डियर थरूर जी, मोदी के कपड़े खींचते हुए आप मोर बन जाते हैं

सामाजिक संरचना और उससे उपजा भेदभाव अंग्रेज़ी के ‘टेन्जिबल’ और ‘इन्टेन्जिबल’, दोनों ही, स्तरों पर दिखता है। टेन्जिबल यानि प्रकट रूप से, जिसे आप वास्तविक रूप से देख सकते हैं। इन्टेन्जिबल यानि वो दिखता नहीं, पर महसूस किया जा सकता है। तमाम तरह के ‘वाद’ हैं, जो कि नकारात्मक स्वरूप में हमारे हर तरफ दिखते हैं। उसी में एक बीमारी है ‘एलिटिस्ट’ मानसिकता वाली। 

यह एक ऐसी मानसिकता है जो अपने साथ एक तरह का कैंसर लिए चलती है: एनटायटलमेंट। एनटायटलमेंट का मतलब है कि आपको ऐसा लगता है कि किसी भी चीज पर आपका अधिकार है। ये मानसिकता तब आती है जब आप सत्ता और पैसे के बहुत क़रीब होते हैं। उसके बाद जब से दोनों चीज़ें, या एक भी, चली जाए तो आपको लगता है कि जो मेरा था, वो किसी और का कैसे। 

दूसरी बात है आज कल का पोलिटिकल डिस्कोर्स। हर पक्ष के नेता एक से एक क्रिएटिव मुहावरे, फब्तियाँ और शब्दों का प्रयोग करते नज़र आते हैं। इसमें एक समय में एक स्तर हुआ करता था। एक समय तक मजाक के लहजे में कुछ कहा जाता था, पार्टी के छोटे नेता भले ही कुछ भी बकवास करते हों, पर बड़े नाम आमतौर पर एक स्तर बनाकर रखते थे।

फिर सत्ता पर 55 साल आठों पाँव से जकड़ बनानेवाले साम्राज्य का पतन हो गया। उसकी चारदीवारी, क़िले और यहाँ तक की दरबारी तक भगा दिए गए। सत्ता गई, पार्टी को फ़ंड देने वाले हाथ खींचने लगे। लेकिन एलिटिज्म और एनटायटलमेंट तो मानसिकता का हिस्सा बन चुके हैं, तो ऐसे में जली रस्सी की ऐंठन तो रहेगी ही।

उसी का परिणाम ‘चाय वाला’, ‘नीच’, ‘ख़ून का दलाल’, ‘गंगू तेली’ से लेकर ‘मौत का सौदागर’, ‘ज़हर की खेती’ और तमाम तरह की उपमाएँ और बयान हैं। ये सारे बयान कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं के मुखारविन्दों से निकले हैं। और, हर बार चुनावों में जनता ने इसका जवाब दिया है। 

आज स्वयंसिद्ध डिक्शनरीबाज शशि थरूर ने नेहरू ख़ानदान से अपनी वफ़ादारी निभाते हुए ये कहा है कि किसी चायवाले के प्रधानमंत्री बनने के पीछे नेहरू द्वारा पोषित संस्थाएँ हैं। ये उसी पार्टी के शीर्ष नेता का बयान है जिसके कई नेता कई बार ये पता लगाने में व्यस्त रहे हैं कि मोदी न तो चाय बेचता था, न ही वो ओबीसी से है। 

पहले कॉन्ग्रेस के नेताओं को एक बात पर टिक जाना चाहिए कि वो मोदी को चायवाला मानता है कि नहीं? अगर हाँ, तो आगे बात करते हैं। नेहरू क्या था, क्या नहीं, वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं है। नेहरू ने कॉन्ग्रेस को एक पार्टी नहीं पारिवारिक संपत्ति की तरह पाला, और यही कारण है कि कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष राहुल गाँधी है। जबकि पूरा देश जानता है कि राहुल गाँधी किसी भी सरकारी स्कूल की कक्षा का मॉनिटर बनने के भी क़ाबिल नहीं है। 

इसलिए ‘लोकतंत्र’ और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पोषित करने के चुटकुले कॉन्ग्रेस के मुँह से अच्छे नहीं लगते। लोकतंत्र को राजतंत्र बनाने, और स्वयं को ही ‘भारत रत्न’ मानने वाले चोरों के ख़ानदान ने इस देश को जो भी देने की बातें की हैं, वो डाके डालने के बड़े प्रयोजन थे। जो भी विकास हो पाया वो बस इसलिए कि प्रोजेक्ट को लूटने के लिए प्रोजेक्ट बनाना तो पड़ेगा ही। 

नेहरू ने कुछ किया हो या न किया हो, उसने ये ज़रूर किया कि उसके बच्चे प्रधानमंत्री ज़रूर बनें। चायवाला तो चायवाला ही रहेगा, ये भी तय ही था। उसके समय के कितने नेताओं को आज के भारत में किस पत्थर पर कितनी जगह हासिल हुई है ये सबके देखने की बात है। मजबूरी में ही परिवार से बाहर का कोई प्रधानमंत्री बना है इनके 55 साल के राज में। इतिहास देख लीजिए। 

जिस विकास और सामाजिक समानता की बात कॉन्ग्रेस करती है, वो विकास होने की एक नैसर्गिक प्रक्रिया का चरण है। सामाजिक समानता की बात तो ऐसे लोगों के मुँह से शोभा नहीं देती जिसके लिए किसी निचली जाति के चायवाले का प्रधानमंत्री बनना इतना दुखदायी है कि हर चुनाव में इनके नेता अपशब्द और घटिया मुहावरे लेकर उपस्थित हो जाते हैं। 

ये लोग सामाजिक समानता की बातें करेंगे जिनके लिए सत्तर साल बाद भी ‘गरीबी हटाओ’ एक प्रमुख नारा है? ये लोग सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पालने की बातें करेंगे जिन्होंने हर संस्था पर एक परिवार के पाँच लोगों के नाम चिपका रखे हैं? ये लोग सामाजिक समानता की बात करेंगे जो प्रधानमंत्री और पार्टी विशेष की घृणा में इतना गिर चुका है कि जातिवादी गालियाँ देकर ‘नीच’ आदमी और ‘गंगू तेली’ जैसे आक्षेप करके अल्पवयस्कों की तरह आपस में खीं-खीं करके हँसता है?

इनकी सड़ी हुई मानसिकता, सत्ता से दूर होने और भविष्य में बेघर होने की सोच की सिहरन से ऐसे शब्द बोल जाती है जो कि इनके अंदर, बंद कमरों में, बसती है, बोली जाती है। शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर, गुलाम नबीं आज़ाद, राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी जैसे लोगों की बिलबिलाहट उनसे ऐसी भाषा बुलवा लेती है। 

ये कोई मिसकोट नहीं है। ऐसी बातें फ़्रस्ट्रेशन हैं, छटपटाहट है, अभिजात्यता की ऐंठ से जनित सोच है। ये अगर बाहर नहीं आएगा तो ये लोग सड़कों पर कुत्तों की तरह आते-जाते भाजपाइयों या उनके समर्थकों को दाँत काटने लगेंगे। दाँत काटने से बेहतर है कि अंग्रेज़ी में ऐसे बयान दो कि आदमी को समझने में दो मिनट लगे कि क्या बोल गया। 

नेहरू मर गया। नेहरू अगर प्रधानमंत्री था, तो वो एक बाप भी था। फिर उसकी बेटी आई जो प्रधानमंत्री थी, और एक माँ भी। फिर उसका बेटा आया जो एक प्रधानमंत्री था, और पारिवारिक परम्परा के हिसाब से बेटे को सेटल करने वाले बाप का दायित्व पूरा कर पाता, उससे पहले उसकी हत्या कर दी गई। अब एक माँ है, और एक पार्टी है जो हर हाल में एक नकारे और निकम्मे लौंडे को प्रधानमंत्री बनाने के चक्कर में इस हालत में आ चुकी है कि पता चले किसी जिले में मुखिया संघ के चुनाव में किसी ‘बैंगन छाप’ वाली पार्टी को समर्थन दे देगी। 

यही कॉन्ग्रेस है। राजमाता से मोतियों के हार पाने के लिए उसकी नकली महात्वाकांक्षा को हवा देते रहने के लिए, इस तरह के बयान दिए जाते रहेंगे। एक नंबर के नशेड़ी और निकम्मे लौंडे को भारत की सत्ता दिलवाने के लिए, तमाम बातें की जा रही हैं। इस चक्कर में इनका जो काम है, वो भी ढंग से नहीं कर पा रहे हैं: विपक्ष की ज़िम्मेदारी। 

रिएक्शन की राजनीति करनेवाली, विचारहीन पार्टी आखिर गालियों और अपनी असुरक्षाओं को अंग्रेज़ी में ढालकर नहीं कहेगी तो करेगी क्या? ऐसे बयानों से भाजपा को लगातार फायदा ही हुआ है, और होता ही रहेगा, लेकिन कॉन्ग्रेसियों की नंगई और साफ़ तरीके से सामने आएगी। भाजपा की जीत के ये छुपे मोहरे हैं जो हर बार चुनाव के समय पर ऐसे बयान देकर लोगों पर अपनी सच्चाई ज़ाहिर कर देते हैं। 

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