका ने ग़ज़ब का संयम दिखाते हुए, इनपर कन्टेम्प्ट का आरोप नहीं लगाया। इसे अभिव्यक्ति मानकर चलने दिया गया। अब 44 सीटों पर सिमटी पार्टी, और लगातार भाजपा के बढ़ते प्रभावक्षेत्र के कारण बाकी कई विरोधी पार्टियाँ आम जनता में ये भाव फैलाना चाहती है कि न्यायपालिका बर्बाद हो चुकी है और उनका कोई भी सुनने वाला नहीं है। यही कारण है कि जस्टिस दीपक मिश्रा की जाति को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि वो ब्राह्मण है इसलिए SC/ST कानून को ढीला कर दिया। 

कॉन्ग्रेस ने अपने इसी गेम प्लान के अगले चरण में लगातार फ़र्ज़ी पीआईएल के ज़रिए न्यायपालिका को अपनी राजनैतिक लड़ाई के केन्द्र में लाने की कोशिश की। हर ऐसे पीआईएल के केन्द्र में वैसा मुद्दा होता था जिससे लगे कि कॉन्ग्रेस को आम जनता की भारी चिंता है, इसी कारण से उनकी लड़ाई वो संसद से बाहर भी लड़ रही है। चाहे वो आतंकियों की सज़ा माफ़ करवाने की बात हो या फिर अभी जस्टिस लोया की प्राकृतिक मौत को अमित शाह से जोड़कर उसकी ‘जाँच’ की बात। 

हिन्दू-विरोधी बातों को हवा देने से लेकर जनेऊ पहनने और ट्विटर पर गाली-गलौज से लेकर संसद में पंद्रह मिनट के चैलेंज तक, कॉन्ग्रेस और उनका पूरा लिब्रांडू तंत्र भाजपा की बढ़ती गाड़ी को रोकने में असफल रहा है। उसके उलट, ऐसे लोगों से भाजपा के समर्थकों में एक नई ताक़त-सी आती दिखती है कि ये लोग राष्ट्र-विरोधी हैं। बरखा दत्त और राजदीप जैसे पत्रकारों के पक्षपाती पत्रकारिता से वो अपनी बातों को सही होता देखते हैं। 

न्यायपालिका अंतिम जगह बची है जहाँ लोगों का विश्वास है। वो ये जानते हैं कि देर हो जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट तो सही फ़ैसला ही करता है। लेकिन न्यायपालिका में बकवास और दो मिनट भी न ठहरने वाली याचिकाएँ लगाकर राजनैतिक लाभ लेने वाले नेता-वक़ील का गिरोह, हर बार केस हारने पर, दुत्कारे जाने पर ऐसे बोलता है मानो न्यायपालिका तो अब बर्बाद हो चुकी है। 

ऐसा ये बार-बार करते रहे हैं, और कोर्ट के भीतर बोले जानी वाली भाषा इतनी अभद्र हो गई है कि सुप्रीम कोर्ट के बार ने इन नेता-वकीलों पर ठोस कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। कोर्ट को भी ये कहना पड़ा कि ऐसी याचिकाओं से ऐसे वक़ील अदालत का समय बर्बाद करते हैं, और अपनी राजनैतिक लड़ाई को कोर्ट में लाने की कोशिश करते हैं। 

ये किसी भी तरह से जनता को ये दिखाना चाहते हैं कि मोदी आपातकाल ला रहा है। एटीएम में कैश की कमी हुई तो ममता और राहुल ने आर्थिक इमर्जेंसी की बात कर दी। जस्टिस लोया की मौत कारवाँ ने छापी, और दो दिन बाद ही इंडियन एक्सप्रेस ने पूरी ख़बर पर अपनी जाँच करते हुए बता दिया की पूरी ख़बर कोरी बकवास थी। फिर इस गिरोह ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जहाँ इन्हें लताड़ लगी। 

अंततः ये दिखाने के लिए कि इनके बोए हर बीज पर कोर्ट लात रखकर आगे बढ़ जाती है, और रामजन्मभूमि मामले में हिन्दुओं का पक्ष भारी होने की वजह से (जिसका निर्णय शायद दीपक मिश्रा करके ही जाएँ), ये बिलबिला उठे हैं। अब इनको अहसास हो गया है कि अगर ये केस भी हाथ से निकल गया तो मुसलमान या तो वोट देगा ही नहीं, या देगा भी तो इन्हें तो बिलकुल नहीं देगा। 

सिकुड़ते वोटबैंक, बिना किसी विजन या दिशा के चलती इस पार्टी, और इनके द्वारा पाले जा रहे कुत्ते पत्रकारों के बुरे दिन लम्बे समय तक चलने वाले हैं इसीलिए ये दिया इस साल तेज़ फड़फड़ाएगा। अब ये ढिंढोरा पीटा जाएगा कि जज ‘बैन्च फ़िक्स’ करते हैं जबकि चीफ़ जस्टिस को ही रोस्टर तय करने का अधिकार है। पाँच जजों की पीठ में चीफ़ जस्टिस हमेशा से एक सीट लेते हैं, ये तय है। 

यही कारण है कि पूरी तरह से जानते हुए कि मुख्य न्यायाधीश पर लाए गए महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा तक नहीं होगी, वो अब उपराष्ट्रपति और कानूनविदों पर सवाल उठा रहे हैं। मतलब ये कि हमने जो कहा है वो सही है, वही करो, क्योंकि पिछले सत्तर साल से वही हो रहा है। आज इनकी एक बात नहीं सुनी जा रही। दीपक मिश्रा के महाभियोग हेतु जो कारण दिए गए हैं वो या तो उनके मुख्य न्यायधीश बनने से पहले के हैं, या फिर उससे भी बहुत पहले के। वो दो मिनट नहीं टिकने वाला था। 

लेकिन इन बातों को पब्लिक में, जिन्हें इन बातों की बहुत समझ नहीं है, ऐसे दिखाया जा रहा है मानो मोदी सरकार से न्यायपालिका मिल गई है और आम जनता को इस संस्था पर विश्वास नहीं करना चाहिए। इनका वश चले तो ये दंगे करवाएँगे आने वाले दिनों में। इन्हें देश, समाज या संस्थाओं को बचाने में कोई रुचि नहीं है, इन्हें सत्ता वापस चाहिए क्योंकि इनके झरने सूख गए हैं। 

ऐसे धूर्त अब किसी भी हद तक नीचे गिर सकते हैं। कहीं नया धर्म बना देंगे, कहीं ये कहते फिरेंगे कि संविधान की चिंता भाजपा को नहीं है भले ही चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने में इनकी पार्टी नब्बे का आँकड़ा छू चुकी हो। आपातकाल इनके प्रधानमंत्री लाते हैं, इनकी पार्टी एक धर्म को निशाना बनाती है दंगों में, और राहुल गाँधी संविधान बचाने की बात करते हैं! 

इसीलिए, इन धूर्तों का खेल देखिए। आम आदमी टेक्निकल बातें नहीं जानता, लेकिन वो ये समझता है कि चोरों को दोबारा सत्ता नहीं दी जानी चाहिए। भला हो सोशल मीडिया का जिससे उन्हें हर तरह की ख़बरें पढ़ने और समझने को मिल रही हैं, वरना अपने पेट में गैस हो जाने पर भी ‘आम आदमी को मोदी राज में समस्या हो गई है’ कहने वाले बहुत हैं। 

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