अपने सवालों का हल असफल मानवों के साहित्य में ढूँढना

उम्र के कुछ पड़ावों पर हमें अलग-अलग बातों से जूनून की हद तक मोहब्बत हो जाती है। हम उन बातों का, लोगों का, उनके अंदाज के क़ायल हो जाते हैं। हमारी भाषा से लेकर, बातचीत और हाव-भाव में ऐसे लोगों/बातों की छवि साफ़ झलकने लगती है। हम वो हो जाना चाहते हैं जो कोई और था। ये करने से पहले एक बहुत ज़रूरी बात जाननी नितांत ही आवश्यक है।

व्यक्ति अपने अनेक वातावरणों से ली गई हवाओं के ख़ून तक में संचारित होने से वो बनता है जो वो बन जाता है। हमारा दौर, पहले के तमाम दौरों की तरह, मिश्रित और बनावटी वास्तवकिताओं का दौर है। सूचनाएँ आती हैं, जाती हैं, हम उनके हिसाब से, उन्हें प्रोसेस करते हुए खुद को उनके अनुरूप, विपरीत, या निरपेक्ष रहते हुए व्यक्तित्व में बदलाव लाते, या नहीं लाते हैं।

कहने का सीधा मतलब ये है कि हमारे अंदर कई लोग होते हैं। ज़ाहिर है कि हमारे अंदर जब कई लोग हैं, तो हमारे बाहर के लोगों के भीतर भी उसी अनुपात में कई लोग होंगे। अजीत भारती जो किताबों में लिखता है, वो अलग अजीत है; अजीत जो फेसबुक पर लिखता है, वो अलग अजीत है; अजीत जो फ़ेसबुक/व्हाट्सएप्प के चैटबॉक्स में होता है, वो अलग अजीत है; अजीत जो आम जीवन में दिल्ली में मिलता है, वो अलग अजीत है; अजीत जो अपने मित्रों के साथ होगा, वो अलग अजीत है; अजीत जो अपनी प्रियतमा के साथ होगा, तो वो अलग अजीत होगा; और अजीत जो अपने घर-परिवार में होगा वो अलग अजीत होगा।

हर समय, हर जगह, हर समूह के समक्ष व्यक्ति अलग तरह से भी व्यवहार कर सकता है, और बिलकुल समान रहते हुए भी। इसमें कोई बुराई नहीं है। हम अपनी परिस्थियों के हिसाब से जीवित रहने की जद्दोजहद में कई बार बदलते हैं, और वैसे ही व्यवहार करते हैं। आपको झूठ बोलना पड़ता है, आपको सच बोलना पड़ता है, आपको बचना पड़ता है, और आपको जानते हुए भी चुप रहना पड़ता है। ये सब के सब हम और आप ही होते हैं।

हम चाहकर भी हर व्यक्ति के, जो हमारे पास भी हैं, हर आयाम को नहीं जान सकते। कुछ लोग, जैसा कि ऊपर लिखा है, कुछ जगहों पर अपने व्यक्तित्व का ‘लिमिटेड एक्सेस’ देते हैं। यहाँ पर जुनून की हद तक मोहब्बत करने वालों को समस्या होती है। समस्या ये होती है कि वो उस ‘लिमिटेड एक्सेस’ को ही सम्पूर्ण मानकर उसके पीछे हो लेता है।

जोगी के रंग में रंग जाने से पहले, जोगी का भूत जानना जरूरी है। रंग में रंग जाइए लेकिन ये भी तो देखिए कि उसने जो रंग ओढ़ा है, वो नकली है, सोने का पानी है, या तपकर सच का कुंदन बन हुआ है। आप उस सुनहरी आभा को, जो एक खास तरह के कोण से प्रकाशमान होने के कारण दमकता प्रतीत होता है, उसे सोना मानकर उसे धारण कर लेते हैं, जबकि सत्य उससे परे है।

जब हम किसी शायर की शायरी या साहित्यकार के दर्शन में अपने सवालों के जवाब ढूँढकर उसका अनुसरण करने लगते हैं, तो हम ये भूल जाते हैं कि शायरी और साहित्य उस शायर या साहित्यकार का सिर्फ़ एक आयाम है। प्रेम पर लिखने वालों के पारिवारिक जीवन में कई बार प्रेम नहीं, व्यभिचार होता है। शराब पर कविता लिखनेवाले कई लोगों ने शराब चखा भी नहीं होता है। घरेलू हिंसा पर ज़ोर से बोलने वाले घर में पत्नी को पीटते हैं। शायरी में प्रेम तलाशने वाले अंदर में सड़े हुए, असफल इन्सान हो सकते हैं जिन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ दिया।

ऐसे लोगों की बातों पर हम साहित्यिक चर्चा ही करें तो बेहतर है, उससे ज़्यादा तरज़ीह देना, या आत्मसात करना आपको कहीं और ढकेल देगा। वो इसलिए कि साहित्य और दर्शन में कई बार आदर्श स्थिति की ही बात होती है। और दुनिया आदर्श कभी भी नहीं थी। आदर्श की परिभाषा भी सबकी अपनी होती है। इसीलिए भी किसी शायर की शायरी को ध्येय वाक्य मानकर ‘उम्र गुज़ार दी गई’, ‘खुद को तबाह कर दिया, और मलाल भी नहीं’ का डंका पीटने वालों को ये देखना चाहिए कि ख़ुद को तबाह करने वाले निजी ज़िंदगी में क्या थे।

‘गुनाहों का देवता’ पढ़कर हम रोने लगते हैं। ये हिन्दी की अनुपम कृतियों में से एक है। लेकिन धर्मवीर भारती एक व्यक्ति के तौर पर अनुपम व्यक्तियों में से एक नहीं थे। जौन इलिया के अश’आर दुनियाभर के फ़लसफ़े लिए हुए हैं, लेकिन उनकी बीवी और बच्चों से पूछा जाय कि क्या वो एक बेहतर शौहर और पिता थे, तो जवाब कुछ और ही आएगा। वर्ड्सवर्थ ताउम्र दृष्टिदोष से जूझते रहे, और उन्होंने प्रकृति के ऊपर बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं, मिल्टन अंधे थे, तो क्या मैं अंधा हो जाऊँ उस अनुभव के लिए या फिर ये बात भी देखूँ कि कॉलरिज अंधे नहीं थे, एलियट और कीट्स अंधे नहीं थे, बायरन और जॉनसन अंधे नहीं थे, तुलसी और कालिदास अंधे नहीं थे?

हमारी ज़िंदगी में जो सवाल उठते हैं, जो हमारे अनुभवों के कारण आते हैं, उनके जवाब को ग़ालिब, मुक्तिबोध या प्रेमचंद कैसे दे देंगे? उनकी रचनाओं के पात्रों की इहलीला चंद पन्नों में शुरू और ख़त्म हो जाती है जबकि आपके जीवन का दस दिन के लिए उतनी मोटी किताब लिखी जा सकती है। आखिर क्यों हम जौन इलिया की शायरी में अपने प्रेम और जीवन दर्शन से उपजे सवालों का उत्तर ढूँढते हैं? ये आले दर्जे की मूर्खता और अनभिज्ञता से उपजा विचार है जिसके अंत में आप खुद को तबाह कर लेंगे, और मलाल भी अच्छा-ख़ासा रहेगा।

साहित्यकार हमेशा अपने पात्रों की रचना अपने अनुभवों में कल्पना को जोड़कर करता है। उनके संवादों में, कविताओं में उनके जीवन का दर्शन होता है, जो हो सकता है कि समाज के एक बड़े हिस्से की वृहद् समस्याओं पर टिप्पणी हो, लेकिन किसी एक इन्सान के समस्या का इलाज वहाँ नहीं है। ये असंभव है। ये वैसे ही असंभव और अतार्किक है जैसे कि बुजुर्ग के पेट खराब होने पर जो दवा उसे दी जाय, वही दवाई दुधमुँहे बच्चे को दे दी जाय। ये वैसे ही असंभव और अतार्किक है जैसे कि ये मान लेना कि हवाई जहाज से जाने वाले और बैलगाड़ी से जाने वाले एक ही समय में पहुँच जाएँगे।

जब रास्ता अलग है, तरीक़ा अलग है, तो फिर वहाँ तक पहुँचने का अनुभव एक हो जाए, ये कैसे संभव है? साहित्यकारों की पहली परत के नीचे एक इन्सान होता है, उसके कई आयाम होते हैं; वो बहुत कुछ छुपाता है; बहुत कुछ वैसा बताता है जैसा वो खुद है ही नहीं; बहुत वैसे प्रोजेक्शन्स फेंकता है जो वो होना चाहता है आदर्श स्थिति में। ऐसे में वो हमारे सवालों का जवाब कैसे दे देगा?

अब सवाल ये है कि हम उन्हें पढ़े ही क्यों? क्योंकि हम हमेशा अपने जीवन में उन्हें उतारने के लिए नहीं पढ़ते। हम उन्हें इसलिए पढ़ते हैं कि हम दूसरे समाज को, दूसरे पात्रों को, दूसरी जगहों को, दूसरे अनुभवों को जानें। ये जानना ज़रूरी इसलिए होता है ताकि हमारे अनुभवों का दायरा सीमित न रहे। हम कमरे में बैठे एक अंतर्मुखी व्यक्ति हो सकते हैं, जिसे बाहर के सामान्य लोगों की बजाय किताबों में रहना बेहतर लगता है। हम गाँव का वो व्यक्ति हो सकते हैं जो शायद कभी शहर न जा पाए, या शहर का वो व्यक्ति जो कभी गाँव न जा पाए!

किताब, या किसी भी तरह की रचना, अपने साथ अलग लोगों के लिए अलग उद्देश्य लिए होती है। इससे भाव उत्पन्न होते हैं, जो आपको अलग-अलग मूड में अलग-अलग तरीक़े से अपील करते हैं, प्रभाव छोड़ते हैं। अगर कोई किताब, शायरी, पेंटिंग या फ़िल्म हर बार यूनिवर्सल होती तो वो हर व्यक्ति को एक ही तरीक़े से अपील करती, लेकिन हम देखते हैं कि किसी को अच्छी, किसी को बुरी, किसी को बहुत अच्छी लगती है। हर व्यक्ति उसे अपने अनुभवों के आधार पर डिकोड करता है। फिर तो बनाने वाले के अनुभव भी अलग रहे होंगे, वो हमारे अनुभवों से कैसे मिलेंगे, और हमारे अनुभवजनित सवालों के जवाब कैसे दे पाएँगे?

इसीलिए, इस ख़तरनाक स्थिति से बाहर आइए, अगर आप वहाँ तक डूब चुके हैं तो। कई साहित्यकारों ने आत्महत्या कर ली, कईयों ने खुद को नुकसान पहुँचाया, कई लोग बाद में अपनी रचनाओं के बिलकुल ही विपरीत स्वभाव वाले निकले। आप या हम मरे हुए लोगों को वापस बुलाकर उनसे सारे सवाल नहीं पूछ सकते उन्हें जानने के लिए। उनके बारे में जो भी उपलब्ध है, वो बहुत ही सीमित है। ऐसे लोगों को अपना आदर्श मान लेना, उनकी बातों में अपना जीवनदर्शन ढूँढना एक ख़तरनाक स्थिति है। असफल लोगों की ज़िंदगी से सफलता के गुर मत सीखिए, नुकसान ही होगा।….

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