दंगल देखिए, और फ़र्ज़ी फ़ेमिनिज़्म की चरस मत बोईए

दंगल देखी मैंने। अच्छी है। या, शायद अच्छी और बेहतरीन के बीच में, बेहतरीन की तरफ ज्यादा जाती हुई। मुझे बेहतरीन इसलिए भी नहीं लगी क्योंकि हो सकता है कि मेरी अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा होती हैं आमिर की फ़िल्मों से। मैं समीक्षा तो नहीं करूँगा पर मुझे लगता है कि किसी के जीवन पर आधारित फ़िल्म में आप ज्यादा ड्रामा, कल्पनाशीलता आदि नहीं दिखा सकते। बायोपिक का ये लिमिटेशन होता है।

आमिर ने मेहनत की, गीता और बबीता का किरदार निभाने वाली चारों लड़कियों ने भी शानदार काम किया है। डायलॉग कुछ हैं जो सीधे हैं, पर गहरे हैं। लेकिन इस फ़िल्म में डायलॉग की भूमिका लगभग ना के बराबर है। इसमें एक्शन है, हर पल कुछ ना कुछ हो रहा है जिसके बीच आप संवादों के ना रहने पर भी ध्यान नहीं देंगे। कई जगह सिर्फ चुप्पी है, और चेहरे हैं। उनका वहाँ होना ही कहानी कह देता है।

गाने सारे अच्छे हैं, फ़िल्मांकन भी अच्छा है। पात्र भी उस तरह के हैं जो एक जीवट व्यक्ति के जीवन में होते हैं जब आपको अपनी लड़ाई घर से लेकर, गाँव, समाज और पूरे समाज की व्यापक सोच से लड़नी हो। महावीर सिंह फोगाट की ये लड़ाई अामिर, साक्षी, ज़ायरा, सुहानी, फ़ातिमा, सान्या और अन्य कलाकारों ने बख़ूबी निभाई है।

चूँकि खेल का बैकग्राउंड है तो रोमांचक तो फ़िल्म हो ही जाती है। फ़िल्म बिल्कुल देखने लायक है और जरूर देखिए जाकर। ऐसी फ़िल्में इस शिद्दत से नहीं बनाई जाती हर साल, इसलिए भी जाकर देखिए।

कहानी और फ़र्ज़ी का फ़ेमिनिज़्म वाला एंगल

ऐसा है कि किसी भी ‘इज़्म’ और मूर्खता में बस धागे भर का फ़र्क़ होता है। वैसे मैं ‘मूर्खता’ और ‘धागे’ की जगह दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करना चाह रहा था जो क्रमशः ‘च’ और ‘झ’ से शुरू होती हैं, लेकिन छोड़ रहा हूँ। समझदार तो समझ ही गए होंगे।

कहानी में ऐसा है कि फोगाट साहब को बेटियाँ हैं चार और उनपर, लिपिस्टिक नारीवादियों के अनुसार, वो अपने सपने का बोझ जबरदस्ती डाल देते हैं। गीता और बबीता को आठ-नौ साल की उम्र से कुश्ती की ट्रेनिंग दी जाती है उसके पिता द्वारा।

कुछ फ़ेमिनिस्टों को ऐसा लगता है कि पिता के लिंग से बस स्पर्म निकल गया उतना ही ज़रूरी है एक लड़की के लिए और उसके अलावा वो सारे काम करने में स्वयं सक्षम है। ऐसा एक बयान प्रियंका चोपड़ा का भी पढ़ा होगा कि मर्द की जरूरत उन्हें बस बच्चे पैदा करने के लिए होगी। और उन फ़ेमिनिस्टों ने उन्हें अपनी देवी मान लिया।

अब इसे मैं ऐसा भी कह सकता हूँ कि औरतों की जरूरत मुझे सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए होगी। यहाँ पर मैं सेक्सिस्ट और मिसॉजिनिस्ट हो जाऊँगा क्योंकि यहाँ ‘सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए’ का अर्थ है कि मैं औरतों को बस बच्चा पैदा करने लायक समझता हूँ। मुझे प्रियंका चोपड़ा टाइप देवी-देवता नहीं माना जाएगा और मुझे सूअर कहा जाएगा।

ख़ैर, दंगल और फ़ेमिनिज्म पर आते हैं। तो, दो बेटी को जब एक बाप, उनमें कोई भविष्य देखकर, ट्रेनिंग देने लगता है तो वो उनकी फ़्रीडम छीनना और अपनी ‘फ़्यूडल सोच’ उन पर थोपना हो जाता है। फ़्यूडल का मतलब सामंतवादी सोच से है, हिन्दी पढ़ने वालों को बताता चलूँ।

ऐसे फ़ेमिनिस्ट ये भी कह सकते हैं कि आपने बेटी पैदा कैसे कर दी, आपको परमीशन किसने दिया! और इनका मानना लगभग उस एक्सट्रीम तक हो जाता है कि बेटी पैदा कीजिए और फिर उसको छोड़ दीजिए। उसका दूध पीने का मन होगा तो माँ के सामने रोकर माँग लेगी। उसका खड़े होने का मन होगा तो ख़ुद खड़ी हो जाएगी। बाप, भाई, चाचा आदि अगर उसको खड़े होने में मदद कर रहे हों तो वो उस बच्ची पर अपनी सोच थोपना है कि ‘हम कह रहे हैं तो खड़े हो जाओ’।

मतलब ऐसे फ़ेमिनिस्टों के हिसाब से आठ साल की बच्ची को उसके भविष्य की दिशा देने के लिए बाप कुछ ना कहे। पढ़ने में किसका मन लगता है बचपन में? फिर तो हर बच्चे को माँ-बाप हर रोज़ पूछें, “बेटा, पढ़ने का मन है? है तो जाओ, क्योंकि हम तुम पर थोपना नहीं चाहते।”

हर माँ-बाप अपने बच्चे की बेहतरी चाहते हैं। और हमारे इन्जीनियर-डॉक्टर बनने बनाने के पीछे भी उनकी सोच यही है कि उनका बच्चा एक दिन स्वावलंबी बने और खड़ा हो सके। इन फ़ेमिनिस्टों को ये नहीं दिखा कि दो लड़की के निकर पहनकर गाँव में दौड़ना शुरू करने से लेकर, उन्होंने हर क़दम पर कितने स्टीरियोटाइप का तोड़ा है। उन्हें ये नहीं दिखता कि आज उसी हरियाणा के गाँव में लड़कियाँ कुश्ती लड़ती हैं।

ये एक खुजली है जो नए-नए नारीवादियों को होती है। इसका कीड़ा सबसे ज्यादा फ़र्स्ट और सेकेंड ईयर में पढ़ने वाले अंग्रेज़ी ऑनर्स वालों को होता है। उनको फ़ेमिनिज़्म का एफ़ नहीं पता, लेकिन ऐसे-ऐसे शब्द बोलेंगे कि बाप रे बाप!

ये वही फ़ेमिनिस्ट हैं जो फ़ेसबुक पर ज्ञान देते हैं और घर में अपने पिता के कहने पर अपनी कास्ट का लड़का ढूँढते हैं प्रेम करने के लिए। ये वही हैं जो सुबह जब नौकरी पर निकलती हैं तो पति के लिए खाना बनाकर, बच्चों के टिफ़िन पैक करके निकलती हैं, लेकिन यही काम गाँव में मेरी माँ करती है तो वहाँ फ़्यूडलिज़्म दिखता है। वहाँ एक हाउसवाइफ़ का काम इनको डिमीनिंग लगने लगता है। लेकिन तर्क के समय ये वेश्या के काम को डिग्निफाइड कहते हैं, क्योंकि ये उसकी च्वाईस है।

मुझे भी वेश्या का काम डिग्निफाइड लगता है, ना ही उसमें कोई बुराई है लेकिन ये कहना कि साक्षी तँवर तो फ़िल्म में बस बच्चे पैदा कर रही है और खाना बना रही है, तो ये आपका वैचारिक दिवालियापन है। तो क्या साक्षी तँवर बच्चे पैदा ना करे और कहे कि ‘माह लाइफ, माह रूल्ज़’? या वो खाना बनाना छोड़कर बोले कि मैं तो सुल्तान देखूँगी टीवी पर रिपीट मोड में?

ये फ़ेमिनिस्ट ये क्यों नहीं मानते कि एक गाँव की स्त्री की ये च्वाइस हो सकती है कि वो घर सँभाले। मेरी माँ अगर मेरे कपड़े धो रही है, तो उसमें वो एक हीन काम नहीं कर रही। वो खाना बनाती है तो वो कोई घटिया काम नहीं है। घर सँभालना भी एक काम है और इन फ़ेमिनिस्टों की माँ भी यही काम करती होगी लेकिन फ़ेसबुक पर कौन देखने जा रहा है। वाईफ़ाई चल रहा है, ज्ञान बाँट दो। लौंडे बैठे हैं, लाइक करते रहेंगे और हर कमेंट पर जाकर आप ‘एग्जेक्टली यॉर… हाऊ कैन शी डू दैट? हाऊ कैन यू शो द गर्ल्स इन दैट वे! दिस इज़ कम्प्लीटली अनएक्सेप्टेबल।’

गाली को जस्टिफाय किया गया है, ऐसा भी कहीं पढ़ा मैंने। इनको यथार्थवादी सिनेमा भी चाहिए और फिर डायलॉग में इनके हिसाब का संस्कारी भजन भी चाहिए। और गाली का मतलब इस फ़िल्म में डाँट से है। हर जगह गाली का मतलब मादर-फ़ादर ही नहीं होता। और हाँ, फ़िल्म के शुरूआत में ही गाली देने वाले लौंडों को दोनों बहनें धो देती हैं। जब बबीता कहती है कि ‘क्या होगा दो चार गाली पड़ेगी, सुन लेना’, तो इसका मतलब ये नहीं कि महावीर सिंह ने अपनी बेटी को गाली दी होगी। बिना फ़िल्म देखे, या देखकर इस तरह की व्याख्या करना आपकी मानसिकता और समझ पर सवाल खड़े करता है।

इनके हिसाब से बायोपिक को भी मोडिफाय किया जाना चाहिए। फ़ीमेल लीड जब झंडे गाड़ रही है तो ये कहेंगे की झंडे क्यों दिए जबरदस्ती, वो ख़ुद लेती। अगर गीता और बबीता ने ख़ुद झंडे लेने की सोची होती ना तो उसकी शादी चौदह साल में हो जाती और वो भी चार बच्चे पैदा करके कहीं खाना बना रही होती। वो उस समाज का नायक नहीं होती जहाँ नायिकाओं का अभाव है।

फ़िल्म में जबरदस्ती अपना अधकचरा ज्ञान और लंद-फंद-देवानंद टाइप का फ़ेमिनिज्म मत पेला करो। इसी फ़िल्म में वो डायलॉग्स भी हैं जहाँ गीता और बबीता ख़ुद डिसाइड करती है कि उसे कुश्ती करनी है। उसी में ये डायलॉग भी है कि जब वो जीतेगी तो पूरे देश की हर लड़की जीतेगी, जब वो लड़ेगी तो उसकी लड़ाई सिर्फ एक प्रतिद्वंद्वी से नहीं, बल्कि हर उस मुँह से है जो उनके ख़िलाफ़ आवाज लगाता रहा है।

लेकिन जाओगे लंपट विचार लेकर, फ़ेमिनिज़्म का चरस बोने तो फ़िल्म में वही दिखेगा जो तुम्हारे घटिया दिमाग़ में बैठी पूर्वाग्रह ग्रसित सोच है। मत देखा करो। फ़ेमिनिज़्म का मतलब ये नहीं है कि कुदाल लेकर खुदाई करने लगे हर जगह। नहीं है तो खोद के निकालें। फ़ेमिनिज़्म अपने अधिकारों की लड़ाई है, बराबरी का हक माँगना है, समाज में लड़के-लड़कियों को लिंग के आधार पर भेदभाव से बचाना है।

फ़ेमिनिज़्म का अर्थ ये नहीं है कि मर्द जो भी कर रहा है उसमें ग़लती निकालो। फ़ेमिनिज़्म ये नहीं है कि अपने बाप से पूछ बैठे कि हमको पूछ कर पैदा किया आपने? मेरे हिसाब से पूछना चाहिए कुछ लोगों को अपने बापों से, फिर लिखना चाहिए कि उन्होंने क्या कहा। माँ-बाप का काम है तुम्हारी परवरिश और जब तक तुम नाबालिग़ हो, वो तुम्हारे भलाई के लिए, अपने अनुभवों के आधार पर फ़ैसले लेंगे।

जब तुम इस स्थिति में आ जाते हो कि अपना रास्ता चुन सको तो फिर उन्हें बताओ, समझाओ और चुनो। नहीं तो झोला उठाओ और निकलो। बाप का एटीएम हाथ में लेकर लालबाबू बने फिरने वाले बहुत फ़ेमिनिस्ट और इन्डिविडुअल फ़्रीडम पर आख्यान लिखने वाले हमने देखे हैं। आठ साल के प्रेम को ये कहकर तोड़ने वाले फ़ेमिनिस्ट भी देखे हैं कि ‘पापा ने कहा है तुम्हारा कास्ट अलग है।’

इन विशेषज्ञों की राय से बचकर जाईए और ‘दंगल’ देखिए। नारी सशक्तीकरण पर बनी, सच्ची कहानी पर आधारित, फ़िल्मों में ये मील का पत्थर साबित होगी। इससे हर लड़की को कुछ ना कुछ सीखने को मिलेगा। इससे हर लड़के को, हर मर्द को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। ये जीवटता और जुनून की कहानी है जो बाप के हृदय से उतर कर बेटियों की बाँहों के द्वारा जी ली जाती है। इसे देखिए क्योंकि इसे देखना चाहिए।….

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