गुजरात चुनाव समीक्षा: कॉन्ग्रेस ईवीएम, ‘भाजपा को 150 नहीं मिले’ के पीछे नहीं छुप सकती

आज सुबह जब मैं जगा, तेरी क़सम ऐसा लगा कि… सुबह-सुबह कुछ बंधू टेंशन में थे कि भाजपा गुजरात हार जाएगी। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। खासकर तब जबकि आम जनता का मूड, कॉन्ग्रेस के दो मुख्य मुद्दों, जीएसटी और नोटबंदी, पर लगातार हर चुनाव में भाजपा के साथ रहा है। बाकी के मुद्दे हर चुनाव में गौण रहते हैं, या मीडिया उस पर बात करना ज़रूरी नहीं समझती।

मैं न तो गुजरात गया, न ही खुद को फ़ैशनेबल ‘सेफोलॉजिस्ट’ मानता हूँ, लेकिन लगातार ख़बरें पढ़ते रहने और अपनी समझ के हिसाब से ये समझ गया हूँ कि ये सब होता कैसे है, और क्यों। हर तरह के हथकंडे, हर तरह की पार्टी अपनाती है। संवैधानिक नियमों के साथ हर कोई खेलता है। हर तरह की पार्टी के लिए हर तरह की मीडिया है। कई पत्रकार स्टूडियो से रैली करते पाए जाते हैं, तो कई प्राइम शो में भावुक होकर निष्पक्षता छोड़कर कार्यकर्ता बन जाते हैं।

कॉन्ग्रेस की हार पर चर्चा से पहले मैं कुछ बात पत्रकारों पर भी करना चाहूँगा। हर टीआरपी खींचने वाली बात को तूल नेता से ज्यादा पत्रकार ही देते हैं। सवाल पूछने से ज्यादा पब्लिक ओपिनियन को जानबूझकर एक दिशा में मोड़ने का काम भी पत्रकार ही करते हैं। मुद्दे की बातों को छोड़ते हुए, मशरूम पर बात भी पत्रकार ही करते हैं। और इन्हीं की बातों को हम और आप देश का मूड मानकर अपनी चर्चा और विचार बदल लेते हैं।

राहुल गाँधी को एक नए अवतार में लाने की अच्छी कोशिश की कॉन्ग्रेस ने। नया आईटी सेल, जिसकी टीम सवाल से लेकर, शायरी और पीडी के नाक पर रखे बिस्कुट खा जाने तक को भुनाने में खपती दिखी। फोटो-ऑप हुए, रैलियों में क्या बोला गया, उसे कैसे दिखाया जाय, सारी कोशिशें हुईं। राहुल गाँधी को चर्चा में रखकर ये ज़बरदस्त कोशिश हुई कि उन्हें मोदी के समकक्ष रख दिया जाय।

हलाँकि, सिर्फ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हो जाने भर से जनता में उनकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता नहीं हो जाएगी। आईटी सेल की सबसे बड़ी ग़लती थी कि भाजपा को घेरने के लिए वो भाजपा की ही पुरानी योजना से चल रही थी। यहाँ मोदी को बुरा, विकास को ‘गांडू’ कहने से लेकर हर तरह की नकारात्मक बातें हुईं जिसे तोड़ने, मरोड़ने और अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकने में भाजपा की आईटी सेल और स्पीच राइटर्स कहीं बेहतर और आगे हैं।

क्या राहुल की टीम और कॉन्ग्रेस के योजना बनाने वाले लोग ये भूल गए कि मोदी गुजराती है? क्या वो सच में ये मानकर चल रहे थे कि ‘नया राहुल’ बनाने की जगह, पुराने मोदी को उसके घर में नाखूनों से नोंचना बेहतर योजना थी? ‘राहुल क्या देंगे’ पर बात मीडिया में नहीं दिखी, बल्कि राहुल ने मोदी को क्या कहा, उसको खूब ट्रेंड कराया गया। अपनी इमारत बनाने की बजाय दूसरे के नीचे बम लगाने वाली योजना असफल ही होती है।

उस दौर में जहाँ हर फैक्ट के काउंटर फैक्ट मैनुफ़ैक्चर हो जाते हैं, वहाँ आप गलत आँकड़े ट्वीट करने से लेकर तमाम वो बातें करते दिखे जो आप ही की केन्द्र सरकार ने मोदी की सरकार को बेहतर कहते हुए अवार्ड के रूप में दिया था। गुजरात में रोजगार की बातें? जब बिहार के मज़दूर वहाँ के इन्फ़्रा बूम में ईंट ढोने जा रहे हैं, जहाँ की सड़के अच्छी और साफ हैं, जहाँ लड़कियाँ देर रात तक बाहर निकल सकती है, उस राज्य में आप विकास को गांडू कह देते हैं?

राहुल गाँधी की टीम ने ज़ोर तो खूब लगाया लेकिन उन्हें जनेऊ पहनाकर, मंदिरों में पूरे कपाल पर लाल टीका लगवाकर, गोशाला का उद्घाटन करवाकर भाजपा की ही ज़मीन पर उतार दिया। जेटली ने कहा भी कि जब ऑरिजिनल हिंदुत्व वाले खड़े हैं तो डुप्लीकेट क्लोन को कौन स्वीकारेगा?

मंदिर की राजनीति करने से कॉन्ग्रेस ने अपना कोर वोटर गँवा दिया। जब आपका कोर वोटर आपका साथ छोड़ता है, तो आप नए जोड़ने में पीछे ही रहेंगे। मैनिफेस्टो में सॉफ़्ट हिंदुत्व की बातें, मंदिरों में जाकर खूब सोशल मीडिया पर बज क्रिएट करना, ये सब करके भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने वाले कॉन्ग्रेसी ये बात भूल गए कि मुसलमान वोटरों को ये पसंद नहीं आएगा। वो भले ही भाजपा को वोट न करें, लेकिन इस तरह की पार्टी को भी नहीं करेंगे जो उसी की राह पर जा रहा है।

साथ ही, शहरी इलाकों में कॉन्ग्रेस के समय हुए दंगे इतने ज्यादा हैं कि वहाँ के व्यापारी कभी भी उन्हें सत्ता में नहीं देखना चाहते। वहाँ के व्यापारियों ने दंगों के इतने दंश झेले हैं, मुस्लिम अपीजमेंट के चक्कर में अपराधियों के गैंगों का आतंक देखा है, और इसी कारण से उन्हें मोदी बेहतर लगता है, भाजपा बेहतर लगती है।

साथ ही, भाजपा ने जीएसटी को हड़बड़ी में ही सही, लेकिन इस चुनाव से छः महीने पहले लाकर कई परेशानियों को दूर कर दिया। अगर यही तीन महीने पहले आता तो ये क़िस्सा अलग होता। भाजपा को समय मिला कि वो व्यापारियों की समस्या समझकर दूर कर सके, और जीएसटी में लगातार बदलाव करता रहे। गब्बर सिंह टैक्स कहकर माखौल करने से बेहतर ये रास्ता था कि व्यापारियों को ये कहा जाय कि दो दर्जन टैक्स से बेहतर एक टैक्स है, लेकिन शुरू में परेशानी होगी। व्यापारी इन बातों को समझे, और ये भी देखने लगे कि चेक से पेमेंट 40 से 70% हुआ है, लोग पैन कार्ड देकर सारा व्यापार सफ़ेद तरीक़े से करने लगे हैं।

अगर जीएसटी के बाद भी, जिसको उतारने में भाजपा ने जल्दी तो की लेकिन आँकड़ों से सीखते हुए लगातार बदलाव करते रहने से व्यापारियों को ये समझ में आने लगा कि एक बेहतर रिफॉर्म को फलित होने में समय लगेगा, लेकिन फ़ायदा भी होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो गुजरात जैसे राज्य में जो कि पूरी तरह से व्यापार केंद्रित अर्थव्यवस्था और समाज है, वहाँ अमित शाह के एंटी-इनकम्बेन्सी को स्वीकारने के बावजूद भाजपा का जीतना दुष्कर होता।

कॉन्ग्रेस नया राहुल ‘दिखा’ तो पाई, लेकिन वो ‘नया’ क्या है, ये कभी ‘बता’ नहीं पाई। पार्टी के दफ़्तर में इस पर पटाखे खूब छूटे कि वो अध्यक्ष बनने वाले हैं लेकिन इससे किसी गुजराती वोटर को क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ये पता नहीं चला। छवि की बाहरी रूपरेखा सबने देखी, भीतरी विजन क्या था, ये बाहर नहीं आया।

जब समय खराब होता है तो सिब्बल उस समय राम मंदिर के विरोध में वक़ील होकर चुनाव तक इस फ़ैसले को टालने की बात कर देते हैं, जब राहुल जनेऊ पहन कर मंदिरों में प्रसाद चढ़ाकर हवन कर रहे थे। इतने संवंदनशील समय में, जहाँ कॉन्ग्रेस के पास ज़बरदस्त मौक़ा था कि वो जीत जाए, सिब्बल की ये करतूत बेकार और ग़ैरज़रूरी थी।

रही-सही कसर अभिजात्य अहंकार के पुरोधा मणिशंकर अय्यर ने मोदी को नीच कहकर कर दिया। जब मोदी को आप ‘नीच’ कहते हैं तो आप मोदी के अनुसार पूरे गुजरात को, पूरे ओबीसी समाज को, हर उस ग़रीब को नीच कहते हैं जो अपना भविष्य देखता है, ऊपर उठना चाहता है। मणिशंकर अय्यर हिन्दी का कम ज्ञान बताकर छुपने की कोशिश करते रहे लेकिन इस तरह के शब्द का प्रयोग एक लम्बे समय की कुंठा है, अज्ञान नहीं।

अगली बात जो राहुल गाँधी के उल्टे पड़ी वो थी कॉन्ग्रेस का खुद को कमज़ोर मान लेना। मतलब ये कि आप हर जगह क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक मंत्री पद की लालसा में गठबंधन कर लेते हैं। कहीं लालू जैसे चोर के साथ, तो कहीं सपा जैसे गुंडों की पार्टी के साथ, तो कहीं हार्दिक जैसे तथाकथित युवा नेता के साथ जो 2017 में जाति के आधार पर आरक्षण की माँग करता दिखता है!

गुजरात जैसे राज्य में, जहाँ आप स्वयं ही सक्षम थे, ये क़दम घातक था। क्योंकि इससे आपने उन लोगों को असहमति दी जो दूसरी जातियों के हैं। साथ ही, एक पढ़े-लिखे राज्य में, आप किस युग की बात कर रहे हैं जब आप आरक्षण के लिए लड़ने वालों के साथ हो जाते हैं?

और अंततः ईवीएम पर सवाल! ये अब इस स्तर का चुटकुला बन गया है कि कोई भी गम्भीरता से इस पर बात नहीं करना चाहता, सिवाय हारने वालों के। एक तरफ आप ये बात करते हैं कि मोदी भारत को ‘मिडिवल टाइम्स’ में ले जाना चाहता है, और दूसरी तरफ आपको चोरी किए जा सकने वाले, इनवैलिड वोटों की भरमार लाने वाले, बूथ लूट लिए जाने वाले बैलट पेपर की याद आती है? टेक्नॉलिजकल डेमोन्सट्रेशन वाला बुलेट ट्रेन मिडिवल है या फिर 2017 में जातिगत आरक्षण की बातें?

अगर इतनी कड़ी टक्कर और 42% वोट शेयर के बावजूद कॉन्ग्रेस ईवीएम वाला राग अलाप रही है तो उसे ये ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब में भाजपा हारी है, और गुजरात में उसके सीट बढ़े हैं। मोदी के राज्य में वो ईवीएम मैनेज करते हुए इस 42-50 की जगह 70-30 के वोट शेयर और सीट से हराती। फिर भी जिनको ईवीएम पर विश्वास नहीं होता, वो एक बार चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर पढ़ लें कि ये करना असंभव है, और क्यों है। जीतने पर ईवीएम ठीक, हारने पर गलत?

वैसे, अगर भाजपा ये चुनाव हार जाती तो शायद इनका घमंड थोड़ा कम होता। लेकिन राहुल गाँधी भाजपा को भाजपा की ही तीन साल पुरानी स्ट्रेटेजी, हिन्दुत्व के चोग़े, ट्विटरबाजी, और झूठी बातों की राजनीति करने के चक्कर में हराने का एक बेहतर मौक़ा गँवा बैठे। अध्यक्ष बनते ही गुजरात का सेहरा, मोदी के गुजरात में मोदी को हराना, सही मायनों में ऐतिहासिक होता और कार्यकर्ताओं में नई जान फूँक देता।

मगर वो हो न सका, और ये आलम है…

पीएस: ऐसा नहीं है कि मैंने परिणाम के बाद बाकी चुनाव विश्लेषकों की तरह अपने तर्क ‘फिट’ कर दिए हैं। चुनाव परिणामों के पहले भी मेरे तर्क यही थे।….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *