भन्ते! वही प्रेम है

 

सत्रह साल
एक धुँधला चेहरा
दिमाग़ से निकाल फेंका हुआ
तुम्हारा वजूद

वो सिर्फ एक चेहरा ही था
तो बात ख़त्म-सी थी
वो देह-मात्र ही होती
तो भी ज़ेहन से जा चुकी होती
वो एक आवाज़ ही होती
जो उसके लिखे को पढ़ते वक़्त भी कानों में आती
तो भी कोई गीत सुनकर बदल लेता

याद ही होती
तो भुला दी जाती

लेकिन,
प्रेम शायद मिनैण्डर का रथ है
जिसके अवयवों को नागसेन ने
अलग-अलग हटाकर पूछा था,
“महाराज! क्या ये रथ है?”
“क्या ये रथ है?”
“क्या ये रथ है?”

और जवाब आता रहा,
“नहीं, भन्ते! ये रथ नहीं।”

जब नागसेन से सारे अवयवों को इकट्ठा कर
फिर से पूछा, “क्या ये रथ है?”
जवाब वही था, “नहीं भन्ते! ये रथ नहीं है।”

प्रेम रथ ज़रूर है
बहुत ही ख़ूबसूरत घोड़ों से बँधा
नक़्क़ाशीदार पहियों से जुड़ा
ध्वज और छत्र के तले
लेकिन इन सबसे परे
रथ को रथ कुछ और बनाता है
पूर्णता अवयवों के होने मात्र से नहीं,
पूर्णता कुछ और ही है।

धुँधले चेहरे, खोए नाम, ग़ुम आवाज़,
या भुलाई याद के अलावा भी
कुछ तो कहीं से उपजता है अंदर
जो सालों बाद भी दस्तक देता है
वो क्या है?
भन्ते! वही प्रेम है।….

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