चुनावी सर्वे मूड नहीं बताते, उसे प्रभावित करने का नाकाम ज़रिया हैं

एक सर्वे आया है कि गुजरात में कॉंग्रेस और भाजपा में कड़ी टक्कर होगी, नेक टू नेक है! इस से कुछ समय पहले भाजपा जीत रही थी, कॉंग्रेस को ‘ठीक-ठाक’ सीट मिल रही थी। उसके पहले के किसी सर्वे में भाजपा आसानी से जीत रही थी।

चुनावों की रणनीति जब बनती है तो कई स्तर से वोट को प्रभावित करने का तिकड़म भिड़ाया जाता है। असहिष्णुता, वेमुला की आत्महत्या, दलितों की पिटाई आदि ख़बरों से माहौल तय किया जाता है। और लोग ऐसी ख़बरों के लगातार डोज़ मिलते रहने से प्रभावित भी होते हैं। हालाँकि स्टॉक मार्केट टाइप पूर्णतः अफ़वाहों से तो नहीं चलते, लेकिन बॉर्डरलाइन केस स्विंग कर सकते हैं।

इसी में से एक टूल फ़र्ज़ी सर्वे का भी है। इनकी कोई एकाउंटेबिलिटी तो है नहीं कि ग़लत होने पर इन्हें सज़ा मिलनी चाहिए, तो आपको ये कुछ भी बोल देंगे। मतलब ये कि एक तो ज़मीनी सर्वे करने की न तो इनकी औकात है, न ही ये उतना समय देना चाहते हैं। भारत के वोटर भी बड़े घाघ होते हैं, बोलेंगे कॉंग्रेस, दे आएँगे भाजपा को, एकदम डिफेक्टिव EVM टाइप।

गुजरात वाले में ये देखिए कि राहुल गाँधी का लॉन्च हो रहा है, सोशल मीडिया पर वो चुटकुले, शायरी, सवाल और तमाम बातें कर रहे हैं जो कि आलू से सोना बनाने वाले दिमाग की तो उपज है नहीं। साथ ही, सबकी एक टीम होती है जो इस कार्य को अंजाम देती है। राहुल की नयी टीम आई है, नए सुझाव और सलाह देने वाले लोग आए हैं, तो गुजरात में उन्हें ‘टक्कर’ का दिखाया जा रहा है।

मीडिया की कवरेज देखिए कि हर दिन उनके भाषणों, ट्वीट, चुटकुलों और अशआरों पर कैसे ख़बरें बन रही हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ राहुल पर ही बन रही है, या पहले नहीं बनती थी किसी और नेता पर। राहुल गाँधी अब मोदी के अंदाज़ में गले भी लगते दिखते हैं, फिर बाद में ‘हगप्लोमेसी’ पर ट्वीट भी करते हैं। बात ये है कि राहुल की टीम की मेहनत रंग ला रही है। वो अब चर्चा में हैं, एक इमेज बनाई जा रही है कि मोदी की बोलती बंद हो रही है। झूठे आँकड़े लाए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें भी पता है कि कितने लोगों को ‘लोन वेवर’ और ‘राईट ऑफ़’ में अंतर पता है।

ये पहला चरण था कि इन्हें चर्चा में लाओ, दिखाओ कि वो गांजा पीकर सोया नहीं रहता, सवाल भी पूछ सकता है। ये चरण पूरा होने के बाद अब इन्हें ऐसे दिखाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री के होम ग्राउंड पर राहुल छक्के मारने वाले हैं। लेकिन राहुल सीधे छक्के मारते दिखे (कि वो भाजपा को टक्कर दे रहे हैं) तो पचेगा नहीं।

यहाँ पर इन सर्वे वालों का रोल आता है। मैनेज सब कुछ होता है, और हर कोई करता है। मैं यह जानता नहीं, मैं यह मानता हूँ। सर्वे ने पहले राहुल को घुसाया और छोटा सा छेद दिखाया; फिर राहुल के सीटों की संख्या बढ़ती दिखाई गई ताकि लगे कि राहुल के ट्वीट, चुटकुलों और गीतों का असर जनता पर हो रहा है और वो राहुल की बात समझ रहे हैं; फिर नए सर्वे में दिखाया जा रहा है कि काँटे की टक्कर है।

है कि नहीं, ये 18 को पता चल जाएगा लेकिन इस बार उनकी टीम ने थोड़ा सुधार ज़रूर कर लिया है। हवा बाँधने से भी हवा बदल सकती है। मोदी की लहर हो सकती है तो राहुल की बयार क्यों नहीं? यही कारण है कि उनके अध्यक्ष बनने की औपचारिकता निभाई जा रही है और ये सब कोई संयोग नहीं है, टीम एफर्ट है। मैं ये बिलकुल नहीं कह रहा कि वो कुछ ग़लत कर रहे हैं, बल्कि ये कह रहा हूँ कि सर्वे का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।

लेकिन घाघ वोटरों के देश में ये हवा ठहरती नहीं है। इससे वोटर प्रभावित होंगे कि नहीं इस सर्वे पर पर कोई सर्वे नहीं किया गया है। लेकिन ये प्रक्रिया दो सालों में पुरानी हो जाएगी क्योंकि वोटर तो व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर भी हैं जहाँ भाजपा की उपस्थिति ऐसी है कि मोदी को विश्व का सबसे अच्छा प्राइममिनिस्टर घोषित किया जाता रहता है, और लोग उसे मान लेते हैं। वहाँ पहुँचने में बाबा और उनकी टीम को थोड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। क्योंकि उनकी टीम की बुनियादी समझ में दोष है, और वो ये है कि राहुल की इमेज कॉंग्रेस की इमेज बनाने से सुधरेगी, न कि भाजपा के पीछे, उन्हीं की तकनीक अपनाने से।

बाकी, मुझे राजनीति की बहुत ज़्यादा समझ नहीं है। न ही मैं छात्र चुनावों से लेकर पुतिन किसको सत्ता देंगे, इसकी ख़बर रखता हूँ। मेरा ज्ञान सीमित है, उसी के सहारे जितनी बात समझ में आती है, आप तक पहुँचाता हूँ।

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