कहानी समीक्षा: निर्मल वर्मा रचित ‘डेढ़ इंच ऊपर’

निर्मल वर्मा को मैंने कभी नहीं पढ़ा था। इससे पहले कि मैं समीक्षा शुरु करूँ, कुछ बातें समझनी ज़रूरी हैं किसी भी पाठक के लिए। (जिनको सिर्फ़ समीक्षा पढ़नी हो सातवें पैराग्राफ़ से शुरु करें।) बचपन में (स्कूली शिक्षा तक) मैंने अपने स्कूल के पुस्तकालय की अधिकतर हिन्दी किताबें पढ़ ली थी। लेकिन उसका कोई खास फ़ायदा नहीं होता सिवाय इसके कि आप ये क्लेम कर सकें कि आपने फ़लाँ लेखक को पढ़ रखा है। प्रेमचंद को चौथी कक्षा में पढ़ना और वही कहानी ग्रेजुएशन के समय पढ़ने में बहुत फ़र्क़ है। इसीलिए रेणु की ‘पंचलाइट’ और स्विफ्ट के ‘गुलीवर्स ट्रैवल्स’ के मायने दोनों समय में काफ़ी बदल जाते हैं।

बचपन में आप ‘बच्चे’ होते हैं। आप उन संवेदनाओं तक पहुँच नहीं पाते जो कहानीकार आप तक भेज रहा होता है। आपकी कल्पना सीमित होती है क्योंकि आपके अनुभवों का एक दायरा होता है। उस अनुभव में बाल मन की चंचलता, आश्चर्य, रिश्तों की निश्छलता और निष्पाप हृदय का विस्तार होता है। जो भी घटित होता है उसे आप उन्हीं सीमित अनुभवों से समझने की कोशिश करते हैं। तब आपको कह दिया जाता है कि हवाई जहाज उड़ता है, क्योंकि वो उड़ता है। आप मान लेते हैं। जो सवाल करते हुए सबको परेशान करते हैं, वो बाद में फ़िज़िक्स पढ़कर इंजीनियर बनते हैं।

मैंने ठीक-ठाक साहित्य पढ़ा है। मूलतः, मुख्यधारा की दो ही भाषाएँ आती हैं, हिन्दी और अंग्रेज़ी, तो दुनिया की बाकी भाषाओं के साहित्य के अनुवाद ही पढ़े हैं। इतना नहीं पढ़ा है कि हर पैराग्राफ़ के शुरुआत और अंत में दो विदेशी नाम ठोक दूँ ये कहने के लिए कि मैं जो कह रहा हूँ, वो साहित्यकार भी यही कहते हैं।

एक समय आया कि जब मैं लिखने लगा (जो कि शायद तीसरी कक्षा आदि के स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस के भाषणों से शुरु होती है। लेकिन यहाँ ग्रेजुएशन के समय से मानकर चलिए।) तो मुझे कभी-कभी ये लगता था कि मेरी भाषा और शैली किसी फ़लाँ लेखक से मिल रही है; मेरे कथानक प्रभावित हो रहे हैं; मैं कभी मंटो बन रहा हूँ, कभी कमू! फिर मैंने पढ़ना बंद कर दिया लम्बे समय तक। इस समय में मैंने बस स्टीव जॉब्स की जीवनी पढ़ी और खूब सिनेमा देखा।

अपनी रचनात्मकता को नए आयाम देने के लिए अपने क्षेत्र से बाहर की रचनाओं को समझना ज़रूरी होता है। अगर आप फ़िल्मकार हैं और सिर्फ़ फ़िल्में देखते हैं तो आप पर आपके गुरुओं की, बड़े निर्देशकों की छाप पड़ ही जाएगी। उसी तरह संगीतकार, पेंटर, कहानीकार आदि भी इससे अछूता नहीं रह सकता। यही कारण है कि मैं निर्मल वर्मा को अब तक नहीं पढ़ सका।

[ समीक्षा में आपको कहानी नहीं मिलेगी क्योंकि ये काम एक नौसिखुए या घटिया समीक्षक का होता है। ये काम सबसे आसान है कि कहानी आपको बता दी जाय, समीक्षा की लम्बाई भी बढ़ जाती है। मैंने यहाँ ये लिखा है कि आपको कहानी पढ़ने की उत्सुकता हो, समझने में बस उतनी ही मदद मिले जितनी ज़रूरी है। साथ ही ये बात भी याद रखिए कि मेरी समीक्षा, और कहानी पढ़कर आपके अनुभव कुछ हद तक अलग होंगे। क्यों? क्योंकि एक ही घटना से डेढ़ इंच ऊपर कई मायनों में हुआ जा सकता है! ]

समीक्षा:

भारती जी ने निर्मल वर्मा की लिखी कहानियों का एक संग्रह दिया और ‘डेढ़ इंच ऊपर’ को सबसे पहले पढ़ने कहा। लेकिन मैंने सबसे पहले भूमिका पढ़ी जो कि लेखक की खुद की लिखी हुई थी, और फिर कहानी शुरु की। ये कहानी नायक के किसी ऐसे बिअर बार में बैठकर खुद से, और किसी अनजान शख़्स से (वो भी खुद को ही सुनाने के लिए क्योंकि नशे में धुत्त आदमी भला उसकी बात क्यों सुनेगा), एकतरफ़ा संवाद और अपने अनुभवों को साझा करके खुद को अपने सच तक पहुँचाने की कोशिश है।

नायक जानता है, सबकुछ जानता है, लेकिन मानता नहीं। मानता इसलिए नहीं क्योंकि उसके समक्ष वो घटित नहीं हुआ जो किसी पोस्टर पर सरकार द्वारा मार दिए गए व्यक्तियों की लिस्ट में घटित होता दिखाया जाता है। भूमिका में लेखक ने चेखव की किसी कहानी का ज़िक्र किया है कि उसकी नायिका को ट्रेन में अपनी मृत माँ की झलक दिखती है। इस कहानी संग्रह में आपको वो बिम्ब कई जगह दिखेगा कि कोई या तो मर गया, या खुद को मरा घोषित कर रहा है, या जो मर गया वो कहीं से आ जाय, इसका इंतज़ार है।

समय, रिश्ते, परिस्थितियों और लोगों को समझने की जद्दोजहद आपको इस कहानी में मिल जाएगी। बार में बिअर की ग्लास के साथ खुद से मुख़ातिब नायक कुछ कह रहा है, लेकिन किससे कह रहा है इससे उसे खास मतलब नहीं है। क्यों? क्योंकि वो न तो ज़मीन पर है, ना नशे की ख़ुमारी वाली हवा में। वो अपनी ज़मीन से डेढ़ इंच ऊपर है जहाँ से वो एक दूरी से अपने जीवन की सबसे गूढ़ घटना को समझने की कोशिश करता दिखता है।

पत्नी को पुलिस के द्वारा सरकार-विरोधी गतिविधियों के लिए पकड़ लिया जाता है, और नायक को यही समझ में नहीं आता कि आखिर वो जो औरत थी, वो उसे सात साल में भी जान पाया था कि नहीं, क्योंकि जितनी जानकारी पुलिस के पास थी, उससे कहीं कम खुद उसे!

ये उसके लिए एक आश्चर्य की बात है कि हम जिन्हें इतने क़रीब से समझने का दावा करते हैं, कि उसकी हर छोटी-सी बात, ग़ैरज़रूरी आदतों की सूचना, हमारे ज़ेहन में ऐसे छप जाती है कि वो अगर न घटित हो नियत समय पर तो हमें लगता है कि कुछ गड़बड़ है, और बाद में पता चलता है कि प्याज़ के तह-दर-तह उतरने की कोशिश में हमने कितनी परतें उतारी हैं, हमें मालूम नहीं। ये भी मालूम नहीं कि इस प्याज़ का विस्तार कितना है, इसके अंदर की सबसे आख़िरी साबुत परत तक पहुँच जाएँगे तो भी शून्य के अलावा वहाँ क्या मिलेगा? उस शून्यता का हम करेंगे भी तो क्या?

इसीलिए डेढ़ इंच ऊपर उठ जाने से नज़रिया बदल जाता है। महज़ थोड़ी-सी दूरी बना लेने से तस्वीर साफ नज़र आ सकती है। आपको वो बातें समझ में आने लग सकती हैं जो ज़मीनी या सतही तौर पर समझ में ना आ सके। यहाँ पर नायक चेतन होने की बात करता है कि आपको ये पता होना चाहिए कि माचिस की जलती तीली को कब तक पकड़े रहना है, और किस क्षण अगर न छोड़ें तो उँगली जल सकती है। उस सटीक क्षण का भान होना ही डेढ़ इंच ऊपर होना है।

एक डर होता है अंदर जो कि आपको ऊपर जाने से रोकता है, आप दायरे तोड़ने से हिचकते हैं। अपनी ईमानदारी का भी हम एक अलग वर्जन बनाकर रखते हैं जो कि दुनिया को दिखाने के लिए होता है। हम स्वयं क्या हैं, हमारी परतों के बाद क्या बचता है, उस शून्यता को बहुत कम लोग बाहर ला सकने की कूवत रखते हैं। क्योंकि हम जो होते हैं, वो हम जानते हैं, लेकिन सोते वक़्त खुद से होती बातचीत में भी इस जानने को मानते नहीं।

बिअर पीने के एक सुख के बारे में नायक कहता है कि आप बिअर पीकर भटक सकते हैं। हम राउण्ड एण्ड राउण्ड एण्ड राउण्ड घूमते हैं। इस नशे को, भटकाव को आप ‘धुत्त’ हो जाने से मत आँकिए। लेखक जब होश में होकर बेहोशी की बातें लिखता है, तो वो एक अलग स्तर की चेतना होती है। भटकने का अर्थ है कि जीवन में हम लगातार अपने सवालों को लेकर चलते रहते हैं। हर अलग आदमी से अपने सवालों को कहकर, अनुभव बाँटकर उसकी राय में एक जवाब ढूँढते हैं।

यहाँ अपनी पत्नी से वो जो जानना चाहता है कि क्या वो सच में वही कर रही थी जिसके कारण पुलिस उसे पकड़ कर ले गई, या फिर ये गलत गिरफ़्तारी है, उसका जवाब वो टेबल की दूसरी तरफ बैठे शख़्स को कहकर ढूँढ रहा है। नायक को इस बात का मलाल है, और आत्मज्ञान भी, कि मृत्यु दुःख नहीं देती, दुःख इस बात का होता है कि एक व्यक्ति अपने सारे राज छुपाए गायब हो गया। वो अभी था, अब नहीं है। अब आप उससे पूछ नहीं सकते, जान नहीं सकते। आपके सवालों का जवाब जो दे सकता था, वो है ही नहीं। बचे हैं तो सिर्फ सवाल। और सवाल… सवाल कचोटते हैं।

नायक लगातार नॉस्टैल्जिक होता है। ख़ालीपन को भरने के लिए बिल्ली पालता है। वो सोचता है कि कहीं से पत्नी तौलिए से हाथ पोंछते हुए बाहर आ जाएगी घर खोलने पर। लेकिन वस्तुतः उसका इंतज़ार सिवाय उसकी बिल्ली के और कोई नहीं करता। आधी रात को उस बार में होना, जहाँ वही आदमी आता है जो या तो नया हो शहर में, या जिसे पता हो कि अब बस यहीं मिलेगा जो भी मिलेगा, खाली घर में वापस लौटने की पीड़ा और किसी के उसके इंतज़ार में न होने की पीड़ा का द्योतक है। हालाँकि, नायक खुद को ये कहकर समझा लेता है कि उसका इंतज़ार उसकी बिल्ली कर रही है। लेकिन दोनों इंतज़ार अलग हैं, जैसे कि दो प्रेम अलग होता है, एक में उठे संशय का समाधान दूसरा नहीं दे सकता।

ऐसे बिअर बार में कोई सोचने-समझने, सुनने-सुनाने की स्थिति में होगा, ऐसा मानना लगभग ग़लत है। वहाँ लोग डेढ़ इंच से बहुत ज़्यादा ऊपर होते हैं, जो कि अक्सर नाली या पुलिस स्टेशन में पाए जाते हैं।

उस जगह पर जीवन दर्शन की बातें करना एक आंतरिक संवाद है जिसके अंदर का कंकाल एक ऐसी स्त्री है जिसे वो अपनी पत्नी कहता था, और सोचता था कि खूब जानता है, लेकिन अब संशय में है। ये तमाम सवाल और सामने वाले की हर क्रिया पर, स्वयं ही मतलब निकाल कर, प्रतिक्रिया देना, अंतर्द्वंद्व को थामने की कोशिश है। अपनी ईमानदारी का सामना उस ईमानदारी से कराने का उपक्रम है जो दुनिया के लिए है।

ये एक ऐसा इंतज़ार है नायक के लिए जो हर दिन का है। हम सब आपने सवालों को लेकर इसी इंतज़ार में रहते हैं। एक जवाब मिल जाने पर दूसरा सवाल आ खटकता है।

डेढ़ इंच ऊपर हो जाने का मतलब है सवालों को समझ पाना जो आपके ही बनाए हुए हैं। डेढ़ इंच ऊपर हो जाने से आप सतह के घर्षण से मुक्त हो जाते हैं। आपको उस बल से मुक्ति मिल जाती है जो आपको सोचने को रोकती है, जो आपके निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। ज़्यादा ऊपर होने से आप उस सवाल, उस अनुभव के दायरे से बाहर हो जाते हैं, और इस तरह की मुक्ति का अर्थ है कि कल आपको दोबारा प्रयास करना होगा उन्हीं अनुभवों को समझने के लिए, उसी अराजकता में व्यवस्था देख पाने के लिए, जिसके लिए आपके पास उतने संसाधन कभी नहीं थे, जितने आज हैं।

चैतन्य होकर, माचिस की जलती तीली को सटीक समय पर छोड़ने की क़ाबिलियत डेढ़ इंच ऊपर होना है। अपने होने का आभास, और घटनाओं के दायरे से सही दूरी पर होकर अपने ‘निष्पक्ष’ अनुभवों के जोड़-घटाव-गुणा-भाग करते हुए, समाधान पाने का यत्न डेढ़ इंच ऊपर होना है। ज़मीन पर आपकी गणना प्रभावित होगी, ज़्यादा ऊपर होने से आप घटना से दूर हो जाएँगे।

 

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