नारी सम्मान और समान अधिकार की लड़ाई है तलाक़, हलाला, बहुविवाह की मुख़ालफ़त

मेरा अपना एक्सपीरिएंस भी यही रहा है। जब जब मैंने इस्लाम में औरतों की बात उठाई है, चाहे वो हाजी अली को लेकर हो, तलाक़, हलाला, पॉलिगेमी को लेकर हो, मुझ पर इस्लाम के फेसबुकिया पैग़म्बर अपनी क़ुरान फेंक फेंक कर मारते हैं।

ये सारे फेसबुकिया पैग़म्बर मर्द ही क्यों होते हैं? आज तक एक लड़की ने मेरी बातों का विरोध नहीं किया। ये मर्दों को औरतों से दिक़्क़त क्या है? सिर्फ एक प्रतिशत मुस्लिम महिलाएँ ग्रेजुएट हैं, इसका क्या जवाब है इन मर्दों के पास? पचास प्रतिशत की साक्षरता वाले मुस्लिम महिला समुदाय में सैंतीस प्रतिशत को मदरसों की प्राथमिक शिक्षा ही मुहैया है। बारह प्रतिशत स्कूल या पूरी स्कूली शिक्षा ले पाती हैं।

क्या कारण है कि ऐसे पर्सनल लॉ को डिफ़ेंड करने वाले हमेशा मर्द ही होते हैं? क्या कारण है कि ऐसे पर्सनल लॉ वाले तमाम बोर्ड में महिलाएँ दिखती तक नहीं? टीवी के प्राइम टाइम शो में कितनी जगह बिना दाढ़ी और टोपी वाला मुसलमान दिखता है, बुरक़े में ही सही?

जब मैं उनकी बात उठाता हूँ तो सवाल ये होता है कि ‘तुम्हारे हिन्दू में ये है, वो है’, जैसे कि हिन्दू समाज जब स्त्रियों को बराबर का हक़ देगा, मुसलमान उस दिन का इंतज़ार कर रहे हों! हिन्दू सुधरे तो मुसलमान अपने आप रातों रात बराबरी का हक़ दे देगा। बुरक़े उड़ जाएँगे, लड़कियाँ कॉलेजों में पहुँच जाएँगी, बदलाव हो जाएगा।

बात धर्म की है ही नहीं, बात है समानता की। तलाक़ देना है, दो लेकिन सिर्फ मर्द का पक्ष सुनकर ही क्यों? औरत भी शादी का एक अहम हिस्सा है, उसकी मर्ज़ी और उसकी बात क्यों नहीं सुनी जाती? ये भी कहा जाता है कि ऐसा तो बहुत कम लोग करते हैं तो फिर हटा दो, क्या हर्ज है?

अब ये मत कहना कि क़ुरान में ये लिखा है। क़ुरान चौदह सौ साल पहले आई और उसमें क्या लिखा है, ये भी तुमने अपने हिसाब से सबको बताया है। पहले तो तुम अगर मुसलमान मर्द हो, और तुम्हें ये सही लगता है तब तो कमेंट ही मत करना। करना तो क़ुरान और हडीथ की दलील मत देना। अपने आस पास देखो और बताओ कि हलाला, तलाक़, पॉलीगेमी किस हिसाब से सही है चाहे एक प्रतिशत लोग ही ऐसा करते हों।….

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