जब भंसाली जैसे सक्षम लोग क्रिएटिविटी से ज्यादा कॉन्ट्रोवर्सी पर दाव लगाते हैं

हिन्दीभाषी प्रदेशों में भाजपा की सरकार ही है। एक के बाद एक मुख्यमंत्री महोदय इसे वहाँ रिलीज़ न होने देने की कसम खा चुके हैं। और ये ज़ाहिर है कि शायद हो भी न पाए। मुझे ये भी लगता है कि भंसाली को ये कॉन्ट्रोवर्सी भारी पड़ चुकी है, और यही एक वजह है कि फ़िल्म की रिलीज़ की तारीख़ शायद फ़रवरी तक चली जाय।

फ़िल्म की शूटिंग शुरु होने के पहले ही बाज़ार में इस बात का फैलना कि इसमें ख़िलजी और पद्मावती के बीच बिस्तर का सीन है; फिर कुछ समय तक माहौल नापने के बाद ये सफ़ाई देना कि ड्रीम सिक्वेंस है; फिर कुछ समय तक की पब्लिसिटी करणी सेना ने थप्पड़ मारने से लेकर, सेट में आग लगाते हुए कर दी, इस बात की ओर इशारा करता है कि ये सुनियोजित है। हो सकता है करणी सेना के आला नेताओं को इसे सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए पैसे भी दिए गए होंगे। क्योंकि कोई भी आंदोलन बिना पैसों के सप्लाइ के नहीं चलता।

बेरोज़गार बच्चों और युवाओं को पत्थर फेंकने के लिए भी पाँच सौ का नोट देना होता है। ये भूल जाइए कि राजपूत अस्मिता के नाम का मैसेज आपके फोन पर आया और आप रॉड लेकर सड़क पर बाहर चले जाएँगे। देश के सारे दंगे भी इसी तरह से ‘ऑर्गेनाइज्ड’ होते हैं। जैसे कि मोटरसाइकिल में सेल्फ़ स्टार्ट के लिए मेन इंजन के मोटर के घूमने से पहले स्टार्टिंग मोटर का घूमना जरूरी होता है, वैसे ही ऐसे ‘आयोजनों’ को समाज में ‘वाइरल’ कराने के लिए वाइरस को जगह-जगह पर पहुँचाया जाता है। इसका अपना विज्ञान है। उसको समझिए।

किसी तरह शूटिंग पूरी हुई और पीआर वाले कभी रणवीर सिंह के गेटअप, तो कभी दीपिका के कपड़ों से हवा में पद्मावती को थामते दिखे। बाकी का काम सोशल मीडिया पर चलता रहा। फिर पता चला कि शाहिद कपूर भी हैं। याद कीजिए कि जब तक शाहिद कपूर की तस्वीर नहीं आई, उसको लेकर कितनी चर्चा थी कि वो किस किरदार में हैं। याद नहीं आएगा। क्योंकि पीआर टीम को रणवीर-दीपिका के इश्क़ के एंगल के साथ, ख़िलजी के ‘नए अवतार’ और पद्मावती के ग्रैंड्योर को लगातार भुनाना था।

जब बात औक़ात से बाहर जाने लगी तब ट्रेलर में ‘…वो राजपूत’ और ये राजपूत वाला एंगल डाला गया। ये ट्रेलर में डैमेज कंट्रोल हेतु दिया गया है। हो सकता है पहले से ही डालना हो, पर अब तो मैं इसे ऐसे ही देखता हूँ। जब फ़िल्म पद्मावती की है तो ख़िलजी की प्रमोशन को इतना महत्व क्यों? इससे पता चलता है कि हीरो फ़िल्म की हीरोइन या हीरो नहीं बल्कि हीरो तो आपका विलेन है! फिर आपको याद आया कि राजपूत नाराज़ हैं, तो आपने ‘ये राजपूत, वो राजपूत’ को आगे कर दिया।

मुझे पीआर के धंधे का पता नहीं लेकिन ज्यादा लम्बा खींचना, या ऐसे प्रोडक्ट की मार्केटिंग नौ महीने पहले से नहीं होनी चाहिए, खासकर तब जब पब्लिसिटी का रास्ता नकारात्मक हो। ये निगेटिव और चीप पब्लिसिटी है, और हर फ़िल्ममेकर या कलाकार किसी न किसी तरह से ये करते रहे हैं। दीपिका पदुकोण तो नई नहीं ही हैं, इस पीआर के खेल में। ‘माय च्वाइस’ का विडियो याद आएगा आपको। इसकी टाइमिंग भी याद होगी। ख़ैर, हर कलाकार और व्यवसायी को इसकी स्वतंत्रता है।

हलाँकि, निगेटिव कैम्पेन बहुत ज्यादा काम नहीं करता। खासकर आज के दौर में तो नहीं जब लोगों का अटेंशन स्पैन कम है, और मोबाइल पर हर पक्ष की बातें, और हर तरह की ख़बरें उपलब्ध हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की ‘ज़हर की खेती’, ‘2002’ आदि से लेकर पूरी कैम्पेनिंग मोदी को गरियाने और हिन्दू-मुस्लिम एंगल लाकर लोगों को भाजपा का ‘चेहरा’ दिखाने पर फोकस्ड थी। लोगों को कभी ये पता ही नहीं लगा कि उसके पास अपना अजेंडा क्या है। ये एक बड़ा कारण था कि जो काम चुनाव के पास आने पर करना चाहिए था, वो कॉन्ग्रेस ने लगभग एक साल खींच दिया। भाजपा विकास-विकास चिल्लाते हुए, मेजोरिटी पा गई।

भंसाली ने ट्रिक तो अच्छा अपनाया, थप्पड़ भी खाया लेकिन ये इतना लम्बा खिंच गया कि विरोधियों को अपनी पूरी ताक़त जुटाने का सही समय मिल गया। सोचिए कि अगर पूरी बात रिलीज़ से दो-तीन सप्ताह पहले लीक की जाती, तो करणी सेना जब तक फ़ेसबुक पेज ही बनाकर कुछ भी करने की स्थिति में होती, उससे पहले फ़िल्म थिएटर में होती और पेड रिव्यूज़ के बल पर हर जगह सही चल रही होती।

अब ये कॉन्ट्रोवर्सी हाथ से बाहर जा चुकी है क्योंकि भंसाली की पीआर टीम ने देश के चुनावों को ध्यान में नहीं रखा था। आज के दौर में पंचायत चुनाव तक को मोदी की हार और जीत से जोड़ा जाता है, और प्रदेश के निगम चुनावों को केन्द्र सरकार के प्रति रेफरेंडम के स्तर का मुद्दा बना दिया जाता है, तब आप चुनावों की वोटबैंक राजनीति को कैसे भूल सकते हैं?

सीधी-सी बात है कि राज्य सरकारें वोटरों को, जो कि अब राजपूत ‘समाज’ से बाहर हिन्दू ‘धर्म’ की आस्था के साथ खिलवाड़ तक की हो गई है, दिखाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाएगी। क्यों? क्योंकि राज्य सरकारों के बाप का पैसा नहीं लगा है उसमें, और उसके पास एक मारक अस्त्र भी है जिस पर कोर्ट भी कुछ नहीं कर सकती: लॉ एण्ड ऑर्डर सिचुएशन। राज्य सरकारों का यूँ तो काम ही कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाना है लेकिन वो ये भी कहते पाए जाते हैं कि ‘सुरक्षा का मसला है, हम रिस्क नहीं ले सकते!’

भंसाली बाबा अब प्लान बी पर आ गए हैं। वो ये कि उनके दोस्त और फ़िल्म के कलाकार इस पर कुछ भी नहीं बोलेंगे, रिलीज़ का एक नया विंडो देखा जाएगा, तब तक हवा बनाई जाएगी कि फलाने को भी हमने फ़िल्म दिखा दिया है, और तब जाकर फ़िल्म रिलीज़ हो पाएगी। तब तमाम बाबा, मामा, चाचा और फूफों की सरकार ये बयान दे देगी कि चुनावों के कारण सुरक्षा बलों और पुलिस की तैनाती के कारण हमने सोचा था कि रिलीज़ से परेशानी हो सकती है, पर अब नहीं होगी। हो सकता है इनके पास इन्श्योरेन्स कम्पनी पैसा भी पहुँचा दे।

इस पूरी कॉन्ट्रोवर्सी से आपको ये देखना होगा कि कामपंथी बुद्धिजीवी खुलकर ये नहीं कह पा रहे हैं कि मोदी सरकार में अभिव्यक्ति की आज़ादी ख़तरे में है और क्रिएटिव लोगों को परेशान कर रही है सरकार। क्योंकि माओवंशियों के फ़ेवरेट भंसाली रहे नहीं कभी। इसलिए इस जेन्युन मोमेंट पर, जिस पर आपातकाल का प्राइमटाइम होता रहता है, मीडिया में वो हवा बनाने की मुहीम नहीं दिखती जो किसी के कार्टून पर बन जाती है।

चुनावों के समय कामभक्त येचुरीनंदनों के लिए तो ये पका-पकाया हलवा है क्योंकि इस बार न तो दलितों की पिटाई हुई, न ही गौरक्षक किसी की जान लेते दिख रहे, न ही रोहित वेमुला ने आत्महत्या की, न ही नजीब अहमद गायब हुआ, न ही चिरकुट कन्हैया ने कहीं मुँह से टट्टी की, न ही गौरी लंकेश को मारा गया… क्रिएटिव फ़्रीडम पर मैं दक्षिणपंथी होकर इसके ख़िलाफ़ लिख रहा हूँ, और कामरेड लोग शांत हैं! इतने पर तो फ़रहान अख़्तर आदि की फ़िल्म होती तो आप इनके जलवे देखते!

भंसाली का प्लान बी कितना काम आएगा पता नहीं। लेकिन अगर फ़िल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई, तो ये एक सबक़ होगा उन सबके लिए जिनके लिए कॉन्ट्रोवर्सी का रास्ता क्रिएटिविटी को रौंदते हुए जाता है। पद्मावती एक ऐसा विषय है जिस पर आप ख़िलजी के बिना, ख़िलजी के साथ, या सिर्फ़ उस इतिहास/कथा को लेकर बेहतरीन फ़िल्म बना सकते हैं। भंसाली तो बना ही सकते हैं, क्योंकि उनके पास हर तरह के संसाधन हैं।

अपनी कला पर विश्वास न दिखाकर, एक घटिया और नीच तरह की कॉन्ट्रोवर्सी का सहारा लेना अनैतिक तो है ही, साथ ही अपने कला के साथ अन्याय है। सक्षम लोग जब बाजीराव जैसी घटिया ट्रीटमेंट वाली फ़िल्में बनाते हैं, और बेकार के विवादों को हवा देकर पैसे कमाना चाहते हैं, तो उनका हश्र देर-सवेर पद्मावती फ़िल्म जैसा ही होना है। ये फ़िल्म बेशक पैसे कमा भी ले, लेकिन मुझे इससे बहुत कम उम्मीदें हैं कि ये उस लोककथा/इतिहास के साथ इंसाफ़ कर पाएगी।

बाजीराव जैसे योद्धा को देवदास बनाकर छोड़ने वाले भंसाली की पीआर टीम के प्लान बी पर मेरी निगाह है। हो सकता है कि सेंसर बोर्ड के पास फ़िल्म जाए तो वहाँ से एचडी प्रिंट लीक भी हो जाए। ताकि कुछ नई हवा दी जा सके। अब ये फ़िल्म अपनी फ़िल्ममेकिंग से ज्यादा हवाओं पर निर्भर है। और हवाओं का क्या है, वो कहीं सघन तो कहीं विरल होती है, कहाँ पटक दे क्या पता!

 

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