गीता रेप कांड: …तो मैं अब ये लिखूँ कि अल्लाह कितना शर्मिंदा हो रहा होगा?

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गीता को अगवा किया गया, मदरसे में ले गए और वहाँ बलात्कार किया गया। सामान्य-सी घटना है, आज के परिपेक्ष्य में। सामान्य का मतलब किसी का बलात्कार सामान्य घटना नहीं है, समाज में बलात्कारों का होना सामान्य हो गया है। जनसंख्या ज़्यादा है, बलात्कार और बाकी अपराध भी ज़्यादा होंगे। इसके उपाय क्या हैं, वो अलग विषय है, तो चर्चा फिर कभी होगी। फ़िलहाल, मेरे ‘सामान्य’ कहने को संवेदनहीनता से न जोड़ें क्योंकि संवेदनहीन तो ऐसा समाज है, ऐसी दुनिया है जहाँ सबसे विकसित और शिक्षित होने का दावा करने वाले देश और समाज ऐसी घटनाओं को रोकने में अक्षम रहे हैं। 

गीता एक हिन्दू लड़की है, आसिफ़ा एक मुसलमान लड़की थी। गीता का अपहरण हो गया, आसिफ़ा का भी अपहरण किया गया था। गीता का अपहरण मुसलमानों ने किया, आसिफ़ा का अपहरण हिन्दुओं ने किया। गीता को मुसलमानों के धार्मिक शिक्षा देने की जगह (जहाँ क़ुरान पढ़ाई जाती है) मदरसे में क़ैद करके रखा गया, आसिफ़ा को हिन्दुओं के मंदिर में। फिर दोनों का दूसरे धर्म के लोगों ने बलात्कार किया। लीजिए, हिन्दू और मुसलमान हो गया। 

आसिफ़ा के लिए लोगों को इन्साफ़ चाहिए था। तख़्तियाँ लगाईं गईं जिसमें हिन्दू, हिन्दुस्तान, राम, मंदिर सब बलात्कारी हो गए, और शर्मिंदगी की एक लहर दौड़ गई। वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स शर्मिंदा हुए कि भारत में ‘रेप कल्चर’ है। ये बात और है कि ओबामा ने स्वीकारा है कि वहाँ की हर पाँचवी लड़की/महिला कम से कम एक बार यौनहिन्सा या बलात्कार की शिकार हो चुकी होती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आँकड़ों को अनुसार न्यूयॉर्क और वाशिंगटन वाला जगमगाता देश बलात्कार की दुनिया का बेताज बादशाह है। 

गीता के लिए किसी को इंसाफ़ नहीं चाहिए। पैगम्बरों और अल्लाहों को, मस्जिदों और मदरसों को कंडोम और लिंगों से सजाने वाले चित्रकार और कार्टूनिस्टों की उँगलियों में कोढ़ हो गया है। आज कोई तख़्ती लगाकर अल्लाह और पैगम्बरों को शर्मिंदगी की हद तक गिराने की बात करता नहीं दिखता। मेरे ही टाइमलाइन के लिंकवीर और संवेदनशील योद्धा ग़ालिब और मीर के शेर लिख रहे हैं। 

आप कहेंगे कि अजीत जी, आप बार-बार एक ही बात कहते हैं। जी! कहता हूँ, और कहता रहूँगा। मेरी ज़िंदगी के कई मक़सदों में से एक वामपंथी दोगलों, छद्म-सेकुलरों, लिब्रांडू बुद्धिजीवियों और बॉलीवुड की दो कौड़ी की दोगली हस्तियों को तर्क देकर ज़लील करते रहना है। वो मैं करता रहूँगा। मैं इन पत्रकारों को कोसता रहूँगा जो एक बार संवेदनशील हो जाते हैं, और दूसरी बार ट्रैफिक और बैंकिंग की समस्या पर विचार रखने लगते हैं। 

क्या आपको लगता है कि आसिफ़ा का बलात्कार और उसकी हत्या करने वाले के मन में एक रत्ती धार्मिक आस्था रही होगी? क्या मैं ये कहकर निकल जाऊँ कि ऐसे लोग हिन्दू नहीं हो सकते? फिर आपको भी ये कहकर डिफ़ेंड करने का कोई हक़ नहीं कि ये लोग मुसलमान नहीं हैं। ये भी मुसलमान हैं, आप भी मुसलमान हैं, और काले झंडे पर ‘अल्लाहु अकबर’ लिखकर सैकड़ों जान लेने वाले आईसिस सरीखे आतंकी संगठनों के आतंकी भी मुसलमान हैं। 

अगर किसी ने, धर्म अलग कीजिए, किसी का बलात्कार कर दिया तो इसमें उसका धर्म कितने प्रतिशत का योगदान देता है? क्या किसी पुजारी को, मौलवी को ये कहते सुना कि जाओ और सड़कों पर बच्चियों का, लड़कियों का, महिलाओं का बलात्कार कर दो? क्या कोई माता-पिता अपने बच्चों को ये कहते हैं कि मदरसे या मंदिर में जाकर बलात्कार कर देना अल्लाह या ईश्वर खुश होगा? 

फिर इसमें हिन्दू कैसे शर्मिंदा हो जाता है? फिर इसमें आपके आराध्य राम को आप क्यों कोसते हैं? आपके अंदर का हिन्दू ये कैसे मान लेता है कि जिसने बलात्कार किया वो किसी भी तरीक़े से आपका प्रतिनिधित्व करता है? अगर आपको लगता है कि ऐसा है तो क्या आज हिन्दुस्तान को, आपके भीतर के मुसलमान को, पैगम्बरों को, और अल्लाह को शर्मिंदा नहीं होना ताहिए कि उसके नुमाइंदे वहाँ बलात्कार कर रहे हैं जहाँ क़ुरान पढ़ाई जाती है?

जब ये प्रश्न उठता है कि हिन्दुओं के राम ने मंदिर में ये कैसे होने दिया तो कोई ये प्रश्न उठा दे कि क्या अल्लाह इतना कमज़ोर पड़ गया था कि किसी मौलवी की देखरेख में एक बच्ची का बलात्कार करने दिया, तो क्या बुराई है? क्या अल्लाह और पूरा इस्लाम शर्मिंदगी झेलने को तैयार है किसी एक मुसलमान के क्रूर और नृशंस अपराध पर? 

क्या नचनिया समूह, जी मैं अब उन्हें यही कहूँगा, सफ़ेद काग़ज़ पर शर्मिंदगी दर्ज करेगा या उसे अपने लिब्रांडू ग्रुप से स्वीकार्यता मिलने हेतु किसी अगले मौक़े का इंतज़ार है जहाँ आरोपी हिन्दू हो, और पीड़ित मुसलमान? लेजिटिमेसी, इन्फिरियोरिटी और अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित लोग ऐसे मौक़ों की तलाश में रहते हैं ताकि उन्हें दस लाइक, पचास रीट्वीट मिल जाए। उन्हें चार अख़बार में जगह मिल जाए कि फ़लाँ सी-ग्रेड एक्ट्रेस, जिसे कोई नहीं पूछता, ने ऐसी चिट्ठी लिखी है कि वायरल हो गई! 

बात ये नहीं है कि हिन्दू का रेप मुसलमान ने, और मुसलमान का रेप हिन्दुओं ने कर दिया। बात ये है कि किसी का रेप किसी ने कर दिया। उसके कारण अलग हो सकते हैं, समान हो सकते हैं, लेकिन वो कारण वैयक्तिक ही रहेंगे, सामाजिक या राष्ट्रीय नहीं हो सकते। किसी अपराधी के अपराध का बोझ पूरा धर्म, पूरा समाज अपने सर पर क्यों लेगा? क्यों थोप दिया जाय ऐसे घृणित और जघन्य कुकर्म का पाप पूरे राष्ट्र पर?

क्या हम इतने बुद्धिहीन हैं कि ये नहीं समझ सकते ये एक अपराध है जो किसी ने किसी के साथ किया। क्या ये समझना बहुत कठिन है कि आसिफ़ा पर हिंसा करने वाले अमानवीय लोगों के पाप का हिस्सेदार पूरा समाज नहीं, वो स्वयं ही होंगे? क्या मदरसे में हुए बलात्कार का आरोप मौलवी और आरोपी के अलावा इतना व्यापक कर दिया जाए कि उसमें अल्लाह और पैगम्बरों को नाप लिया जाए? 

अपराध धर्म से भी प्रेरित हो सकते हैं। हमारा देश तो उसका जीता-जागता गवाह है जहाँ इस्लामी आतंकियों ने चार हज़ार मंदिर तोड़े, लाखों महिलाओं का बलात्कार किया, घरों को लूटा, गाँव के गाँव खाली करवाए, तलवार की नोक पर धर्म परिवर्तन कराए जिनकी संतानें आज भी यहीं निवास करती है। हमने तो उन्हें भी बसाया जिनके पूर्वजों के हाथों पर इतना ख़ून है। 

आईसिस का अपराध भी तो धर्म से ही प्रेरित है, और इतना व्यापक है कि पूरा विश्व उसकी तपन महसूस कर रहा है, तो क्या पूरा इस्लाम इसकी शर्मिंदगी का बोझ उठाए? हर मुसलमान गर्दन झुकाकर चले? या हर मुसलमान ये कहे कि ये लोग जो धर्म को नाम पर कर रहे हैं, वो गलत है। 

उसी तरह, अगर आसिफ़ा पर हुई हिंसा भी अगर धर्म से प्रेरित है, तो भी हर हिन्दू या वो जगह, वो देश, वो समाज शर्मिंदा नहीं हो सकते। हम इस बात को स्वीकारेंगे कि हाँ, एक घटना हुई है जिसकी जाँच ज़ारी है, और जो हुआ वो ग़लत हुआ। लेकिन हम ये क्यों कहने लगें कि राम शर्मिंदा होंगे? राम को क्या पड़ी है ऐसे लोगों की? 

अल्लाह को क्या पड़ी है आईसिस के नारे की? उसने तो शर्मिंदगी नहीं दिखाई। उल्टे उसके अनुयायी तो ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ये लोग सच्चे मुसलमान नहीं हैं जबकि ऐसी सारी आतंकी घटनाएँ उसी इस्लाम और मुसलमानों के नाम पर होती है। उसे धर्म से जोड़ना तो दूर, उसकी भर्त्सना तक नहीं हो पाती अधिकांश मुसलमानों से। उन्हें अपने ही लोगों के बीच से निकाले जाने का भय सताता है कि अगर मैंने कह दिया कि मैं एक मुसलमान होने को लेकर शर्मिंदा हूँ! 

कम से कम व्यापक हिन्दू समाज इस घटना के होने को स्वीकार तो रहा है! मेरी शिकायत बस इतनी है कि इसका बोझा मेरे सर पर क्यों पटका जा रहा है? इसका बोझा राष्ट्र के नाम के साथ क्यों चिपकाया जा रहा है! क्या संविधान में लिखा है कि ऐसे बलात्कारों को सरकारी समर्थन प्राप्त है? क्या ऐसे मामलों में कोर्ट और पुलिस नहीं होते? क्या ये कहकर नकार दिया जाता है कि संविधान में ऐसे मामलों पर सुनवाई का प्रावधान नहीं हैं? 

फिर इसमें एक धर्म के अपराधी को, उसकी मंशा भी धर्म से प्रेरित है, फिर भी पूरे धर्म को कलंकित करते हुए कैसे देख लिया जाता है? उस हिसाब से तो मुसलमानों को साँस लेना बंद कर देना चाहिए और दिन-रात अपने धर्म के लोगों के द्वारा फैलाए गए ऐतिहासिक और वर्तमान आतंक का नाम लेकर गले में पत्थर बाँधकर नदी में कूदकर मर जाना चाहिए! 

क्या हिन्दू-मुसलमान करने से, इस देश की हर गीता, आसिफ़ा को न्याय मिल जाएगा? या इसे एक तार्किक तरीक़े से देखते हुए, बलात्कारों के जड़ में जाकर, उसके कारणों को पहचानकर, उस पर नए सिरे से सोचने से उसकी दर में कमी लाई जा पाएगी? 

इसमें राम और अल्लाह को खींचने से क्या मिलेगा? लेकिन अगर कल आपने राम को खींचा था, तो आज मैं अल्लाह को खींचूँगा। और जो भी आपसे सवाल पूछ रहे हैं आपके दोगलेपन पर, मैं उन सबके साथ हूँ। मैं आज शर्मिंदा हो जाऊँगा कि मेरे देश में बीस प्रतिशत मुसलमान हैं जिनमें से एक ने मेरे धर्म की लड़की को क़ुरान पढ़ाने की जगह पर क़ैद करके बलात्कार किया। मैं शर्मिंदा हूँ कि ऐसे धर्म को भारत में बसने की जगह मिली जहाँ मदरसों की छत से लड़कियाँ चिट्ठी फेंकती हैं कि उनके साथ मौलवी यौनहिंसा कर रहा है। 

मैं ये करूँगा, आप तख्ती लगाते रहिए। मैं ये करूँगा, आप ‘जस्टिस फ़ॉर आसिफ़ा’ ट्रेंड कराइए। इससे आसिफ़ाओं और गीताओं को जस्टिस मिल जाएगा। बलात्कार बंद हो जाएँगे। शहद की नदियाँ बहेंगी, बहत्तर हूरें आपकी यौन कुंठा को शांत करेंगी। यही चाहते हैं ना आप? 

आपको बलात्कार से कोई मतलब नहीं है, आपको मुद्दे से मतलब है कि कुछ नया होता रहे। क्योंकि ये सब आपसे बहुत दूर कहीं होता है। आप उसके दर्द को महसूस नहीं कर सकते क्योंकि आप शीर्षक से नीचे जाते कहाँ हैं। आपके लिए आठ साल की बच्चियाँ आपकी बेटी या बहन का प्रतिबिम्ब नहीं, किसी धर्म और पार्टी को घेरने का ज़रिया है। आपको फ़र्क़ शायद तब भी न पड़े जब आपके घर से… 

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