पात्रों पर चर्चा: चुनाव, रचना, विकास साहित्य की विधाओं के संदर्भ में

 

इस पर पूरी बात सुनने के लिए ऊपर का विडियो देखें। मैं यहाँ बिन्दुओं में बातें रख रहा हूँ:

लघुकथा में पात्र आम तौर पर कुछ करते रहते हैं। लघुकथा में एक घटना होती है, जिसका कुछ असर पड़ता है। कोई है, कहीं गया, कुछ हुआ। लेकिन ये इतना सामान्य न हो कि वो कहीं जाकर दूध ख़रीद लाया।

आपका पात्र किसी परिस्थिति में फँसता है, उसके साथ कुछ असामान्य हो सकता है, कुछ ऐसा जो कि शायद पहले न हुआ है, और अगर हुआ हो तो इस बार उसकी प्रतिक्रिया अलग हो, उस पर असर अलग हो।

लम्बी कहानियों में पात्रों की रूपरेखा बनाने का समय होता है आपके पास। उसमें आप उसके आंतरिक भावों को, उसके गुण-अवगुण, उसकी उम्र आदि पर थोड़ा ध्यान दे सकते हैं।

बहुत लम्बी कहानी हो तो उसमें पूरे पात्र का विकास होता है। वो कहाँ से आया, वो कौन है, वो क्या करता है, कैसा दिखता है, क्या पहनता है आदि। यहाँ पर एक विस्तार की गुँजाइश होती है। ये आम तौर पर जो मुख्य पात्र हैं, और उससे जुड़े एक-दो और पात्र हैं उनके लिए ही सही है।

उपन्यासों में आपको अपने हर पात्र पर ध्यान देना होता है। मसलन, उसकी कहानी क्या है, वो यहाँ तक कैसे पहुँचा, वेश-भूषा, वो कहाँ जाता है, क्यों जाता है, किससे मिलता है, जिससे मिलता है वो कौन है, क्या करता है आदि।

उपन्यासों में आपके पात्र के पास समय, जगह और विस्तार तीनों की ही बेहतर गुंजाइश होती है।

पात्रों पर ध्यान देना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि अगर आप ध्यान नहीं देंगे तो आपका निरक्षर पात्र कहीं कुछ लिख देगा, आपका भौतिकतावादी पात्र कहीं ऐसा संवाद कह देगा जिसकी अपेक्षा आपके पाठकों को नहीं होगी।

पात्र बनाते समय क्या क्या ध्यान में रखना चाहिए:

कहानी क्या है, क्या कहानी के हिसाब से कोई नाम रखा जा सकता है जो उसके व्यक्तित्व को दर्शाता हो? ये ज़रूरी नहीं है, लेकिन हो जाए तो अच्छा ही है।

पात्र की कितनी उपयोगिता है, उसका कार्यक्षेत्र क्या है, वो क्या कर सकता है, क्या उसके होने से कहानी में फ़र्क़ पड़ रहा है? कई पात्र ऐसे होते हैं जो आप गढ़ देते हैं, और बाद में लगता है कि इसकी ज़रूरत नहीं है।

पात्र किस तरह का संवाद बोलेगा: संवाद उसके कहानी के हिसाब से चलना चाहिए न कि कहीं भी, कुछ भी बोल रहा है

पात्र क्या सोचता है, उसका मोटिवेशन क्या है, वो किस चीज का समाधान लाएगा, किस समस्या से भिड़ेगा, क्या उसका कोई लक्ष्य है?

पात्र आदर्श है या इम्परफेक्ट: उसकी ख़ामियाँ जिस पर वो कहानी के साथ-साथ काम करता है, बेहतर बनता जाता है, या बदतर होता जाता है।

पात्र का बाकी पात्रों के साथ सामंजस्य: वो कैसे बातें करता है, एक जगह उसकी पर्सनालिटी कुछ है, दूसरी जगह कुछ और। वह लोगों से कैसा व्यवहार करता है। ध्यान रहे कि आपके पात्र का एक ही लक्ष्य होना चाहिए कि वो कहानी के मुख्य थीम से जुड़ा रहे, वहाँ तक पहुँचने के लिए प्रयासरत हो।

पात्रों से जुड़ी छोटी बातों का ध्यान रखें। वो क्या बोलता है, हर दिन क्या करता है, कोई आदत है उसकी, कुछ ऐसा है जो वो ख़ूब करता है। अगर हाँ तो उसे जाया न करें। कई बार एक छोटी-सी बातचीत, उस पात्र के जीने का नज़रिया बदल सकती है।

मतलब ये कि कहानी या उपन्यास आदि में अगर आपने कुछ भी लिखा है तो उसका कुछ परिणाम होना चाहिए। मतलब ये कि अगर आपने कहीं लिखा है कि ‘वहीं घर के कोने में आग बुझाने वाला सिलिंडर पड़ा था’। अब ये सिलिंडर कभी खराब होना चाहिए, या घर में आग लगनी चाहिए और वो काम में आ जाए। अगर आपके किसी पात्र के बारे में कोई मेडिकल इन्श्योरेन्स की बात कर रहा हो, और वो बीमार न पड़े तो उस बात की कोई ज़रूरत नहीं है, उसे हटा दीजिए।

सबसे ज़रूरी बात ये है कि पात्र हमेशा हमारे इर्द गिर्द होते हैं। उन्हीं से आप नए पात्र गढ़ते हैं। विशुद्ध कल्पना जैसी कोई चीज नहीं होती। हमारी कल्पना वास्तविकताओं के हिस्सों को इधर-उधर जोड़ने और तोड़ने से जन्म लेती है। There is nothing such as imagination with a capital I. Humans can’t imagine anything without prior experiences. सोचिए कि आपने बाघ शब्द नहीं सुना हो और मैंने कह दिया कि बाघ का चित्र बनाओ।

पात्र रचते रहिए क्योंकि वो हर जगह हैं, आपके दिमाग में भी। किसी के विचार, किसी का नाम, किसी का रूप, किसी का रंग, किसी की लम्बाई, किसी के बात करने का तरीक़ा, किसी की कोई खास आदत… ये सब मिलते हैं तब जाकर एक पात्र बनता है। ये फ्रेंकेन्सिटिनियन है। इधर-उधर की चीज़ें उठाकर, नया गढ़ना जो कि बोलता, चलता और कुछ न कुछ करता रहता है।….

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