प्राइवेसी एक पब्लिक विषयवस्तु है, आप इंटरनेट पर हैं तो नंगे हैं

 

अमेरिकी चुनाव में फ़ेसबुक एक डेटा लीक का ज़रिया बना और लोग हैशटैग-हैशटैग खेलने लगे हैं। मज़ेदार बात यह है कि ये खेल भी फ़ेसबुक पर ही हो रहा है। बात क्या थी ये जाने बिना बहुत लोग पगला गए हैं। एक डेटा एनालिटिक्स फ़र्म ने (शायद) ग़लत तरीक़े से फ़ेसबुक पर से पाँच करोड़ लोगों के पब्लिक डेटा को निकाला और चुनावों के लिए ट्रम्प के कैम्पेन को बेच दिया।

इससे हुआ क्या? हुआ ये कि जब आपके पास वोटरों की प्रोफाइल आ जाती है तो आप अपने प्रोडक्ट को, यानि नेता को, तैयार कर सकते हैं कि इस इलाके के लोगों में इतने लोग आपकी इस बात पर सकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया देते हैं। मोटे तौर पर ये कि अगर ट्रम्प की नस्लभेदी बातों को श्वेत अमेरिकी युवा पसंद करते हैं तो वो अपने कैम्पेन में वैसे भाषण पर ज़्यादा ज़ोर देगा।

ये ग़लत है लेकिन चुनाव जीतने के लिए लोग इस तरह के फ़र्म्स की मदद लेते हैं। चाहे वो प्रशांत किशोर हों, डेन्टसू हो या फिर भाजपा जिसको भी आईटी सेल देखने का कॉन्ट्रैक्ट दिए हुए है। इनका काम फ़ेक प्रोफ़ाइल बनाकर या फिर ऐसी कम्पनियों के ज़रिए लोगों की जानकारी इकट्ठी करनी होती है। ये ऑनलाइन टूल्स के ज़रिए भी की जाती है और फ़ील्ड सर्वे के द्वारा भी।

फ़ेसबुक का दोष इसमें कितना है इस पर मेरे एक मित्र ने बंदूक की दुकान, गार्ड और राष्ट्रपति की हत्या का उदाहरण दिया कि गार्ड ने सुरक्षा के लिए बंदूक ख़रीदी लेकिन राष्ट्रपति को उसी से मार दिया। यहाँ दुकान बंद करने की बात क्यों हो रही है? फ़ेसबुक के संज्ञान में अगर ऐसी बात थी, जो कि जाँच से पता चल पाएगी, तब तो वो दोषी हैं। लेकिन अगर थर्ड पार्टी एप्स के ज़रिए वो जानकारी खींची गई, तो फिर दोषी वो कम्पनी है जिसने यूज़र डेटा लेते वक्त आपसे ये कहा कि उसका इस्तेमाल सिर्फ़ उसी समय और कार्य के लिए है, लेकिन वो उसे अपने सर्वर पर डाल दिया और फिर बेच लिया।

आपलोग जो हर दिन ‘आप दस साल बाद कैसी दिखेंगी’ से लेकर ‘कौन सा डायलॉग आप पर सूट करता है’ वाले एप्स का इस्तेमाल करते हैं वो भी आपकी पब्लिक प्रोफ़ाइल डेटा उठाता है और रैंडम-सी बात बता देता है। इसी तरह जब आप किसी गेम या वेबसाइट में घुसने के लिए ‘फ़ेसबुक लॉगिन’ का रास्ता चुनते हैं, तो भी आपका डेटा उनके सर्वर पर आपकी प्रोफ़ाइलिंग के लिए अपलोड हो जाती है।

इसे ‘बिग डेटा’ कहते हैं। यानि आपकी हर पोस्ट, सर्च किए हुए कीवर्ड्स, पढ़ी हुई ख़बरें आदि सब किसी न किसी के पास है। और ये डेटा उनके पास सबसे ज़्यादा है जो आपके एन्ड्रॉयड फोन में ‘क्लीन’ करने वाले एप्स हैं। वो आपके कैश मेमोरी और अनवांटेड डेटा को क्लीन करने के एवज़ में आप ही के फोन से अपने सर्वर पर ले लेते हैं। आपको लगता है कचरा साफ़ हुआ, लेकिन आपका कचरा किसी के काम आ रहा है।

आपके पास जो न्यूज़ एग्रीगेटर एप्स हैं, जो कहते हैं कि आपके बिहेवियर के हिसाब से आपको ख़बरें रिकमेंड करते हैं वो कैसे काम करते हैं? वो आपके फोन पर आपकी हर हलचल पर ध्यान रखते हैं। आप कहाँ जाते हैं, कितना पढ़ते हैं, क्या पढ़ते हैं, क्या देखते हैं, किसकी फोटो लेते हैं, कहाँ पोस्ट करते हैं, क्या पोस्ट करते हैं, कब पोस्ट करते हैं, किस लम्बाई के करते हैं, किसकी तस्वीर बार-बार देखते हैं, किस मीडिया हाउस के लिंक ज़्यादा पढ़ते हैं… आप बस सोचिए और वो काम ये एप्स करते हैं।

गूगल जैसी शातिर कम्पनियाँ तो आपके फोन को इंटरनेट से हटाकर रखने पर भी फोन रेडियो के ज़रिए आपकी गतिविधियों का ग्राफ़ बनाते रहते हैं, और नेटवर्क ऑन होते ही गूगल तक जानकारी भेज देते हैं। आपको क्या लगता है कि फ़ेसबुक, गूगल आदि जो आपको फ़्री में सर्विस दे रहे हैं उनके बापों के आम के बग़ीचे हैं?

अब बात आती है कि ज़रूरत और प्राइवेसी में किसकी सीमा कितनी है। ये आप पर निर्भर है कि आप उसको कितना विस्तार देते हैं। आपको सर्विस लेनी है तो उसकी प्राइस देनी होगी। कई एप्स हैं जो सब्सक्रिप्शन बेस्ड हैं और आपकी प्राइवेसी बचाते हैं। लेकिन हम उस दौर में हैं जहाँ कई फ़ालतू की चीज़ें ज़रूरत बनाकर दिखा दी जाती हैं। फिर हमें उसकी लत लग जाती है, हम उसे जस्टिफ़ाय करने लगते हैं, और उससे निकलना मुश्किल हो जाता है।

इसके लिए तमाम तरह के रिसर्च हो रहे हैं कि कैसे आपको एक ही एप्प पर इंगेज्ड रखा जाय। ये जो फ़ेसबुक के फ़ीचर आते हैं वो आख़िर क्या हैं? वो आपको यहीं समय बिताने के लिए किया गया उपक्रम है कि आप आज आधा घंटा दे रहे हैं तो परसों तक वो बत्तीस मिनट हो जाए।

अब आते हैं चुनावों में हुए मैनिपुलेशन पर। ये अनैतिक है, और चूँकि हमारी जानकारी के बग़ैर लिया गया तो ये उस देश के क़ानून के हिसाब से ग़ैरक़ानूनी भी है। लेकिन इसमें एक ग़ज़ब का विरोधाभास है। वो ये है कि हमने खुद को नंगा छोड़ा हुआ है और लावा तथा ओप्पो के स्मार्टफ़ोन वाले गाँव के लोगों से ये आशा कर रहे हैं कि वो आपकी फोटो न लें!

भारत में अगर ये मैनिपुलेशन नहीं हुआ है तो आगे होगा। इसे आप या कोई भी संस्था रोक नहीं सकती। ये एक प्रोसेस है जिसका हिस्सा आप हैं। आप न चाहें, लेकिन आप फ़ेसबुक पर हैं, गूगल पर सर्च करते हैं, एप्प के ज़रिए ख़बरें पढ़ते हैं तो आपकी ख़बर रिकॉर्ड हो रही है। हम और आप अगर किसी चीज में विश्वास करते हैं, कुछ पढ़ते हैं और शेयर करते हैं तो हमें इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हम हर तरह के प्रोडक्ट के लिए अलग डिब्बों में बंद किए जा रहे हैं।

कोई हमको टीवी बेचेगा, कोई घड़ी, कोई बीमा पॉलिसी, कोई क्रिकेट, कोई हिन्दू अस्मिता, कोई इस्लामी आतंक, कोई खुद को। ये ऐसे ही है। इसमें आप इसका हिस्सा हों, या न हों, फ़र्क़ नहीं पड़ता। आपका मित्र है, परिवार है, आपकी उम्र के लोग हैं। डेटा तो सरकार भी NSSO के ज़रिए लेती रहती है। जनसंख्या के समय सिर्फ लोग ही नहीं गिने जाते। अगर कभी आपने वो फ़ॉर्म देखा है तो आपको याद होगा कि कॉलम कितने होते हैं। आपकी हर जानकारी होती है जो आप अपनी पहचान, संबंध और जीवन के संबंध में दे सकते हैं।

अभिव्यक्ति के माध्यम मिलने पर हम बहुतों तक पहुँच रहे हैं। हमारी पसंद और नापसंद हमारे दोस्तों को पता हैं। ये हमारा दायरा है। इसी दायरे को छल से, या बिना बताए, कोई और उड़ा ले रहा है तो असर कितना होता है ये विचार की बात है।

इसको ऐसे देखिए कि अगर मोदी के टार्गेट ग्रुप को गाय और गोबर में मज़ा आ रहा है, और फ़ेसबुक के ज़रिए ये पता चलता है कि फ़लाँ जगह की रैली में ऐसे लोग हैं जो ऐसी ख़बरों को पसंद करते हैं तो मोदी की स्पीच में वैसी लाइनें जोड़ दी जाएँगी। अगर कॉन्ग्रेस वालों को ये लगता है कि उनके अध्यक्ष को हिन्दुवादी छवि बनाने की ज़रूरत है क्योंकि बहुत लोग वैसे जनेऊधारी हिन्दू को पसंद कर रहे हैं तो आप उनको कुछ दिनों बाद मंदिर में पाते हैं।

एक तरह से इसमें ग़लत कुछ नहीं है। आपके नंगेपन को कोई इस्तेमाल कर रहा है। इसके लिए बिलबिलाना अजीब बात है। किसी को ऐसी बातें पसंद हैं, कोई बाउंड्री पर बैठा है तो उसके हिसाब का मसाला तैयार किया गया और दे दिया गया। कोई एक तरह की बात करने वाले नेताओं को वोट देता है, और मुझे अगर ये पता करने का तरीक़ा मालूम हो तो मैं उसका प्रयोग करूँगा।

जो लोग फ़ेसबुक पर आरोप लगा रहे हैं उनसे मेरा सवाल ये है कि यहाँ ग़लत आख़िर क्या है सिवाय टेक्निकल ऑस्पेक्ट के कि फ़ेसबुक या कैम्ब्रिज एनालिटिक्स वालों को ऐसा नहीं करना चाहिए था चोरी-छिपे? किसी ने कैम्पेन को को उस हिसाब से डिज़ाइन किया कि उसे ज़्यादा वोट मिले। कोई ज़बरदस्ती नहीं हुई कि कान पर पिस्तौल रखकर वोट दिलवा दिया गया।

आपकी पसंद की बातें आपको परोसी गईं, आपने वो बातें फैलाईं, आपने फ़ेक न्यूज़ और प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाया। आप ये करना चाहते थे, आपके सामने वो फेंक दिया गया। कमाल की बात ये है कि पूरे ट्रम्प कैम्पेन के दौरान द इकॉनमिस्ट जैसे अख़बारों द्वारा चौराहों पर डोनाल्ड ट्रम्प के नाम से ‘डोन्ट’ लिखकर वोटरों को इन्फ्लूएन्स करने की कोशिश की गई तब किसी ने कुछ नहीं कहा। बात तो यही है न कि आपके पसंद का नेता नहीं चुना जा रहा तो आपकी सुलग रही है।

जब सारे नाइट टॉक शो होस्ट हर रात ट्रम्प के ख़िलाफ़ विषवमन कर रहे थे, और आज भी करते हैं, तब लोग प्रभावित नहीं हो रहे थे? क्यों? क्योंकि वो सोशल मीडिया नहीं है! जब फ़ॉक्स न्यूज़ को छोड़कर बाकी के अधिकतर न्यूज़ चैनल पैनल डिस्कशन और चर्चाओं में ट्रम्प को खुल्लमखुल्ला आड़े हाथों लेते थे तब क्या वोटर इन्फ्लूएन्स नहीं हो रहा था? मतलब मेमस्ट्रीम मीडिया स्टूडियो से कैम्पेनिंग करे तो ठीक, यहाँ आपकी पब्लिक में रखी बातें कोई ले रहा है तो आप बवाल कर रहे हैं!

मैं ये नहीं कहता कि ग़ैरक़ानूनी है तो उसको सज़ा न दें। मेरा कहना ये है कि ये आज के दौर में ख़ूब हो रहा है, और होता रहेगा। एंकर, एक्टर, डायरेक्टर, संगीतकार, सोशल एक्टिविस्ट से लेकर हर आदमी ओपिनियन लीडर है, और अपने स्तर से चुनावों को प्रभावित करता ही है। इसमें आपकी जानकारी पहले से ही उपलब्ध है, और किसी ने इस्तेमाल कर लिया तो उससे क्या फ़र्क़ पड़ रहा है?

नकारात्मक ख़बरों से, नकली ख़बरों से माहौल खराब होता है। ये मैं मानता हूँ। मुझे इसके तमाम ख़तरों का अंदाज़ा है कि ये समाज को तोड़ने वाले हैं। लेकिन चुनावों को प्रभावित करने की बातें काग़ज़ी हैं और डिबेट जीतने के लिए हैं कि डेटा चोरी हो गया, डेटा चोरी हो गया! अरे भाई! आपने डेटा को पब्लिक में रखा है तो वो कोई भी अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है।

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