काहे बे चूतिये, राम काहे शर्मिंदा होंगे?

जो लोग ध्यान से नहीं पढ़ते, या पहले से ही सोचकर आते हैं, या उनके कुछ विचार हैं, तो वो लोग बहुत कुछ ऐसा भी पढ़ लेते हैं जिसको न तो मैंने लिखा होता है, न ही मंशा होती है।

जैसे कि उन्नाव केस में मैंने कभी भाजपा या उसके विधायक को डिफ़ेंड नहीं किया। जैसे-जैसे जानकारी मिली, उस हिसाब से पोस्ट लिखा। मेरी आपत्ति इस बात से थी, और है, (लेकिन इस पर किसी कमेंट का जवाब नहीं दूँगा) कि प्रधानमंत्री क्यों बयान दे। तर्क यह है कि प्रधानमंत्री हर बलात्कार पर बयान नहीं दे सकता। फिर कहता हूँ कि इस विषय पर जवाब देकर मैं थक गया हूँ, अब डिलीट करूँगा या जवाब नहीं दूँगा।

इसमें केस पुलिस के हाथ से, कोर्ट की फटकार के बाद, सीबीआई को दी गई। देर से आरोपी पकड़ा गया और अब आगे कानून अपना काम करेगा। मेरी एक और राय है कि सजा आदमी के स्टैचर के हिसाब से मिलनी चाहिए। मतलब अगर एक ही क्राइम अगर आम आदमी करता है, और वही क्राइम अगर एक जनप्रतिनिधि या सेलिब्रिटी करता है तो सजा में अंतर होना चाहिए क्योंकि ज़िम्मेदारियाँ अलग-अलग होती हैं।

दूसरा केस जम्मू वाला है। जिसमें आरोपियों को बचाने के लिए रैली निकाली गई और उसमें कथित तौर पर वंदे मातरम्, जय श्री राम के नारे लगे और तिरंगा लेकर लोग शामिल हुए। किसी ने कहा कि ये प्रायोजित भीड़ थी मौक़े पर बवाल काटने के लिए तैयार। किसी ने कहा कि वहाँ के ही स्थानीय लोग थे। ग़ौरतलब बात ये है कि इसमें भाजपा गठबंधन सरकार के दो मंत्री शामिल हुए।

ये केस एफआईआर पढ़कर ऐसा ही लगता है कि हिन्दू-मुसलमान एंगल से ही किया गया था। इसलिए ये केस कम्यूनल है, कोई सामान्य नहीं। लेकिन इसके झंडे और नारों के आधार पर ये लिखना और पूरे हिन्दू धर्म को घेर लेना कि हिन्दुओं शर्म से डूब मरो, राम शर्मिंदा होंगे, देशभक्त लोग ये कर रहे हैं, तिरंगा फहराने वाले देखो कैसे रेपिस्ट के समर्थन में खड़े हैं, वंदे मातरम् कहने वाले आतंकियों की फ़ौज देखो, ये निहायत ही गिरी हुई हरकत है।

इसे ही दोगलापन कहा है मैंने। तीन महीने बाद ये केस सामने आता है, और फिर इसको मीडिया अटेंशन मिलती है। फिर इसमें शामिल कुछ लोगों की भीड़ के आधार पर पूरा धर्म ही बलात्कारियों का समर्थक हो गया? आप किस आधार पर हर तिरंगा फहराने वालों को उन उन्मादियों के साथ रख देते हैं? किस तर्क से वंदे मातरम् कहने वाले आतंकी हो गए?

आप ही तो कहते अघाते नहीं कि आतंक का कोई धर्म नही होता और बुरहान वनी के जनाज़े की भीड़ में, याकूब के जनाज़े की भीड़ में लोग लाश को सम्मान दे रहे थे न कि आतंकी के समर्थन में थे। मतलब हम ही चूतिए हैं जिसे साला ये समझ में नहीं आता कि टोपी लगाकर आतंकी के लाश को कंधा देना लाश को सम्मान देना है न कि आतंकी से सहानुभूति रखना क्योंकि वो मुसलमान था!

फिर भी हम चुप रहते हैं। लोगों को कहते हैं कि जब तक एक मुसलमान भी सही हो, तब तक हर मुसलमान को आतंकी कहना या समझना गलत है। फिर ये दोगलापन कहाँ से आता है ऐसे लोगों में जो जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं, और अच्छी तरह से समझते हैं कि अगर हिन्दू इस तरह से बलात्कारियों या अपराधियों का समर्थन करने लगता तो देश में हर दिन ऐसी भीड़ें दिखती। फिर ये दोगले ये क्यों लिखते हैं कि ‘वंदे मातरम् कहने वाले आतंकियों की भीड़’, ‘शर्म करो हिन्दुओं, तुम्हारे राम शर्मिंदा होंगे’…

काहे बे चूतिये? राम काहे शर्मिंदा होंगे? अल्लाहु अकबर कहकर बम फोड़ने वालों पर अल्लाह को तो शर्मिंदा होते नहीं सुना! तुम जैसे लिब्रांडुओं को कहते और लिखते सुना और देखा कि ये असली मुसलमान नहीं है। फिर अभी कौन सा कीड़ा पिछवाड़े में घुस जाता है कि सौ लोगों की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती दिख जाती है?

मैं जब लिखता हूँ तो इसी सोच को गरियाता हूँ जो दो जगह पर दो तरह की बातें करता है। जिनकी सोच नाजायज़ है। जो गंदी नाली में सड़ने वाली सोच लेकर पैदा हुए हैं। ऐसे लोगों की भी उँगलियाँ हैं, और दुर्भाग्य से इनके माँ-बाप ने इन पर पैसे ख़र्च किए पढ़ाने को। और ये घृणा के शिकार, अंधविरोध में फ़्रस्ट्रेटेड लोग ऐसी बातें लिखते हैं जिनको पढ़कर इन्हें खुद शर्म आती होगी लेकिन क्या करें, जिस गर्त में ये गिर गए हैं, वहाँ से लौटना नामुमकिन है।

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