वर्षगाँठ की बधाई सैनिक स्कूल तिलैया!

वर्षगाँठ की बधाई सैनिक स्कूल तिलैया!

तुमने क्या-क्या नहीं दिया! नाक बहती थी, वज़न तीस किलो हुआ करता था, बमुश्किल साढ़े चार फ़ीट लम्बाई लिए, 1,60,000 में से दो परीक्षाएँ पास कर चुने हुए 120 में से एक… यहाँ तक पहुँचने के लिए अपने मास्टर साहबों से अनगिनत छड़ियाँ खाते थे कि 99 ही क्यों लाए, 100 क्यों नहीं, एक नंबर कहाँ गया!

दो तोप से सुसज्जित उस मेन गेट से घुसते थे जिसके ऊपर लिखा हुआ करता था, “अ नर्सरी फ़ॉर द फ्यूचर ऑफ़िसर्स ऑफ़ इंडियन आर्मी, नेवी एण्ड एयरफ़ोर्स”। घुसते ही दाहिनी तरफ के पार्क में फ़ाइटर प्लेन खड़ा हुआ करता था। देखकर लगता था कि नौ-दस साल की उम्र में बहुत रगड़ा है फिर यहाँ तक पहुँचे हैं।

बिहार (और झारखंड) के बच्चों के लिए पैदा होते ही कम्पटीशन शुरु हो जाता था। लालू का ही राज था 1997 में भी। हर माँ-बाप बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते थे और सैनिक स्कूल पूरे क्षेत्र के उन चुनिंदा स्कूलों में से एक था जहाँ भेजने से बेहतर भविष्य लगभग सुरक्षित हो जाया करता था। अतिशयोक्ति नहीं होगी, अगर मैं ये कहूँ कि हमारे स्कूल से निकले 95-99% बच्चे अपने लक्ष्य को पाने में सफल रहते हैं। हर बैच से चार-पाँच ही नामाकूल होते थे जिन्होंने ठान लिया होता था कि उनको कुछ नहीं करना है, और उनका कुछ नहीं हो पाता।

ख़ैर, 1963 के 16 सितम्बर को खुला ये स्कूल कई मायनों में बेहतरीन था, और है। जैसे कि कैडेट पर किसी भी तरह का एकेडमिक प्रेशर नहीं, होमवर्क का कॉन्सेप्ट नहीं। क्लास में पढ़ाई और रात में अपने मन के विषय पढ़ते रहिए। आपकी मदद के लिए चौबीस घंटे शिक्षक और आपके सीनियर तैयार रहेंगे। चाहे मदद किताबों से जुड़ी हो, या फिर खेल आदि से, आपके लिए तत्पर।

दूसरी बात ये कि वहाँ का फ़ंडामेंटल विजन ये था कि हर बच्चे में ख़ूबी होती है, उसको तलाशने और तराशने की ज़रूरत होती है। आपका एकेडमिक्स बहुत खराब हो तभी आपको आपके सीनियर और शिक्षक समझाएँगे, डाँटेंगे कि न्यूनतम स्तर तक होना भी ज़रूरी है। बाकी समय एक औसत बच्चे को भी कोई प्रेशर नहीं होता। उनके माता-पिता देते हों, तो वो अलग बात है।

लगभग 900 बच्चों के लिए बना स्कूल 250 एकड़ में फैला था और वहाँ की सोच यही थी कि कोई भी बच्चा बिना हुनर का नहीं होता। मतलब ये कि कोई पढ़ने में बेहतर होगा, कोई आर्टिस्ट बढ़िया होगा, कोई डिबेट में आगे होगा, कोई लिखने में, कोई स्टेज परफ़ॉर्म ग़ज़ब का तो कोई गायक बेहतरीन। कोई फ़ुटबॉल में बेहतर, कोई वॉलीबॉल में, कोई बास्केटबॉल में, कोई हॉकी में। किसी की ड्रिल अच्छी, तो कोई धावक बेहतरीन होगा। शिक्षा और जीवटता के तमाम आयाम जो उस उम्र के लिए चाहिए, उनको पोषित किया जाता था।

सबसे अच्छी बात ये थी कि रैगिंग बहुत तगड़ी होती थी। वैसे ये आपलोगों को अजीब लगेगा सुनकर, लेकिन मेरा मानना है कि अनुशासन के लिए स्कूलों में एक न्यूनतम स्तर के माहौल की ज़रूरत होती ही है। ऊपर से सैनिक स्कूल है, तो वहाँ वैसी ज़रूरत भी है। कई सीनियर बच्चे अति कर देते थे, जो कि अमानवीय की भी श्रेणी में जा सकता है, पर ऐसे लोग कम ही होते थे। आपकी शर्ट की बटन, बेल्ट का मोनोग्राम, पैंट की ज़िप के एक लाइन में होने से लेकर जूतों की चमक, बाल की लम्बाई और बोलने के लहजे तक पर सीनियर्स की कड़ी नज़र होती थी।

कहीं भी देरी से पहुँचने का सवाल ही पैदा नहीं होता, वरना फ्रंटरोल और मुर्ग़ बनकर चलते रहिए। मैन हैंडलिंग, यानि थप्पड़-बेल्ट आदि से पीटना भी हुआ करता था, लेकिन वैसे बच्चों को शिकायत करने पर वॉर्निंग के बाद निकाल भी दिया जाता था। लेकिन थप्पड़ और बेल्ट दोनों ही चला करते थे, ये छुपाने की बात नहीं है। मैंने खाई भी, मारा भी। बाद में छोड़ दिया, और अब ग्लानि होती है कि मुर्गा बनाकर भी काम चल जाता, थप्पड़ मारने की ज़रूरत नहीं थी।

लेकिन उस अल्पवयस्क बच्चे की मानसिकता ये होती थी कि जूनियर्स उसके नाम से काँपें और कहें कि ‘अजीत जी का टेरर है!’ इस टेरर का क्या हुआ करता था, मुझे याद नहीं। हाँ, मेरा एक जूनियर भवेश कहता है कि मैं ग्लास में चाय लबालब भरा हुआ मँगवाता था। अगर वो कम हुआ, यानि कि पकड़ने की भी तो जगह होनी चाहिए, तो जूनियर पिटता था। ये वाक़या मुझे याद नहीं, लेकिन जो पिटा है, उसको तो याद होगा ही।

सुबह छः बजे जगकर मॉर्निंग पीटी होती थी जिसमें तेरह किलोमीटर की दौड़ से लेकर तमाम शारीरिक व्यायाम शामिल थे। फिर सात बजे नाश्ते के लिए एशिया का दूसरा सबसे बड़ा मेस आपके लिए ब्रेड, बटर, जैम, पॉरिज, छोले, अंडे, चाय और दूध के साथ इंतज़ार करता था। पाँच से सात मिनट में जितना खाना है खा लीजिए। उसके बाद मॉर्निंग असेंबली हुआ करती थी जिसमें पूरे स्कूल के सारे कैडेट और शिक्षक, हेडमास्टर (सेना के मेज़र रैंक का कोई ऑफ़िसर) एक ओपन एयर थियेटर में बैठा करते थे।

नेशनल न्यूज़, इंटरनेशनल न्यूज़, हिन्दी प्रीपेयर्ड स्पीच, इंग्लिश प्रीपेयर्ड स्पीच, इंग्लिश एक्सटेम्परी स्पीच और उसके बाद किस बच्चे ने किस तरह की ग़लती की, ये बताया जाता था। यानि की आपने उच्चारण में श को स पढ़ा, किसी देश का नाम गलत लिया, आप में बोलते वक़्त आत्मविश्वास की कमी थी तो उसको दूर कैसे करें आदि। ये सारी ट्रेनिंग इतने सहज तरीक़े से होती थी कि आपको पता भी नहीं चलता था कि आपकी ट्रेनिंग हो रही है। ये एक जीवनशैली थी। असेंबली के बाद चालीस मिनट की सात कक्षाएँ होती थीं, बीच में बीस मिनट का ब्रेक जिसमें समोसे, लिट्टी, बिस्किट, रोस्टेड पीनट्स, स्वीट पीनट्स, चना आदि हर दिन बदलकर मिलते थे।

फिर लंच, उसके बाद अपने डोर्मिटरी में आराम कीजिए (सीनियर बच्चे, सातवीं-आठवीं क्लास के लिए नेहरू का नारा ‘आराम हराम है’ लागू हुआ करता था)। बड़ा-सा टीवी लगा हुआ था, उस पर कोई सीनियर जो दिखाना चाहे वो देखिए। फिर गेम्स। गेम्स पीरियड घंटे भर का होता था जिसमें बारी-बारी से हर हाउस को वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, फ़ुटबॉल आदि खेलने को मिलता था। क्रिकेट बहुत समय लेता था तो उसकी फॉर्मल ट्रेनिंग नही दी जाती थी। जिनको खेलना है, किट पड़ा हुआ करता था, रविवार को खेलिए।

फिर शाम की चाय, और हल्का नाश्ता। फिर नहाइए और ‘प्रेप’ के लिए जाइए। प्रेप का मतलब प्रीपेरेटरी स्टडीज़। यानि सेल्फ़ स्टडी करना। यहाँ पर आपको जो पढ़ना है पढ़िए, नहीं पढ़ना है तो किताब खोले रहिए पर सोइए मत। सोते पाए जाने पर सीनियर आपको गेट पर लटका देते थे और पूछते थे, “अजीत भारती, नींद टूटी?” “यस सर!” “ठीक है बैठ जाओ।” जब मैं सीनियर हुआ तो मैंने भी इस कार्य को अंजाम दिया, बहुत आनंद आया करता था। लेकिन कुछ लड़के ऐसे भी होते थे जो लटके-लटके भी सो लेते थे!

इसके बाद होता था डिनर जिसमें हर दिन अलग-अलग वेज-नॉनवेज, फल आदि से लेकर तमाम चीज़ें होती थीं। नाश्ते में इडली, उथप्पम, छोले-भटूरे, ब्रेड, बन, काले चने और मटर के छोले, दलिया आदि अलग-अलग दिन। दोपहर के खाने में चावल, दाल, सब्जी, करी, रायता, फल आदि हुआ करता था। दोपहर में उतनी वरायटी नहीं थी। रात में चिकन, अंडा करी, पूरी, चपाती, पनीर, रसगुल्ले आदि हुआ करते थे चावल के साथ।

डिनर के बाद फिर एक घंटे का प्रेप हुआ करता था। ये किसी नए प्रिंसिपल ने शुरू करा दिया था जिसे एकेडमिक्स ज्यादा प्रिय था। फिर इसके बाद लाइट-आउट होता था, जिसका मतलब है सबके सोने का समय। हलाँकि पढ़ाकू बच्चे इस समय अपना टेबल लैम्प निकाल कर पढ़ते थे। ऐसे बच्चे बारहवीं के बाद आईआईटी में पाए जाते थे। हमसे इतना कभी नहीं हुआ, और दसवीं से लग गया था कि इंजीनियरिंग और मेडिकल हमारे वश की बात नहीं है। तो ज्यादा पढ़ने का सवाल ही नहीं था।

मनोरंजन के लिए शनिवार (और बाद में रविवार को भी) ओपन एयर थिएटर में लेटेस्ट फ़िल्में प्रोजेक्टर से दिखाई जाती थीं। जब तक पुराना ‘रील’ वाला प्रोजेक्टर था तब तक मिथुन और गोविन्दा ने राज किया, फिर तो जो भी फ़िल्म रिलीज़ हुई, उसकी पाइरेटेड कॉपी नए एलसीडी प्रोजेक्टर पर हमने देख ली। अगर किसी बार दो से ज्यादा फ़िल्म रिलीज़ हो गई तो हो सकता है रविवार की दोपहर हमारे अपने लोकल टीवी स्टेशन से वो फ़िल्म दिखा दी जाए। वो एक ही बार में सारे डोरमिटरी, टीचर्स क्वाटर्स, स्टाफ़ क्वाटर्स आदि में चलाए जाते थे। रील वाले प्रोजेक्टर के समय में अगर फ़िल्म चल रही है तो आँधी आए, बारिश हो या कुछ और, बेठकर फ़िल्म देखते रहिए। हमने गोविन्द और मिथुन की कई फ़िल्में बारिश में रेनकोट पहन कर भीगते हुए देखी है। सप्ताह में एक दिन तो फ़िल्म आती थी इतने बड़े स्क्रीन पर, वो भी मिस कर दें, ये तो असंभव था।

सात साल यही जीवनशैली चलती रही। हम लिखने, बोलने, स्टेज परफ़ॉर्म बेहतर थे तो उसी हुनर को सीनियर्स और टीचर्स ने तराशा। जो पढ़ने में अच्छे थे उन्हें वैसा माहौल दिया जाता था कि वो बाकी जगह बिना काम का फँसा ना रहे। पढ़ने वालों को अलग रखा जाता था, खेलने वालों को अलग, बकचोद लौंडों से सीनियर चुटकुले सुनते थे। मैं चुटकुले बनाता भी था, सुनाता भी था। मेस में अगर ठीक खाना न मिल रहा हो, कोई शिक्षक गलत व्यवहार कर रहा हो, या किसी नियम से हमें समस्या है तो गुप्त नाम के साथ पोस्टरबाजी भी की जाती थी।

हलाँकि, खाना तो बेहतरीन मिलता था लेकिन कभी (ग़लती से भी) दाल में कंकड़ मिल गई तो अगले दिन दो बाय तीन फ़ीट के चार्टपेपर पर एक कार्टून और कैप्शन मेस की टंकी पर चिपका मिलता था जो हर बच्चा पढ़ता था और हँसता था। जो मेस इन्चार्ज मास्टर साहब थे, उस समय एक रशीद सर थे, उनके नाम से लिखा जाता था: रशीद दा ढाबा, स्पेशल मेनू में कंकड़ वाली दाल आदि। ये काम बड़ा क्रिएटिव होता था। हमारे ग्रुप का नाम था ‘सुंदर यादव ग्रुप’ जो कि गंगाजल के सुंदर यादव से लिया गया था। एक आदमी (मैं) पोस्टर का थीम सोचता था, एक आर्टिस्ट (सतीश) उसको ड्रा करता था, और तीन चार डेयरडेविल लौंडे जिसमें चंदन कुमार अव्वल था, वो सही जगह पर रात के दो बजे चिपकाता था। सबको पता होता था कि किसकी करतूत है, लेकिन साक्ष्य के अभाव में कोई शिक्षक पकड़ नहीं पाता था। पकड़े जाते तो स्कूल-विरोधी गतिविधियों मेक कारण सीधा निकाला जाना तय था।

पहले तीन साल बहुत रगड़ा जाता था, और उसके बाद आपको मजा आने लगता है। जब बाहर आते हैं, और दुनिया में खुद को पाते हैं, तो लगता है कि क्या स्कूल था वो! वहाँ के दोस्त लगभग आजीवन आपके दोस्त होते हैं। हर बैच से आपको कोई आईएएस मिल जाएगा, कई डॉक्टर, इंजीनियर, सेना के कई ऑफ़िसर। जिंदगी के हर क्षेत्र में बैच का कोई लड़का होता ही है क्योंकि उसकी परवरिश वैसी हुई जिसमें उसके हुनर को ये कहकर नकारा नहीं गया कि पढ़ाई करो, कविता लिखना बेकार की बात है। ये नहीं कहा गया कि स्टेज पर नाटक करने से कुछ नहीं होगा। ये नहीं कहा गया कि खाली दौड़ते रहने से, फ़ुटबॉल खेलने से घर नहीं चलेगा। यही कारण है कि जो जहाँ है, अच्छा कर रहा है।

आज 54 साल हो गए हैं हमारे स्कूल को जो पूरे देश में 25 ही है। सैनिक स्कूल में पढ़ाई नहीं होती, जीवनशैली विकसित की जाती है। वहाँ तोप देखकर घुसने के बाद, सात साल बाद जब उस कैम्पस से निकल कर किसी भी जगह जाते हैं तो हम तोप बन जाते हैं। वहाँ का मीडियोकर लड़का बाकी जगह के लिए एक्सट्राऑर्डिनरी होता है क्योंकि वो पढ़ने से लेकर खेलने बोलने, लिखने आदि में बाक़ियों से बेहतर होता है। और ये सारे काम वो अपने सात साल के स्कूल जीवन में इतनी बार कर चुका होता है कि नए-नए कॉलेजों में उसका भोकाल टाइट हो जाता है। लड़कियों को भी ये पसंद आता है क्योंकि वो लेट नहीं होता कभी, और वेट भी करता है क्योंकि ब्वॉय्ज स्कूल से आता है तो लड़की की महत्ता जानता है।

कोटि-कोटि नमन ऐसे विद्यालय को जिसने हमें पहचाना, सँवारा, और इस लायक बनाया कि मैं जो हूँ वो हूँ।

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