‘गोल्ड’ एक औसत दर्जे की फ़िल्म है

देशभक्ति के नाम पर एक बेकार-सी फ़िल्म को शायद भारत के ‘खेल सिनेमा’ में दस बेहतरीन फ़िल्मों में स्थान मिल जाएगा, क्योंकि बनी भी शायद दस ही होंगी। ‘गोल्ड’ फिल्म शुरुआत से लेकर अंत तक, कुछ हिस्सों को छोड़कर, किसी कॉलेज स्टूडेंट के औसत प्रोजेक्ट से बेहतर नहीं लगती। जब मैं पूरी फ़िल्म को औसत कह रहा हूँ तो उसमें अभिनय, संगीत, निर्देशन, पात्रों और परिस्थितियों के लिए उचित मेहनत जो यथार्थवादी लगे से लेकर सिनेमेटोग्रफी तक की बात कर रहा हूँ। 

कहानी में एक ही तरह का पैटर्न दिखता है: एक कोच जो दारूबाज़ है, उसका एक सपना है, अपना नाम सही कराना है, टीम जुटाता है, पैसे की दिक्कत होती है, रोता है, गिड़गिड़ाता है, किसी तरह टीम बनाता है, टीम परिस्थितियों के कारण टूट जाती है, वो भी टूट जाता है, बीवी सहारा देती है, वो फिर से टीम बनाता है, टीम में छोटे दल बने होते हैं, ज्ञान दिया जाता है, एक तुरुप का इक्का रहता है, वो एक दिन लड़ जाता है, फ़ाइनल में खेलता है, और अंत में जीत जाता है। भारत का झंडा और राष्ट्रगान होता है। हम इमोशनल हो जाते हैं। 

दारू वाली बात निकाल दें तो आपको ये कहानी कुछ हद तक ‘चक दे इंडिया’ की लगेगी। वो एक बेहतरीन फ़िल्म थी। क्योंकि उसमें मेहनत दिखती थी। एक्टर खिलाड़ी जैसे लगते थे, एक्टर की तरह नहीं कि हॉकी स्टिक लेकर दर्शकों पर दया कर रहे हैं। ‘गोल्ड’ में हॉकी का खेल एक्टर्स की कमियों को छुपाने के लिए लगातार स्टिक और बॉल के क्लोज़अप शॉट्स में ही दिखता रहता है। ये बताता है कि निर्देशक ने क्या सोचा होगा: भारत की जनता है, उनको स्टिक और बॉल दिखा दो वो मान लेंगे कि इस टीम ने ऑलम्पिक में गोल्ड जीते हैं। 

कहानी अच्छी थी, उसको ऐसे दिखाया गया कि घिसी हुई और ढीली लगी। अक्षय कुमार के इंटरव्यू में सुना था कि फ़िल्मों को चालीस दिन में बनकर तैयार हो जाना चाहिए। बात यह है कि हर फ़िल्म चालीस दिन में आप नहीं बना सकते। आपको एक बेहतर फ़िल्म के लिए शूटिंग पर जाने के पहले भी कई महीने लग सकते हैं। आप नकली मूँछ चिपकाकर और ‘एक’ को ‘ऐक’ बोलकर बंगाली नहीं बन सकते। 

इससे बेकार बंगाली पात्र मैंने न तो जीवन में, न ही फ़िल्मों में कहीं देखा है। जब आप ध्यानचंद को सम्राट बनाकर दिखा सकते हैं, तो बंगाली को भी सीधा ही रखते क्योंकि एक्सेंट पर मेहनत किए बिना ऐसे बेकार चरित्र ही निकलकर आएँगे। अभिनय के मामले में अक्षय की एक्टिंग सबसे बेकार कही जा सकती है। बाक़ियों ने भी कोई तीर नहीं मारा। किसी का अभिनय कन्विन्सिंग नहीं है। 

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर की बात करें तो एड्रेनलिन पम्प करने वाले स्पोर्ट्स फ़िल्मों में इनका बहुत बड़ा हाथ होता है। इस फ़िल्म में उसकी बहुत कमी खली। पार्टी में गाए गीत की कोरियोग्रफी में एनर्जी दिखी, पर बाकी समय संगीत और साउंड के मामले में ये फ़िल्म पीछे ही दिखी। 

देश, उसका झंडा और राष्ट्रगान के नाम पर मूर्ख बनाना फ़ैशन हो गया है। पैसा तो फ़िल्म कमा ही लेगी क्योंकि वो तो ‘टाइगर ज़िंदा है’ भी कमा लेती है, और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ भी, लेकिन ‘गोल्ड’ ‘चक दे इंडिया’ और ‘दंगल’ में ज़मीन-आसमान का अंतर है। दो फ़िल्मों में आपको एक्टर से लेकर, निर्देशक, कैमरामैन, साउंड डिज़ायनर तक के कामों में सीधा अंतर दिख जाएगा। 

उम्मीदों पर ये फ़िल्म खड़ी नहीं उतरती। अक्षय कुमार बुरे अभिनेता नहीं हैं, और ये बात हमने हेराफेरी, हॉलीडे, बेबी, जैसी तमाम फ़िल्मों में देखी है। कोई ऐसी ऐतिहासिक टीमों की कालजयी उपलब्धियों को ऐसे लचड़ ढंग से दिखाता है, तो दुःख होता है। मैं निजी तौर पर स्पोर्ट्स पर बनी कैसी भी फ़िल्म देख लेता हूँ। लेकिन जो ठीक-ठाक की आशा रखते हैं, उनको ये फ़िल्म निराश करेगी।

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