रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस लोया के केस में स्वतंत्र जाँच की ज़रूरत को ख़ारिज करते हुए कहा कि उनकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी और याचिका दायर करने वालों ने न्याय व्यवस्था को ‘स्कैंडलाइज़’ करने की कोशिश की। ये फ़ैसला इंडियन एक्सप्रेस के उस रिपोर्ट को सही ठहराती है जहाँ उनके रिपोर्टर ने कारवाँ के तथाकथित इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज़्म के नाम पर गुजरात चुनाव में माहौल बनाने के लिए छापी कवर स्टोरी को पूरी तरह से बिन्दुवार तरीक़े से तोड़कर ग़लत साबित किया था।

मज़ेदार बात यह है कि रामनाथ गोयनका पुरस्कार से अनेकों बार पुरस्तकृत निष्पक्ष पत्रकारिता के स्वघोषित मसीहा ने तब कारवाँ की ख़बर को सही मानते हुए गोथिक थीम में प्राइम टाइम किया था। दो दिन बाद ही एक्सप्रेस की ही ख़बर पर, जिस अख़बार को वो सोते-जागते कोट करते रहते हैं, कोई चर्चा नहीं की थी और माहौल पूरा बनाते रहे।

इससे ये सब साबित होता रहता है कि जस्टिस लोया, सीमेन भरे ग़ुब्बारे, मुस्लिम लड़की का ‘देवीस्थान’ में बलात्कार आदि चुनावों के समय उछाले जाने वाले मुद्दे मात्र हैं जिनसे पब्लिक ओपिनियन को मोदी के विरोध में प्रभावित किया जा सके। इससे आप एंटी-मोदी नैरेटिव क्रिएट करते रहिए क्योंकि कोई ढंग का मुद्दा आपके पास होता नहीं। 

चाहे वो अमित शाह के बेटे की कम्पनी का मामला हो, या फिर लोया केस, दोनों में ही बैंकिंग और क्राइम इन्वेस्टिगेशन की समझ रखने वाले समझ जाएँगे कि ये मुद्दे एक दिन भी आँकड़ों और तथ्यों पर आधारित सवालों पर खड़े नहीं उतरेंगे। अगर धोखाधड़ी से करोड़ों का फायदा उठाया था शाह के बेटे ने तो किसने किस पार्टी या वकीलों वाली पार्टियों के वकीलों को केस करने से मना किया था? कर लेते, तो सामने आ जाती सच्चाई! 

अब रवीश कुमार और उनके भक्तों से मेरा ये सवाल है कि क्या वो माफ़ी माँगेंगे? क्या वो ये बात मानेंगे कि ज़बरदस्ती के अजेंडे के तहत वो अपने गिरोह के साथ एक ज़हरीला कैम्पेन चलाते रहते हैं? क्या उनके उसूल और आदर्श आज उनसे ये सवाल पूछेंगे कि क्यों एक ख़बर को अपने मतलब से मोड़ दे दिया जाता है? जस्टिस लोया के बेटे ने लगातार कहा कि उनके परिवार को अलग छोड़ दिया जाए लेकिन हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था। 

और मुझे यक़ीन है कि जब गौरी लंकेश के रिपोर्ट की भी जाँच का सच सामने आएगा तो पता चलेगा कि उसमें भी दक्षिणपंथियों का कोई हाथ नहीं था। लेकिन जिसको गरियाकर माहौल बिगाड़ना होता है, जिसका घर इसी घृणा के कैम्पेन से चलता है, वो कैसे रुक जाएगा?

रवीश और उनके भक्त, मित्र और आईएएस की तैयारी को अपना एक मात्र अचीवमेंट बताने वाले ज्ञानी लोग कितनी बार झूठे साबित होंगे, और बिना शिकन वाले चेहरे के साथ अगली घृणात्मक पोस्ट लिखने में व्यस्त हो जाएँगे?

हर रोज लिंक शेयर करके चुटकुला बनाने वाले पत्रकार और फेसबुकिया विश्लेषक क्या आज माफ़ी माँगेंगे? नहीं माँगेंगे क्योंकि वो भूल जाते हैं कि पीछे उन्होंने क्या-क्या कांड किए थे। करते रहो, दोगलापन बाहर आता रहेगा, लोग तुम्हें पहचानते रहेंगे। 

रवीश को अब वैसे भी दस बार में से दो बार ही ढंग के मुद्दे पर बोलते या लिखते देखा जाता है, बाकी टाइम वो स्टूडियो से, अगर किसी के समर्थन में नहीं तो, मोदी-विरोध में रैली करते नज़र आते हैं। ये बात और है कि उनकी रैलियों को न तो अब टीवी पर लोग देखते हैं, न ही उनके पेज पर जहाँ उनको नकारात्मक प्रतिक्रिया ज़्यादा मिलती है। 

मुझे रवीश या उन जैसों से कोई फ़िक्सेशन नहीं है। मुझे हर बार इनकी पैंट उतरने पर आंतरिक संतुष्टि मिलती है और आश्चर्य होता है कि आखिर कितने पैंट पहन रखे हैं इन लोगों ने कि इनका नंगापन इनके भक्तों को दिखता ही नहीं! 

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