मुद्दों को मारने का सबसे सही तरीक़ा: हैशटैग

विकास बहल के मामले में ‘पीड़िता’ ने ये कहकर कोर्ट केस लड़ने से इनकार कर दिया कि वो नहीं चाहती कि वो इस केस में एक पार्टी बने और उसे कोर्ट नहीं आने की इजाज़त चाहिए। आगे उसने कहा कि वो इस वाकये को पीछे छोड़ना चाहती है, और किसी भी तरह का फॉर्मल कम्प्लेन या केस नहीं करना चाहती। 

अब, जबकि बॉलीवुड से मी टू का ख़ुमार उतरकर गायब हो चुका है, और एमजे अकबर को छोड़कर बाकी सारे तथाकथित आरोपियों ने खुद को क्लीन चिट दे दी है, सवाल यह उठता है कि क्या हुआ डिस्कशन का?

भारत के तमाम मूवमेंट का सबसे बड़ा सच यह है कि यहाँ कोई भी मूवमेंट मौलिक नहीं होता। हम हर चीज कॉपी करते हैं, और तमाम ‘वाद’ भी उसी कॉपी करने वाली मेंटलिटी का नमूना है। मैंने मी टू जैसी चीज़ों से इनकार नहीं किया, ये खूब होता है लेकिन जब पीड़िता उस केस को बढ़ाना नहीं चाहती तो आखिर उद्देश्य क्या रह जाता है?

ठीक है, ये बात मानता हूँ कि इससे फ्यूचर में लोग सबसे सीखेंगे, लेकिन कितने लोग? या, कहीं ऐसा तो नहीं हो जाएगा कि लोग ये समझ लेंगे कि ऐसे मूवमेंट्स का हासिल कुछ भी नहीं होता? ये तो एक सामूहिक आंदोलन था, बहुत लोगों ने अपनी बातें कहीं, और बहुत लोग सामने आए, बहुतों ने माफ़ी माँगी, लेकिन जब तक इसमें कानूनन कोई कार्रवाई नहीं होती, परिणाम संदेहास्पद रहेंगे।

आखिर, सीबीआई वाला केस और सबरीमाला वाला केस आता है और आपके कॉपी किए गए मूवमेंट के ट्रेंड को खत्म कर देता है। वैसे भी इस देश में मूवमेंट की आयु लगभग एक सप्ताह ही होती है। शायद याद हो कि पिछले साल जब यह ट्रेंड आया था और हेशटैग चला था तो इसमें कृष्ण और गोपियाँ भी मी टू में खींचे गए थे। 

जिन्होंने इस ट्रेंड को हवा दी थी, उन्हें लगा कि इससे दक्षिणपंथियों के कुछ नाम आएँगे, और फिर वो बवाल काटेंगे। उसके उलट एक परम्परागत तबके का नाम आने लगा: वामपंथी प्रोफेसर, जर्नलिस्ट, फ़िल्मकार, लेखक आदि। तब ये मूवमेंट पिछले साल इसी महीने में खत्म हो गया था। आप लोग अपनी फ़ेसबुक मेमरीज़ चेक करें तो आपको दिखेगा। 

हलाँकि, मैं यह बिलकुल भी नहीं कह रहा कि इस मूवमेंट में वामपंथी ही हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है, लेकिन वामपंथियों में मोलेस्टेशन और रेप की एक अस्वस्थ परम्परा रही है, जिसका गवाह नक्सली इलाकों से छूटकर भागी महिला काडरों से लेकर जेएनयू में ऐसी पार्टियों से मोहभंग पा चुकी तमाम लड़कियाँ हैं। 

इस साल तनुश्री दत्ता ने इसको फिर से जीवित किया। और इसकी टाइमिंग लाजवाब थी: जब केरल बिशप कांड में ननों की स्थिति पर पूरा देश चर्चा करने लगा था। हो सकता है यह महज़ संयोग ही हो, लेकिन केरल के बिशप का चर्चा से गायब होना, उसे बरी कर दिया जाना और फिर दो दिन पहले उसके खिलाफ बोलने वासे पादरी की संदिग्ध हालत में मौत बहुत कुछ कहती है। 

‘मी टू’ एक ट्रेंड है, और यह वैसा ही है जैसे किकी चैलेंज था। लेकिन, ये बात मत भूलिए कि लड़कियों की हालत वर्कप्लेस से लेकर समाज के हर कोने में बहुत खराब है। इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ। लेकिन जब ऐसी चीज़ें किसी ट्रेंड का हिस्सा बन जाती हैं और फिर ऐसी कहानियाँ आती हैं जिनका मक़सद सजा दिलाने से बहुत नीचे नाम लेना भर होता है, तो फिर ऐसे आंदोलनों और उसके पीड़ितों को न्याय कभी नहीं मिलेगा। 

मुद्दों को ट्रेंडिंग बनाते ही उसकी अहमियत घट जाती है, और नज़दीकी इतिहास ये बताता है कि मुद्दा गौण हो जाता है। इसकी कैजुअल्टी बनती है वो तमाम लड़कियाँ जिन्हें वर्कप्लेस पर इसका शिकार बनाया जाता रहा है। 

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