स्त्री शरीर, नारी की देह, और सैनिटरी पैड्स

जीएसटी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आप हर महीने आँकड़े पाते हैं, उसको देखते हैं कि कहाँ से ज़्यादा आ रहा है, कहाँ से कम, और फिर मीटिंग दर मीटिंग कई चीजों के टैक्स को कम किया जाता है। 

कुछ धूर्त लोग ये बताना चाहते हैं कि सरकारों को पहले से ही तय कर लेना चाहिए कि किस चीज से कितना कलेक्शन होने वाला है, और पहली ही बार में सब फ़िक्स कर देना चाहिए। जबकि ऐसा तर्कसंगत नहीं लगता। सत्रह टैक्स को हटाकर एक करने के बाद, आप एक टैक्स ला रहे हैं, और उसको पहली ही बार में सही कर दिया जाए, ऐसा सोचना मूर्खता है। 

कुछ चम्पू ‘वन नेशन वन टैक्स’ को ‘एक ही स्लैब’ मान लेना चाहते हैं। उनके हिसाब से सारी चीजों पर एक ही टैक्स होना चाहिए। कुछ लोग औसत टैक्स चाहते हैं जिसमें आप 0-28 का औसत निकालकर एक बिठा दो बीच में। 

इसका मतलब है कि आटे से लेकर मर्सीडीज़ तक, हर चीज पर चौदह प्रतिशत टैक्स लगा दो। जबकि, सरकार ने अधिकतर दैनिक चीजों को पाँच या शून्य के स्लैब में रखा है। लेकिन, चिरकुट तो चिरकुट ही रहेंगे। 

ख़ैर, खबर यह है कि आज की मीटिंग के बाद सैनिटरी पैड से टैक्स हटा लिया गया है। यूँ तो सरकार ने ‘आशा बहू’ के माध्यम से एक रूपए में पैड्स उपलब्ध कराए हैं, पर इस पर बहुत कार्य अभी बाकी है। देश में इसकी मैनुफ़ैक्चरिंग आसान हो, इसे एक कुटीर उद्योग की तरह विकसित किया जाए, पीरियड्स में इसके इस्तेमाल की बातें घर से या स्कूल से बताई जाएँ, तब हम कई हज़ार महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर से लेकर तमाम इन्फैक्शन्स से बचा पाएँगे। 

बिस्तर पर लगे दाग की तस्वीरें लगाकर आख़िर आप किसे पीरियड्स के बारे में जागरूक कर रहे हैं? उन्हें जो इन्स्टाग्राम पर हैं? उन्हें तो पता ही है कि पैड क्या है, आप बस अपने आप को इन्फीरियोरिटी कॉम्पेलेक्स के कारण दिखाना चाहती हैं कि आप भी सोच रही हैं। या आपको पता ही नहीं कि आप इसके अलावा क्या कर सकती हैं। ये करना गलत नहीं है, ये बस पूरी चर्चा को चादर के एक धब्बे में समेटना भर है जहाँ इसका समाधान तस्वीरें शेयर करना माना जाता है। 

छोटे शहरों, क़स्बों, गाँवों की लड़कियों, महिलाओं के बीच इसकी बात करना, किसी ऐसी संस्था के साथ जुड़ना जो इस तरह के काम करती है (बनाने की या जागरुकता फैलाने की) और उनकी मदद करना आपके दाग वाली चादर से लाख गुणा ज़्यादा जागरुकता लाएगी। सिर्फ हैशटैग शेयर करने से बेहतर है, चार वैसे लोगों से बात कीजिए जो नहीं जानते कि यह होता क्या है। 

फिलहाल, पैड्स का कॉस्ट और कम हो जाएगा, इसे मैं इस मूवमेंट की जीत ज़रूर मानता हूँ। लेकिन ये जीत सही मायनों में तब ही होगी, जब गाँवों की लड़कियाँ एक रूपए में पैड्स ख़रीदकर उसे इस्तेमाल कर पाएँगी, स्कूल-कॉलेज जाएँगी। इस पर माइक पर बात करने की ज़रूरत नहीं है, इस पर सहज होने की जरूरत है, इसे अंतिम बच्ची तक पहुँचाने की ज़रूरत है। 

इस पर कविता लिखने वाले, और उसे सुनने वाले पहले से ही जागरुक हैं, इससे आत्मसंतुष्टि लीजिए लेकिन समाज के अंतिम पायदान तक आपके शब्दों का असर नहीं होगा। बात करने से लड़की तक पैड नहीं पहुँचेगा, कविता सुनने से उसे पैड नहीं मिलेगा, पैड उसे कम दाम पर, सरलता से उपलब्ध कराने पर हाथ में मिलेगा। 

इसका उत्पादन ज़रूरी है क्योंकि इसकी खपत लगातार होती रहेगी। सिर्फ पैड ही नहीं, सिलिकन कप जैसी चीज़ें भी हैं, जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। ये मसला स्वास्थ्य का है, बुनियादी है, स्त्री शरीर का है, ‘नारी की देह’ या आधुनिकता का नहीं। ‘नारी की देह’ कविता है, स्त्री शरीर स्वास्थ्य का मामला है। कविता और बेडशीट की तस्वीर इसे मॉडर्निटी से जोड़ने की बेकार कोशिशें हैं। ये वही बात हो गई कि जहाँ बारिश हो रही हो, वहाँ आप फूलों को इसलिए पानी दे रहे हैं क्योंकि आपके घर में मोटर है, और बिजली बिल कम आता है। 

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