रवीश जी का हर झूठ टायटेनियम है, उसकी ढाल बनाकर उनको कैप्टन भारत बन जाना चाहिए

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रविश जी ने प्रधानमंत्री मोदी के कई झूठ पकड़े हैं, और आए दिन उनकी हर बात में झूठ खोज लेते हैं। रवीश जी मुख्यतः एक पत्रकार माने जाते रहे हैं, हलाँकि मैं उनको उससे बड़ा झूठा आदमी मानता हूँ, जितना झूठा प्रधानमंत्री को वो मानते हैं। दोनों जगह दो तरह के झूठ हैं, लेकिन अगर एक अपने पद की गरिमा का अपमान कर रहा है तो लाय डिटेक्टर दिमाग और आँखों के रैटिना में लिए पत्रकार महोदय भी वही कर रहे हैं। 

अब एक पुरानी कहानी याद आ गई जो हमने बचपन में नैतिक शिक्षा की किताब में पढ़ी थी। यही किताब रवीश जी के समय में भी रहा होगा क्योंकि लालू के काल में सिलेबस बहुत ज्यादा नहीं बदलता था।कहानी ऐसे थी कि एक स्त्री अपने पुत्र को एक साधु के पास लेकर गई और कहने लगी, “महाराज! मेरा पुत्र मिठाई बहुत ज़्यादा खाता है। इसको आप कहें कि ऐसा करना ग़लत है, तो यह नहीं खाएगा।” साधु महाराज ने देवी से कहा कि वो एक महीने बाद आएँ। 

माताजी एक महीने बाद आईं पुत्र को लेकर और उनसे आग्रह किया कि उसके पुत्र को अत्यधिक मिठाई खाने की आदत त्यागने को कहें। साधु महाराज ने बालक को आगे बुलाया और कहा, “पुत्र! अधिक मिठाई खाने से शरीर को नुकसान होता है। आप मिठाई खाना कम कर दीजिए।” बच्चे ने सर झुकाकर हामी भरी। माताजी बड़ी आश्चर्यचकित हुईं और पूछ बैठीं, “महाराज! आप यही बात महीने भर पहले भी तो कह सकते थे, आज क्यों आने को कहा था?”

“माते! महीने भर पहले मैं खुद मिठाई बहुत ज़्यादा खाता था। अगर मैं खुद वही कार्य करूँ, और दूसरे को ऐसा करने से रोकूँ, तो वो ग़लत है। मुझे अपने में पहले वो बदलाव लाने होंगे, उसके बाद ही दूसरों को उपदेश दे सकता हूँ। उपदेश से अभ्यास भला,” साधु महाराज ने शंका का समाधान किया।

जैसे प्रधानमंत्री से ‘तथ्यों’ की बात करने की आशा रहती है रवीश जी को, और ये भी कि प्रधानमंत्री किस रैली में क्या नहीं छुपाएँ और क्या बोलें, उस हिसाब से मुझे भी एक पत्रकार के तौर पर दिन-रात जनता को अपने प्राइम टाइम और फिर पेज के माध्यम से बरगलाना बहुत ग़लत लगता है। प्रधानमंत्री ने खुद स्वीकार किया है कि रैलियों में वो जुमलेबाजी करते हैं, क्योंकि रैली में वो एक पार्टी के नेता की हैसियत से जाते हैं। 

हालाँकि, ऐसा करना कोई सही बात नहीं है लेकिन रवीश जी जिस हिसाब से मोदी से तथ्यों का हिसाब माँगते हैं, वो राहुल गाँधी या सिद्दारमैया की रैलियों में बोले गए झूठों को कौन से धातु का नाम देंगे, वो कहीं नहीं दिखता। मोदी ने रेड्डी बंधुओं पर कुछ न बोलकर, उस इलाके के इतिहास के बारे में बताया तो रवीश कुमार को ये लगा कि प्रधानमंत्री को रेड्डी बंधुओं पर भी खुलकर बोलना चाहिए था। 

सही बात है। राहुल गाँधी जहाँ जाते हैं, वहाँ एक बार अपने सरकार के घोटालों पर, पूरे देश में सबसे ज़्यादा बार हुए दंगों पर, अपनी पार्टी द्वारा किए गए दंगों पर, अपने नाना के निजी संबंधों पर, इंदिरा गाँधी की इमरजेन्सी पर, राजीव गाँधी के पंद्रह पैसों पर, तमाम किकबैक जो पार्टी लेती है, और सिद्दारमैया के भ्रष्टाचार पर बोल लेते हैं, फिर मैनिफेस्टो पर बात करते हैं। 

मतलब किसी पार्टी के नेता से ये आशा रखी जा रही है कि वो अपनी पार्टी के टिकटधारी नेताओं के बारे में मंच पर से बोले, “मितरों, ये हैं रेड्डी बंधु! इन्हें तो आप जानते ही होंगे कि कितने माइनिंग अपराधों में इनके नाम हैं। हालाँकि केस तो चल रहा है लेकिन ये लोग भ्रष्ट हैं मैं ऐसा मानता हूँ क्योंकि अमित शाह इनसे दूरी बनाए रखते हैं।”

ये किस प्रकार की खुजली हो गई रवीश कुमार को? शाम में रोज एक बार न्यूज चैनलों को इंटरटेनमेंट चैनल कह देने से आप पाक-साफ़ नहीं हो जाते। चूँकि मैंने पहले किसी को चोर कह दिया तो ऐसा नहीं होता कि आप बड़े शरीफ़ मान लिए जाएँगे। आपकी अपनी चादर मैली होती जा रही है लेकिन आपको दूसरे की बेदाग़ देखनी है, वो भी मोरल हाय ग्राउंड लेकर। 

ये जानते हुए कि राजनीति का स्तर क्या है, और जुमलेबाजी से ही चुनाव लड़े जा रहे हैं, ऐसे में एक नेता को टार्गेट करते हुए सारा रिसर्च ऐसी बात को साबित करने में लगा देना जिससे समाज को शायद कोई फायदा न हो। आप जैसे ही गिरोह के लोगों ने नोटबंदी और जीएसटी को असफल बताया था, और फिर भी अर्थव्यवस्था तमाम मानकों पर सुधार के ही संकेत देती दिख रही है। इन्फॉर्मल सेक्टर के रोजगार को आप रोजगार नहीं मानते इसलिए पकौड़ा बेचने वालों को आप रोजगार में गिनने की जगह उपहास करने लगते हैं। आपको देश में कुछ भी विकास नहीं दिखता। कोई कहे कि सड़कें बन रही हैं तो आप टूटी सड़क खोजने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देंगे। 

अपनी ज़मीन खोखली है, और दूसरों के पत्थर पर छेनू छेनी-हथौड़े से प्रहार करते हुए तोड़ना चाह रहा है। छेनू जी, रिपोर्टिंग जिस दिन निष्पक्ष करने लगेंगे, जब रिपोर्ट में 360° कवरेज होगी, जब सही के लिए बधाई और गलत के लिए आलोचना करने लगेंगे, तब आपको सीरियसली लिया जाएगा। जब आपकी टीम का आदमी किसी हत्याकांड में मरे चार मुसलमानों के घर जाएगा, हिन्दुओं के नहीं, तो आपको गाली ही पड़ेगी। 

आपके कह देने से न तो मोदी गलत हो जाता है, न ही हर हत्या के केन्द्र में एक संघी हो जाएगा। जस्टिस लोया वाला कांड सबको अच्छे से याद है, सुप्रीम कोर्ट ने बातों की लात मारी है आप सबके प्रपंच पर। शर्म कीजिए और लोगों को बहकाना बंद कीजिए। आप इतने बड़े धूर्त हैं कि कल को आपको कुछ न मिले तो आप ये भी कहकर रोने लगेंगे कि कर्नाटक में भाजपा हिन्दी में क्यों भाषण देती है, ये हिन्दी को ज़बरदस्ती थोपना है। 

आप ये कर सकते हैं, इसलिए लिखना पड़ रहा है। जिस सफ़ाई से प्रधानमंत्री एक आरोपी की बात पर चर्चा नहीं करते, उससे ज़्यादा सफ़ाई से आप किसी भी आरोपी को अपने कुतर्कों के आधार पर पुलिस से पहले अभियुक्त बना देते हैं। तब तो आप इस आदर्शवाद के आइने में अपनी धूर्त मुस्कान नहीं निहारते? तब तो आप लगातार जज बने फ़ैसले देते रहते हैं कि इसको तो इसी ने मारा? 

क्या हुआ अमित शाह के बेटे वाली रिपोर्ट का? जस्टिस लोया के केस का क्या हुआ जो आपने बहुत ही सही समय पर गुजरात चुनावों के बीच चुना था? क्या आपके पास सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी आ गई थी कि हाँ जस्टिस लोया को अमित शाह ने मरवाया, और उसके बेटे की कम्पनी को सरकारी बैंक ने उसके पिता के दबाव में आकर लोन दिया था? 

क्या आपने तथ्यों की पुष्टि की थी या फिर आपको लगा था कि आपके गिरोह और जिस भी मालिक को आप पूजते हैं, उनके लिए ये सही तीर था? क्या आपने उस समय ये प्रोग्राम करते हुए चुनावों का रुख़ मोड़ने की कोशिश नहीं की थी? आप किस चुनाव के समय इस तरह की स्टूडियो रैली नहीं करते जिसमें आपको सनसनी ख़बर मिलती है और स्क्रीन को गोथिक मोड में चलाकर, गम्भीर चेहरा बनाकर देश में हो रहे पॉल्यूशन के पीएम 2.5 को भी ऐसे दिखाते हैं जैसे वो पार्टियों नहीं मोदी हो?

याद है इस तरह की वाहियात रिपोर्टिंग? क्या आपको लगता है कि ये सही पत्रकारिता है? क्या आप अपने हिसाब से बातें नहीं रखते जबकि आप ही के प्रोफ़ेशन में कुछ लोग आपकी अपेक्षा कम झूठ बोलते हैं? आपको नहीं लगता कि चुनावों के समय आपके अजेंडाबाजी में अचानक से स्पाइक आ जाता है? फिर आप सिर्फ एक पार्टी और नेता से आदर्श और आपके हिसाब के सत्य की उम्मीद कैसे कर रहे हैं? 

क्या आपने कर्नाटक के तमाम नेताओं पर एडीआर की रिपोर्ट पढ़ ली है? अगर हाँ तो आपको ये क्यों लगता है कि मोदी ने ही ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ कहा है? क्या राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी रैलियों में ये कहते पाए जाते हैं कि ‘हम लोग तो भाई खूब लूटेंगे?’ फिर झूठ के हीरों के ज़ौहरी बने आपके हाथ मोदी ब्रांड के हीरे ही क्यों मिलते हैं विश्लेषण के लिए? 

राहुल ब्रांड के मोतियों की माला आपने पहल रखी है क्या? जब आपको मोदी लगता है कि बातों को छुपा रहा है, बातों को घुमा रहा है, तो क्या उसके विपक्ष में खड़े हर नेता की रैली में आदर्श लोग आदर्श बातें कर रहे हैं जिनका कुर्ता पूरा सफ़ेद है? 

ऐसा है रवीश जी कि कान में इयरफोन लगाकर गुंडों की तरह भाड़े के कैब में बैठे किसी आम आदमी और उसके परिवार को कार से चेज करके धमकाने के बाद अपने वाल पर सेटेलाइट सर्विलान्स की बकवास बंद कीजिए। दिन-रात आपको तमाम लोग पढ़ते और सुनते हैं। प्रधानमंत्री से ज़्यादा समय आप पब्लिक में होते हैं। आप अपना आचरण सुधारिए, और पत्रकार बनिए। पत्रकार या तो निष्पक्ष होता है, या फिर दोनों पक्षों की बात दिखाता है। 

आपकी पत्रकारिता में टायटेनियम ग्रेड का झूठ, प्रपंच और अजेंडा है। उसको छेनी-हथौड़े से काट-पीट कर एक ढाल बना लीजिए और पीठ पर तिरंगे के रंगों में रंग लीजिए। फिर जहाँ-तहाँ कार से लोगों को पीछाकर धमकाते रहिए। बाद में विक्टिम कार्ड भी खेलिए। पीठ पर तिरंगा रहेगा तो संघी लोग आपको कैप्टन भारत बना देंगे। फिर आपको वेटिकन से सेंटहूड भी मिल सकता है क्योंकि चमत्कारी तो आप बहुत हैं।  

पीएस: एक सलाह है, मेरी किताब घरवापसी (bit.ly/gharwapasi) पढ़िए और वापस लौट आइए। आपमें बहुत संभावनाएँ हैं। नौकरी छोड़ दीजिए, पत्रकारिता कीजिए। किताब पढ़िएगा तो मन कर जाएगा। 

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