प्रिय कॉन्ग्रेस, चुनाव जीतने हैं तो बिहेव लाइक अ नेशनल पार्टी

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मैं राजनीति शास्त्र का छात्र नहीं हूँ। मैं देश के चुनावों को भी बहुत ज़्यादा फ़ॉलो नहीं करता। विद्यार्थी चुनाव मुझे समय की बर्बादी और विद्या के संस्थानों के संसाधनों का दुरुपयोग लगता है। विदेश में क्या होता है, और वहाँ से क्या आता है इस पर भी मैं सामान्य बुद्धि का ही इस्तेमाल करने में यक़ीन रखता हूँ। इसलिए, मुझे फ़लाँ देश में किसकी सरकार आ गई, उसमें भी रुचि नहीं रहती।

इन सबके पीछे का एक कारण मुझे ये लगता है कि सैकड़ों चेनलों पर बैठे सैकड़ों चुनाव विशेषज्ञ, दसियों सर्वे और फ़लाने पोल्स के बावजूद तुक्केबाज़ी से ज्यादा कुछ नहीं बता पाते। इन सर्वे के नतीजों का गलत होना लगभग तय रहता है, या फिर जिनका लड़ गया, वो महज़ एक संयोग होता है। इसके पीछे कारण ये भी है कि भारत को वोटर बड़ा ही घाघ होता है। वो आपको बताएगा कुछ, वोट देगा किसी और को।

दूसरी बात ये भी है कि सर्वे कराने वाले जो टूल्स इस्तेमाल करते हैं, जिन लोगों से कराते हैं, वो लोग आम तौर पर घर में बैठकर फ़ॉर्म भर लेते हैं, और उसी के आधार पर ये सर्वे आपको मिलता है। एग्जिट पोल संविधान का मजाक उड़ाने जैसा है। जब वोट देता आदमी किसी को नहीं दिखता, तो फिर गेट के बाहर उससे ये पूछना कि किसको वोट दिया, ये ग़ैरक़ानूनी क्यों नहीं है।

जब विद्यार्थी चुनावों पर भी एक लाइन लिख दिया, तो ये जानिए कि मैं ऐसा क्यों मानता हूँ। विद्यार्थी चुनाव क्यों होते हैं? ताकि विद्यार्थियों का पक्ष रहे विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष। लेकिन इन चुनावों के बाद ऐसा क्या परिवर्तन आ जाता है, मुझे पता नहीं चलता। ख़ासकर, आज के परिवेश में ये चुनाव बड़ी पार्टियों द्वारा मोलेस्ट होते रहते हैं। यूनिवर्सिटी में छात्रहित (खाना, हॉस्टल, शिक्षा की गुणवत्ता आदि) के लिए के डिपार्टमेंट बना देना चाहिए। क्योंकि चुनावों के दौरान जितनी हिंसा, समय की बर्बादी और शराब-चखना बाँटा जाता है, उससे कम से कम शिक्षा के संस्थानों को बता कर रखना चाहिए। इसके और भी पहलू हैं, पर मोटामोटी यही कहना है मुझे।

गुजरात में चुनाव हो रहे हैं। ट्विटर पर राहुल गाँधी को एक नई दिशा मिल गई है। मोदी ने जो काम सात साल पहले से शुरु कर लिया था, वहाँ कॉन्ग्रेस आज पहुँच रही है। ये उनकी पिच पर खेलने जैसा है। क्योंकि भाजपा ने भक्तों की एक फ़ौज बना ली है, कॉन्ग्रेस को समय लग रहा है ऐसी तैयारी में। भाजपा की उपस्थिति इतनी प्रबल है कि बोलने वाले चुप रहने लगे हैं, क्योंकि इसके समर्थक नीच पत्रकारों के घटिया अजेंडे को निम्न स्तर की गालियों से इतना स्पैम करते हैं कि वो आवाज़ खो जाती है।

क्या ये सही है? बिलकुल सही है। क्यों? क्योंकि आपने अजेंडा चलाने का एक मार्ग मीडिया के पुरोधाओं, पोषित विचारकों के लेख, कॉलम आदि से निकाला था। सोशल मीडिया पर हज़ार शब्दों के अजेंडे को हज़ार शब्दों के बेहतर लेख से काटने की जगह दूसरा तरीक़ा ये है कि आपकी अभिजात्य शब्दों में सनी घृणा को खुल्लमखुल्ला गालियों से दबा दिया जाय।

क्योंकि जितनी हानि आप समाज को पहुँचा रहे हैं, उसकी भरपाई के लिए आपको चुप कराना जरूरी है। आपकी अभिव्यक्ति अभिजात्य है, इनकी माँ-बहन की गाली वाली है। न तो आपकी अभिव्यक्ति सही है, क्योंकि आप समाज के विचार को कुत्सित बनाने की फ़िराक़ में हैं, न ही इनकी जो कि आपको गालियाँ देते हैं। लेकिन इससे फ़ायदा समाज का होता है कि आपके जैसे बेहूदे अजेंडाबाजों की बारम्बारता कम होती जा रही है। जैसे कि ग़रीबी को स्टेट-सपॉन्सर्ड ‘वायलेन्स’ (ऑफ़ अदर काइंड) मानकर आप सरकारी मुलाजिमों का दाँतेवाड़ा में हुए नरसंहार को वायलेन्स का जवाब वायलेन्स कहते हुए जस्टिफाय कर देते हैं, वैसे ही आपके अजेंडे को घृणा (ऑफ़ अदर काइंड) मानकर गालियों से ढक दिया जाता है। ये भी अभिव्यक्ति का जवाब अभिव्यक्ति (ऑफ़ अदर काइंड) से देना है।

ट्विटर पर राहुल गाँधी ग़ालिब के अश’आर से लेकर, आइकिदो करते नज़र आते हैं। ये एक इमेज बिल्डिंग की दूसरी कोशिश है। पहली बार जापानी कम्पनी तेल लगाकर भाग गई, इमेज का क्या हुआ वो तो आपको पता ही है। अब राहुल गाँधी हिन्दू बनते नज़र आ रहे हैं। मैं इसका स्वागत करता हूँ। ये कम से कम दंगों में शरीक होने जैसा तो नहीं है। इनकी पार्टी के नाम इतने दंगे हैं कि गिनने वाले थक जाएँगे। शायद यही कारण है कि गुजरात के चुनावों में कोई 2002 को याद नहीं कर रहा।

अब कॉन्ग्रेस को शायद केजरीवाल से सबक़ मिला है कि भाजपा और मोदी को गरियाने की बजाय उनकी नीतियों की आलोचना ज्यादा सही अप्रोच है। ये एक हद तक सही भी है। लेकिन कॉन्ग्रेस यहाँ पर भी सिवाय सतही बातों और ट्विटरिया जुमलेबाजी के एक भी सटीक सवाल पूछती नज़र नहीं आती। जुमलेबाजी से मोदी ऑलरेडी लोकसभा और आधा भारत जीत चुका है।

गाँव में कहते हैं कि तुम जो आज कर रहे हो, वो हम करके छोड़ चुके हैं, तो कॉन्ग्रेस अभी भी भाजपा के पीछे ही चल रही है। वो उन्हीं की योजना का अनुपालन करती दिखती है, जिसका जवाब भाजपा को पुराने अनुभव के दम पर पता होती है।

कॉन्ग्रेस को चुनावों के समय जगने की बजाय, पूरे साल अपने कार्यकर्ताओं के द्वारा इंटरनेट से, या कहीं से भी, लगातार सरकार की नीतियों के बारे में आँकड़े लाकर, आम भाषा में लोगों तक बात पहुँचाने की कोशिश करनी होगी। ट्विटर से आप इस देश में चुनाव नहीं जीत सकते। वो महज़ एक ज़रिया है, वो मुख्य बात नहीं है क्योंकि देश की जनता ट्विटर पर नहीं है।

भाजपा के भक्तों और बाक़ियों के भक्तों में एक बुनियादी अंतर है। वो ये कि भाजपा के भक्त मोदी को रास्ते से भटकने पर गरिया भी लेते हैं, लेकिन कामपन्थी वामभक्त मार्क्सनंदन माओवंशी टाइप तथा कॉन्ग्रेस समर्थक अपने नेताओं की ग़लती पर भी, अपनी विचारधारा की ख़ामियों पर चुप रहना पसंद करते हैं। यहीं वो मात खा जाते हैं। यही कारण है कि भक्तों के ‘व्हाट अबाउट’ वाले कई प्रश्नों का माक़ूल जवाब इन्हें नहीं मिलता।

कॉन्ग्रेस गुजरात में जीतेगी कि नहीं, मुझे नहीं पता। न तो मैं गुजरात गया, न ही वहाँ के लोगों से बात की, न ही सर्वे या पत्रकारों पर मेरा विश्वास है। साथ ही, मैं ये भी मानता हू कि एक दिन रिजल्ट आ ही जाता है, तो बाकी समय मैं जोड़-घटाव क्यों करूँ?

कॉन्ग्रेस को अगर भाजपा को 2019 में चुनौती देनी है, जीत तो छोड़िए, तो इसे खुद को रीजनल पार्टी की तरह व्यवहार करने से बचना चाहिए। ये देशहित में होगा कि देश की सबसे बड़ी, सबसे पुरानी पार्टी, अपने वजूद को तलाशे, ये याद करे कि वो कितनी बड़ी है। उसे ये समझना होगा कि वो इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस है, न कि फ़लाना कॉन्ग्रेस दल, फ़लाना मूल कॉन्ग्रेस, फ़लाना कॉन्ग्रेस यूनाइटेड। अपने आप को जब तक कॉन्ग्रेस सीरियसली नहीं लेगी, और टुच्चे क्षेत्रीय पार्टियों के बल पर चुनाव लड़ना बंद नहीं करेगी, इसे 2024 भी भूल जाना चाहिए।

आप इतनी बड़ी पार्टी होकर लालू के राजद के साथ हो लेते हैं? किस नाम पर? सेकुलर गठबंधन! सीरियसली? आप एक क्षेत्रीय पार्टी की पूँछ बन रहे हो, और कितने दिनों तक कहते फिरोगे कि ये राष्ट्रहित में है? क्या कॉन्ग्रेस का एक ज़मीनी कार्यकर्ता निराश नहीं होगा कि उसने जिस पार्टी के लिए पंचायत से लेकर ज़िला, राज्य और लोकसभा के स्तर तक काम किया है, वो किसी राजद, किसी सपा, किसी बसपा के साथ हाथ मिलाती दिखती है कि जीतने पर दो मंत्री बनवा ले?

ये सामान्य बुद्धि का सवाल है। कॉन्ग्रेस को आलाकमान से फ़ैसले लेकर, कार्यकर्ताओं को डिफ़ेंड करने के लिए फेंकने की बजाय, कार्यकर्ताओं की मर्ज़ी जानकर कार्य करना चाहिए। लम्बे दौर में बने रहने के लिए, शुरुआत धीमी भी रहे तो कोई बात नहीं।

किसी भी लोकतंत्र में एक विचारधारा का प्रबल होना बहुत ही भयावह होता है। हर जगह इसके उदाहरण देखने को मिले हैं। भारत में हर जगह अगर भाजपा इसी तरह के बहुमतों से सरकार बनाती रही, तो धीरे-धीरे दूसरी विचारधारा की बात बंद हो जाएगी। वैसे कुछ की बंद होनी भी चाहिए क्योंकि उनके दिन पूरे हो गए हैं।

जब तक एक सक्षम विपक्ष, और बेहतर विकल्प नहीं मिलेगा, सत्ता पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं होगा। भारत की मीडिया दो धरों में बँटी हुई है, जो न्यूट्रल हैं वो सरकारों के बदलते ही हवा के साथ हो लेते हैं। सोशल मीडिया पर भाजपा की इतनी तगड़ी पैठ है कि व्हाट्सएप्प के ज़रिए झूठी ख़बरों का ग़ज़ब का जाल फैला हुआ है। व्हाट्सएप्प से वैसे दूसरे पक्ष के लोग दंगे भी कराते हैं। बंगाल, जयपुर आदि में पंद्रह मिनट में रॉड, मशाल और पत्थरों से लैस भीड़ों का पंद्रह मिनट में सड़कों पर आना भी इसी का कमाल है। और ‘फ़लाने जगह से गाय से लदी लॉरी निकलने वाली है’ की ख़बर भी इसी तरीक़े से पहुँचती है।

चर्चा का स्तर जब तक गिरा रहेगा, सत्ता आप की बातों का जवाब भी नहीं देगी क्योंकि उसको पता है कि उसको क्या अजेंडा, कहाँ और कैसे फैलाना है। उसका एक स्थापित तंत्र है। आप उसी की भाषा, योजना और चैनलों के इस्तेमाल के तरीक़ों से उसे नहीं हरा सकते। आप लम्बे समय के हिसाब से सोचिए।

देशहित में चौवालीस सीटें बहुत ही बेकार का आँकड़ा है। राज्यों में भी किसी तरह सरकार बना लेना कोई तीर मारना नहीं है। भाजपा हर जगह, अपवादों को छोड़कर, आपको ऐसे तोड़कर हराती है कि आपके कार्यकर्ताओं को सिवाय सके कि ‘राहुल बाबा को अध्यक्ष बना दो’, कुछ नहीं सूझता।

कभी किसी ने सोचा है कि राहुल गाँधी अध्यक्ष बन ही जाए तो क्या हो जाएगा? कब तक एक नकारे आदमी को, जिसको न बोलने आता है, न अपने कार्यकर्ताओं के बीच बैठने की इच्छा होती है, आप ढकेलते रहेंगे कि यही भविष्य है? कब तक प्रियंका गाँधी को चुनावों के दौरान साड़ी में आयरन करवा कर इंदिरा का डुप्लीकेट बनाकर इस्तेमाल करते रहोगे?

लेकिन विकल्प भी क्या है! राहुल गाँधी के अलावा गाँव के आम लोग कॉन्ग्रेस के दूसरे नेताओं को जानते भी नहीं। पब्लिक कनेक्ट राहुल गाँधी के नाम से ही है। तो, बिना जो है, उसी को पॉलिश करना पड़ेगा। नया लाएँगे तो बहुत लम्बा इंतजार हो जाएगा। फ़िलहाल, लोकतंत्र की बेहतरी के लिए कॉन्ग्रेस को लम्बे दौर में वापसी की योजना बनानी चाहिए।

ट्विटर का खेल मोदी खेल चुका है, और कई बार जीत चुका है। अब राहुल के स्तर के ट्वीट भक्तगण खुद कर देते हैं। कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से कोई भी कैम्पेन चलता है तो उसको भक्त कहाँ भेज देते हैं, ये पता ही होगा। तो कुछ नया सोचो। मेंटोस खाओ, दिमाग की बत्ती जलाओ। सामर्थ्यवान विपक्ष लाओ, देश को बचाओ। वरना भाजपा और मोदी का कोई विकल्प नहीं है। होता तो आपको महागठबंधन, सेकुलर पार्टियाँ साथ होकर लड़ेंगीं, अठारहवाँ फ़्रंट, यूनाइटेड फ़लाना अलायंस बनाने की ज़रूरत नहीं होती।

नेशनल पार्टी की तरह बिहेव करना शुरू करो, कॉन्ग्रेस वालों! ‘राहुल’ को ‘राज’ का हुलिया देकर ‘हाय ब्रो, आई एम कूल’ कहने से पिक्चर हिट नहीं होगी। अपने दर्शकों को पहचानो, तभी बिना कहानी के भी दो सौ करोड़ कमा पाओगे।

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