प्रिय रवीश जी, पत्रकारिता के आलोकनाथ मत बनिए

(आर्टिकल का विडियो यहाँ देखें)

प्रिय रवीश जी,

आपका ‘आकाश में झूठ की धूल’ वाला लेख पढ़ा। मूड ख़राब हो गया। क्योंकि इस झूठ की धूल में आपने भी तो खूब गर्दा उड़ाया है, फिर आप पत्रकारिता के आलोकनाथ क्यों बनना चाह रहे हैं? शुरुआत आपने उस शब्द से की है जो आपके हर चौथे प्राइम टाइम में पाँच मिनट ले लेता है: भय। भय शब्द से आपको इतना प्रेम है कि आपको स्टूडियो से बाहर गए बिना, चार-पाँच ट्रोल करके गरियाने वालों की बातों से भय होने लगा है!

बाहर निकला कीजिए, धूप में विटामिन डी होता है। ये बात मैंने क्यों कही, जबकि इसका कोई संबंध नहीं है? वो इसलिए कि आपकी बातों का भी समाज के वर्तमान परिदृश्य से कोई संबंध नहीं है। आपको अजेंडा चलाना है, वो आप बख़ूबी चला रहे हैं। हो सकता है आप निःस्वार्थ ये कार्य कर रहे हों, राजदीप या सगारिका की तरह नहीं, लेकिन कर आप अजेंडाबाजी ही रहे हैं।

चूँकि आपके मतलब की सरकार नहीं है, तो वो भय का गणतंत्र हो गया और आकाश में झूठ की बदली छा गई? आगे आपने लिखा है कि देश में एक आंदोलन का माहौल था, लोग विकल्प तलाश रहे थे, और एक विकल्प उभरा। आप ये लिखना भूल गए कि देश में आंदोलन का माहौल किस पार्टी के शासनकाल के कारण बना था। आप ये बताना भूल गए कि जनता का आक्रोश, जिसे आपने ‘रेबेल जनादेश’ लिखा है, वो कॉन्ग्रेस की नीतियों और लूट के कारण था।

ये जनादेश भाजपा को मिला, जिसके पुरज़ोर विरोध में आप बिना बात के ही, अपने ही द्वारा बनाए गए सूक्ति वाक्यों के निर्देशन के हिसाब से खड़े दिखते हैं। आक्रोश के जनादेश को भय के जनादेश में बदल दिए जाने की बात कैसे पता चली आपको? क्या इस बात से कि हर रोज ‘भय का माहौल है-भय का माहौल है’ रटने से आप सच में डर में जीने लगे हैं? बार-बार किसी बात को दोहराइएगा तो सच में वैसा विश्वास होने लगता है। आपके साथ वही हुआ है। आप पत्रकार हैं, नेता मत बनिए। पत्रकार का काम ख़बर पहुँचाना होता है, उसे समझने में मदद करनी होती है, पक्ष पकड़कर झूलना नहीं होता। आप झूल रहे हैं क्योंकि आपको आदत हो गई है।

आगे आपने लिखा है कि ऐसा माहौल बना दिया गया है कि आदमी सवाल नहीं कर सकता। आपको सवाल पूछने नहीं दिया गया, तो आपको लगता है कि कोई भी सवाल नहीं कर पा रहा? आप रोज प्राइम टाइम में जो अंजेंडाबाजी करते हैं, और सवाल पूछते हैं वो क्या है? हवाहवाई बातें करते हुए, किसी से व्यक्तिगत घृणा पालकर, उसे अपनी इच्छा से ‘अवतार’ कहते हुए, आप खुद ही उसे अपने घृणा के लिए मूर्ति के रूप में हर रोज तराश रहे हैं। आपको इससे किक मिलती है कि कोई सामने है जिसको आप जो चाहे कह सकते हैं, क्योंकि आपके पास माइक है।

आपने ये भी लिखा है कि आप जब उँगली उठाने लगे तो लोग आपसे सवाल पूछने लगे। ग़ज़ब बात है! आपको क्या यूएन से इम्यूनिटी मिली हुई है कि आपकी घटिया पत्रकारिता पर भी सवाल न उठे? आप मोदी के द्वारा इंटरव्यू न दिए जाने पर ये लिख रहे हैं कि देश में कोई सवाल ही नहीं पूछ पा रहा, और आपसे ये पूछ लिया गया कि कॉन्ग्रेस के काल में आप चुप क्यों थे, हिन्दुओं पर हमले के वक्त प्राइम टाइम क्यों नहीं, प्रणय रॉय कांड पर जाँच एजेंसियों की बातों पर सवाल क्यों नहीं, तब तो आप नई दुल्हन बनकर भारत में बाघों की घटती संख्या पर लेख लिखने लगते हैं! आपसे सवाल क्यों न किया जाय?

फिर आपको योजना आयोग के भंग कर दिए जाने से समस्या होती है मानो आपके मामाजी की नौकरी लगी थी, वो चली गई। किसी सरकार को उसकी उपयोगिता समझ में नहीं आई, और संवैधानिक दायरे में रहकर उसने एक जड़वत् संस्था को भंग कर दिया तो क्या दिक्कत है? उसकी जगह नीति आयोग आया, और अपना काम कर रहा है। आपको ये क्यों लगता है कि पचास साल पहले बनी संस्था की प्रासंगिकता आज भी बनी ही रहेगी? हो सकता है कि जिस विजन के साथ योजना आयोग को बनाया गया, वो हर पाँच साल पर परिणाम न दे पा रहा हो। हो सकता है वहाँ एक नए नजिरए की ज़रूरत थी, जिसे नई सरकार ने अपनाया। आपको इसके भंग होने से क्या प्रॉब्लम है?

उसके अगले पैराग्राफ़ में आप नीचे गिरते-गिरते बहुत नीचे गिर जाते हैं। लगता है कि आपको शब्द संख्या पूरा करने का टार्गेट था, और आपने ये पैराग्राफ़ घुसेड़ दिया। इस पैराग्राफ़ से साबित हो जाता है कि आपको सरकार की नीतियों से नहीं, उस व्यक्ति से विशेष घृणा है। आप लिखते हैं कि मोदी का खुद को प्रधान सेवक कहना एक झूठ था। ये झूठ क्यों और कैसे है, इसका कारण आप ये बताते हैं कि नेहरू जी ने ये बात बहुत पहले कही थी। मेरा सवाल ये है सर कि मोदी ने ये बात कहाँ क्लेम कर दिया कि वो खुद को प्रधान सेवक कहने वाला पहला आदमी है? आप तो इतनी नीचता पर उतर आए कि इसको प्लेजेरिज्म तक कह डाला!

एक पत्रकार का इस बात को प्लेजेरिज्म कहना हद दर्जे की बेवक़ूफ़ी है क्योंकि जो तर्क आपने दिए हैं उस हिसाब से नेहरू के द्वारा इस्तेमाल किए हुए शब्द, क्रिया, विशेषण, संज्ञा आदि तो पहले भी किसी ने बोले होंगे, तो क्या नेहरू को मैं चोर कह दूँ? या आप जो शब्द लिख रहे हैं उसे अमीर खुसरो ने पहले कहा तो मैं आपको प्लेजेरिज्म करने वाला बता दूँ? ये किस तरह की पत्रकारिता है भाई?

आपको दुःख होता है कि आपके पेशे के लोग आकाओं के क़दमों में झुकते चले जा रहे हैं। आपके भी तो लक्षण ठीक नहीं लग रहे रवीश जी! आप भी तो अपने आकाओं का बचाव करते रहते हैं। दो तरीक़े होते हैं बचाव के: एक है खुलकर कहना कि वो ऐसा नहीं है, दूसरा है उसकी बात ही नहीं होने देना। आप वही कर रहे हैं। आप पूरा घटनाक्रम, हर वादा, हर योजना, हर टार्गेट को 2014 के बाद ही जन्म लेता पा रहे हैं। उससे पहले न तो देश था, न ही उसकी समस्याएँ थीं। उसके पहले सबकुछ सही था। जैसे कि सरकार जब बदलती है तो उसे एक डिब्बे में देश दिया जाता है कि ‘लो, इसको तैयार करो’।

नहीं सर, देश विरासत में पास होता रहता है सरकारों को। किसी के किए हुए गड्ढे को भरने में बहुत समय लगता है। किसी को पहाड़ काटना होता है। ये भी सच नहीं है कि हर सरकार हर काम को घटिया या बढ़िया तरीक़े से ही करती है, लेकिन आप जिस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं, उससे लगता है कि देश में कुछ भी सही नहीं चल रहा। आपको लगता है कि भीड़ें हिंसक हो रही हैं, वो कानून अपने हाथ में ले रहे हैं।

आप जिस स्वचालित भीड़ की बात कर रहे हैं उसका अंदाज़ा आपको नहीं था क्योंकि आप उन्हीं तरह की भीड़ों के आतंक को छुपाते रहे ‘समुदाय विशेष’ कह कर और बाकी समय ‘हिन्दू ने मुसलमान को मार डाला’ की बातें की। आपने हर इस्लामी आतंक को, लिंचिंग को, दंगे को सामाजिक रूप से देखा, लेकिन जब हिन्दू या दलित का नाम हो तो आपने उसे साम्प्रदायिक और जातीय रंग देने में कसर नहीं छोड़ी। देश का हर दंगा भाजपा के नाम भले राज्य सरकार किसी और की हो; देश की हर मौत का ज़िम्मेदार मोदी, भले ही पुलिस किसी और सरकार की हो… जब तर्कों की कमी पड़ी आपको तो आपने ये नया टर्म इजाद किया है ‘स्वचालित भीड़’।

मैं आपकी रग-रग पहचान रहा हूँ। आप स्टूडियो में बैठे वो दंगाई हैं जो शब्दों से दंगे करवा सकता है। आप बार-बार अपनी बातों को साबित न कर पाने की स्थिति में ऐसे तर्क रखते हैं जिन्हें सत्यापित करना नामुमकिन है। जैसे कि ‘भाजपा के राज में लोगों को बल मिल रहा है’। ये कैसे नाप लें कि लोगों को बल मिल रहा है? लोग पागल हो रहे हैं तो सरकार कैसे ज़िम्मेदार है? क्या मोदी ने ये कह दिया इन घटनाओं की जाँच नहीं होगी? या वैसे लोगों को जेल में नहीं डाला गया? जयपुर में मुसलमानों की भीड़ ने पुलिस थाने को आग लगा दिया और अपने ऊपर के सारे केस हटवा लिए, तब तो आपको परेशानी नहीं हुई कि भय का माहौल कौन बना रहा है?

आपने एक और नई सूक्ति बनाई है कि ‘जनता का मतलब विपक्ष होता है’। लेकिन बात ये है कि ये फंडामेंटली ग़लत है क्योंकि उसी जनता ने बार-बार उसी पार्टी को वोट दिया है। आप अपने आप को जनता का प्रतिनिधि मत मानिए, कम से कम चुनाव लड़े बिना तो बिलकुल नहीं। ये फ़र्ज़ी बातें क्यों करते हैं आप? कोई चैनल नहीं देख रहा तो रिटायर हो जाइए। या फिर खुल्लमखुल्ला चाटुकारिता ही कीजिए, बहुत लोग कर ही रहे हैं चाहे सत्ता की हो या कॉन्ग्रेस की।

जनता का मतलब जनता होता है, जो कि लोकतंत्र में वोट देकर अपने पसंद के लोगों को संसद भेजती है, और सरकार चुनने का रास्ता बनाती है। जनता को जिसका मेनिफेस्टो सही लगता है, उसको वोट देती है। आप अपने आप को रवीश कुमार ही मानिए, आप जनता कुमार नहीं है। आप जनता का हिस्सा हैं, जनता नहीं। इसलिए सबसे कम देखे जाने वाले चैनल के एंकर की बात जनता की तो बात बिलकुल नहीं हो सकती। भारत में हिन्दी समझ सकते वाली जनता 40 करोड़ से ऊपर है, और आपके प्रोग्राम की टीआरपी कितने हज़ार में है ये आपको अच्छे से पता है। फिर आप जनता बनने का स्वाँग मत कीजिए। अच्छा नहीं लगता महाराज!

आपने अंत इस बात से किया है कि ‘मई 2019 तक इतना झूठ बोला जाएगा, जितना भारत में पूरी सभ्यता की यात्रा में नहीं बोला गया होगा’। ये आपने किस यंत्र से नापा मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे लगता है कि फ़्लो में बस लिख गए। इसका कोई मतलब को नहीं दिखता मुझे सिवाय इसके कि आपके आर्टिकल का शीर्षक ‘आकाश में झूठ की धूल’ है तो आपको लगा होगा कि बहुत भटक गए, टाइटल को जस्टिफाय कर देते हैं उपसंहार में। उसी में आपने कुछ महान लगने वाला टाइप वाक्य लिख दिया जिसमें ‘भारत में पूरी सभ्यता की यात्रा’ डाल दिया गया। ये इतना भारी है कि उठ नहीं पाया रवीश जी।

अंत में यही कहना चाहूँगा कि पत्रकार ही बने रहिए। आप अपना पेशा छोड़कर कॉमेडी करने लगे हैं। आपको लगता है कि आप ‘हें हें हें’ करके हँस लेते हैं, तो सब आदमी हँस रहा होगा, ऐसा नहीं है। आप व्यंग्य अच्छे करते हैं लेकिन व्यंग्यकार सच्ची बातों पर तंज करता है। आप फैक्ट मैनुफ़ैक्चर करके व्यंग्य बनाते हैं। वो तो कॉमेडी है कि संता और बंता कहीं जा रहे थे, केले का छिलका देखकर बंता रुक गया, फिर संता ने कारण पूछा तो बंता ने कहा कि यार छिलका पड़ा है, गिरना पड़ेगा।

ऐसे अच्छा नहीं लगता रवीश जी। आपको देखकर हिन्दी पट्टी वाले पत्रकारिता को करियर बनाते हैं। काहे कर रहे हैं ये सब? मत कीजिए।

 

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