हरियाणा बराला काण्ड : लड़की को गरियाइए क्योंकि फ़ेसबुक में सिगरेट मिला है!

हरियाणा वाला काण्ड तो आप लोग पढ़ ही लिए होंगे। हम भी पढ़े, आप सबसे पहले ही पढ़े होंगे क्योंकि हमारा काम ही सारी ख़बरें पढ़ते रहना है। चार-पाँच जगह से पढ़े। ये भी पढ़े कि लड़की ने अपने पोस्ट में ये भी लिखा था कि संभव था कि उसकी लाश बलात्कार के बाद किसी नाले में पड़ी मिलती।

ये जब आप पढ़ चुके होंगे तो आपने, मेरी ही तरह, दूसरी ख़बर पढ़ी होगी। माने, कोई भी ख़बर, या फ़ेसबुक स्क्रॉल किया होगा, व्हाट्सएप्प देखा होगा। तात्पर्य ये है कि मेरी ही तरह आप भी इसको पढ़कर आगे बढ़ गए होंगे। ये बहुत ही सहज रूप से होता है। आपको पता भी नहीं चलता कि आपने एक लड़की की ख़बर पढ़ी जिसका रात के साढ़े बारह बजे दो लड़के पीछा करते हैं और वो सिर्फ और सिर्फ भगवान भरोसे बचती है क्योंकि उसकी कार को रीवर्स करने तक की जगह नहीं थी और वो किसी तरह भाग गई। पुलिस भी तत्परता दिखाते हुए तब तक आ गई थी।

अगर ख़बर का अंत वही होता जो कि उस लड़की ने अपने पोस्ट में लिखा था, तो भी आप या मैं अगली ख़बर पढ़ रहे होते, स्क्रॉल करते, व्हाट्सएप्प चेक करते। मैं ख़बर की हेडलाइन बनाता – हरियाणा में लड़की का हुआ बलात्कार, नाले में मिली लाश। और ये ख़बर मैं आपको नोटिफिकेशन के तौर पर भेज देता। आप पढ़ लेते, फिर दूसरी ख़बर पढ़ लेते।

बलात्कार ना तो नई चीज़ है, ना ही पुरानी होगी। लड़कियों को छेड़ना, पीछा करना आदि समाज में उतना ही सहज हो गया है जितना आपका बाज़ार से सब्ज़ी ख़रीदना। आप प्याज़ ख़रीदते हैं, कोई बलात्कार करता है। आप हश पपीज़ के जूते देखती हैं, वो आपको देखता है। ये चलता रहता है, चलता रहेगा।

फिर भी मैं हर बार इस पर आपको वही पुरानी बात लिखकर सुनाता हूँ। और आपका धैर्य ग़ज़ब का है कि आप हर बार मेरी वही बात वैसे ही पढ़ते हैं, जैसे पिछली बार पढ़ा था।

केस में भाजपा अध्यक्ष का बेटा आरोपी है। अब देखिए, जैसे ही पता चला कि वो भाजपा नेता का बेटा है मीडिया कवरेज बदल जाती है, और प्रशासन का रवैया भी। आप कहेंगे कि मीडिया ने तो सही किया है, आरोपी के ख़िलाफ़ लिखा है। लेकिन मैं जानता हूँ कि हेडलाइन की टोन और कवरेज में फ़र्क़ कैसे होता है। जो भाजपा विरोधी मीडिया है वो सीधा पूरा ठीकरा भाजपा नेता के सर फोड़ रही है, भाजपा सरकार पर फोड़ रही है, और पुलिस की नाकामियाँ गिना रही है। जो भाजपा की चाटुकारिता वाली मीडिया है वो खट्टर के बयान छाप रही है कि नेता के बेटे ने पीछा किया, और ये तो कोई भी कर सकता है।

दोनों ही आपको वही ख़बर बता रहे हैं, लेकिन दोनों का अपना स्वार्थ है। इस ‘समस्या’ पर बात करने में किसी भी तरह की मीडिया को दिलचस्पी नहीं है। ना ही कभी रही है। सत्ता को घेरना, सत्ता की चाटना, मीडिया के यही दो प्रमुख कार्य हैं। ये कार्य बख़ूबी निभाया जा रहा है। शाम में प्राइम टाइम देखिएगा तो एंकरों के शब्दों के चुनाव से लग जाएगा कि कौन क्या करना चाह रहा है।

मूल मुद्दा है कि क्या लड़कियाँ सुरक्षित हैं? उत्तर है : नहीं।

सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहा है कि लोग इस पर बात कर रहे हैं। मुझे अच्छा लगता है जब आम लोग इस पर बातें करते हैं क्योंकि बड़े लोग इस पर बात नहीं करते, वो कविता करने लगते हैं, वो शायरी लिखने लगते हैं, वो फलाने जगहों की तस्वीर शेयर करेंगे। बड़े लोग इन छोटी बातों पर चुप रहते हैं। लेकिन आम लोगों को इस पर बात करनी चाहिए, और वो हो रही है।

लड़की एक आईएएस की बेटी है, तो कम से कम केस तो फ़ाइल हो गया। जब पता चला कि भाजपा नेता से संबंधित है तो फिर पुरानी तकनीक काम में आई कि लड़की का फ़ेसबुक खोदो। खुदाई में उसका सिगरेट निकला, शराब की बोतल मिली होगी, दोस्तों के गले में हाथ डाले मिली होगी। और भाजपा समर्थक खुदाई विशेषज्ञों ने वर्तमान को बताया कि इतिहास में ये लड़की चरित्रहीन है। इसको तो राह चलते कोई बलात्कार भी कर ले तो कोई बात नहीं क्योंकि ये तो सिगरेट पीती है जी!

मामला पुलिस के पास पहुँचा तो पता चला कि वहीं बेल भी दे दिया और सीसीटीवी तो सारे ही खराब निकले। इस देश में सीसीटीवी सुरक्षा के लिए लगती ज़रूर है, लेकिन इतनी संवेदनशील होती है कि बेचारी किसी अबला पर हो रहे अत्याचार को देख ही नहीं पाती। आखिर भाजपा के राज में सीसीटीवी का संस्कारी होना तो बनता है। जिस हिसाब से बेल दिया गया है, मुझे तो लगता है कि उसका तर्क माननीय मुलायम सिंह यादव जी की बात लेकर ना दे दिया गया हो कि ‘बच्चों से तो ग़लतियाँ हो ही जाती हैं!’

लड़की तो बच गई। लेकिन लड़कियाँ बचती कहाँ हैं! केस कुछ ऐसे भी चल सकता है कि लड़की ने बहुत शराब पी रखी थी और पुलिस को जिस हालत में मिली तो वो अचेत थी। फिर वो दारू के नशे में एक कहानी बनाकर बोलती रही कि ये हुआ, वो हुआ। भाजपा अध्यक्ष का लड़का तो भारत में था ही नहीं। इसने उसकी तस्वीर किसी के फोन पर देखी और फिर फैंटेसी करने लगी और रिपोर्ट लिखवा दिया अपने पिता के नाम का धौंस दिखाकर।

मैं मजाक नहीं कर रहा। उसके बाप को ये भी कहा जा सकता है कि ‘बेटी को कुछ हुआ तो नहीं ना, केस वापस ले लो, नहीं तो आगे कुछ हो जाएगा तो ज़िम्मेदारी मेरी नहीं है।’

ये वाकये इतने होते हैं, और इतनी बार होते हैं कि हम उसे टूटे सड़क की ख़बर की तरह पढ़कर भूल जाते हैं। लड़कियों पर होती हिंसा और टूटे सड़क की ख़बर में अंतर होता है। मैं आपसे ये नहीं कह रहा कि आप ख़बर पढ़कर रोने लगिए, कैंडल मार्च कीजिए, घेराव कीजिए। नहीं। अपना वोट सोच समझ कर दीजिए। संवेदनशील बनिए, ख़बर पढ़कर ठहरिए। इनके नाम जानिए, और नाम हटाकर अपनों के नाम लगाकर पढ़िए ताकि आपको थोड़ा दुःख हो कि किसी के साथ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था। ये दुःख बाँटना ज़रूरी है, क्योंकि ये अकेली लड़की का नहीं, पूरे समाज का दुःख है।….

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