पुस्तक (साहित्य की विधाओं की) समीक्षा कैसे करें

पुस्तकें तो हम सबने पढ़ीं हैं। कहानियाँ, कविताएँ, लेख और साहित्य की अन्य विधाओं को भी पढ़ा होगा। इसकी समीक्षा कैसे करें जो कि किसी को पढ़ने या न पढ़ने के लिए प्रेरित कर सके। क्या इसका कोई तरीक़ा है? वैसे तो कोई परिपाटी नहीं है जिसका कि बिन्दुवार रूप से अनुसरण किया जाना चाहिए। मतलब कोई फ़िक्स पैटर्न नहीं है, लेकिन कुछ बिन्दु हैं जिस पर आपको ध्यान देना चाहिए।

आगे मैं जहाँ भी लेखक, कवि, पात्र आदि लिखूँ तो उनका मतलब हर लिंग के शब्दों से लें।

आम तौर पर किसी भी किताब, कहानी, कविता या लेखादि पर आपकी एक त्वरित प्रतिक्रिया होती है कि वो बुरी है, अच्छी है, बेहतरीन है, बकवास है, वाहियात है। ध्यान रहे कि ये प्रतिक्रिया है, समीक्षा नहीं। अगर आपको समीक्षा लिखनी है तो इसी प्रतिक्रिया को आधार बनाकर आप आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन ये बात हमेशा ही ध्यान में रखिए कि आपकी त्वरित प्रतिक्रिया, खासकर लम्बी विधाओं (लम्बी कहानी, उपन्यास, कहानी संग्रह, लेख संग्रह) आदि पर सही नहीं हो सकती।

सही इसलिए नहीं होती क्योंकि आपकी वो प्रतिक्रिया अंतिम हिस्से के अच्छे या बुरे होने पर आधारित हो सकती है। हो सकता है कि आपने बाकी के हिस्सों पर ध्यान नहीं दिया जब आपने कह दिया कि ‘वाह! क्या कहानी है’ या ‘यार! ये क्या कहानी है!’

पहले कहानी और उससे संबंधित विधा, उपन्यास, उपन्यासिका, के बारे में बात करते हैं। हिन्दी में बहुत कम उपन्यास लिखे जाते हैं। यहाँ लघु-उपन्यास या उपन्यासिकाएँ लिखी जाती हैं जिसमें मूल कथानक के इर्द-गिर्द ही कहानी चलती है, न कि उपन्यासों की तरह सहायक कथानकों का जाल बिछा होता है। वस्तुतः हिन्दी में उपन्यास की विधा पाश्चिम से आई मान सकते हैं, लेकिन उसको हिन्दी में उस विस्तार के साथ बहुत कम लिखा गया। आप ‘क्राइम एण्ड पनिशमेंट’, ‘वार एण्ड पीस’, ‘मादाम बोभरी’, ‘सन्स एण्ड लवर्स’, ‘फादर्स एण्ड सन्स’, ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सालीट्यूड’ आदि पढ़ेंगे तो लगेगा कि उपन्यास का कैनवस कितना वृहद् हो सकता है। कहानियों के अंदर कहानियाँ, हर पात्र की अपनी कहानी, हर कहानी के पीछे का कारण, परिस्थितियाँ आदि उपन्यास की पहचान होती हैं।

अगर उपन्यास की बात करें तो पहले तो मूल कहानी बतानी चाहिए कि वो क्या है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर बात बता दी जाए। यहाँ अधिकतर लोग समीक्षा में पूरी कहानी बताकर तीन-चौथाई जगह भर लेते हैं जो कि निहायत ही गलत है। कहानी देना है तो संक्षिप्त रूप में बता दीजिए, लेकिन यह भी कहिए कि कितना और है जो पढ़ा जाना चाहिए। दूसरा तरीक़ा है जब आप पात्रों की बातें करें तो कहानी के हिस्से बताते चलें जहाँ वो कमज़ोर या भारी पड़ता है। कहानी बताने में आपको अपनी रचनात्मकता दिखानी होगी।

मूल कथानक की बात जब आप कर रहे हों तो साथ ही ये भी बताइए कि उससे जुड़े सहायक कथानक, सब-प्लॉट्स, कैसे हैं। क्या उनकी सार्थकता है? क्या पात्रों की साहित्यिक परवरिश में ये सहायक कथानक कुछ जोड़ रहे हैं? क्या किसी पात्र के विकास में इनकी और ज़रूरत है? उन हिस्सों पर चर्चा कीजिए कि यहाँ पर लेखक को और लिखना था, या कम लिखना था। साथ ही उस पर अपने विचार जरूर रखिए कि ये क्यों ज़रूरी है, या ग़ैरज़रूरी है। उसके पीछे आपके तर्क क्या हैं?

ये बताते हुए कि पूरी कहानी कैसी बन पड़ी है, आपको कथानक के घटित होने के दायरे (जगह), काल (समय जब वो हुआ), परिस्थितियाँ (मानसिक, वैयक्तिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि) और उनकी आज के समय में प्रासंगिकता पर बात करनी चाहिए। ये कई मायनों में ज़रूरी है। इससे पता चलता है कि समीक्षा करने वाले ने उसे वैसे ही पढ़ा है, जैसा कि पढ़ा जाना चाहिए। यानि कि आपको साहित्य के उस की विधा की समझ है कि तुलसी के मानस की दो पंक्तियों को इक्कीसवीं शताब्दी के मानदंडों पर तौलना मूर्खता है। इन बातों पर चर्चा करते हुए आप लेखक की लिखते समय की मानसिकता के क़रीब पहुँच सकते हैं।

हर कहानी जिस परिपेक्ष्य में घटित होती है, उसकी समीक्षा भी उसको ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। आज की संवेदना को आप ‘महाभारत’ या ‘इलियड’ पर नहीं लागू कर सकते। आपको उस समय के इतिहास, समाज की सामूहिक और पात्रों की वैयक्तिक मनोस्थिति, परिस्थिति और सामाजिक संदर्भ को देखना होगा। अगर वो एक काल्पनिक कथा है तो लेखक ने जो समाज बनाया है उसी के हिसाब से जाँचिए, आज के हिसाब से नहीं। आज के हिसाब से तब लिखिए जब आप उसकी प्रासंगिकता पर लिख रहे हैं। लेकिन वहाँ भी आपको ये ध्यान में लाना होगा कि लिखने वाले की मूल भावना क्या थी, ये नहीं कि उसके दो वाक्यों को उठाकर उसकी कड़ी आलोचना कर दी। एक समीक्षक के तौर पर वो आपकी असफलता और नासमझी है।

फिर बात कीजिए पात्रों की। पात्रों के विकास में, बनने में, एक तारतम्यता होनी चाहिए। उसकी रचना उसके समय के हिसाब से होनी चाहिए। अगर वो समय से आगे चल रहा हो तो उसकी पूरी व्याख्या कथानक में है कि नहीं, ये देखना चाहिए। जैसे कि बिहार के एक गाँव की बात हो रही और कहानी सत्तर के दशक की हो, तो आप वहाँ के सरकारी स्कूल में पढ़ते छात्र को बिना किसी तर्क के अंग्रेज़ी बोलते नहीं दिखा सकते। उसका कारण होना चाहिए। चाहे वो कारण लेखकीय टिप्पणी के ज़रिए आए, या फिर दो पात्रों के संवाद के ज़रिए, “तुमने तो मेहनत करके, किताबें पढकर ही नई भाषा सीख ली!”

पात्र के मनोभाव उसके लगातार चल रहे संवादों से मेल खा रहे हैं या नहीं, ये देखना ज़रूरी है। ऐसा तो नहीं कि वो कहीं बोल कुछ रहा है, और लेखक ने ये लिखा है कि ये पात्र तो ऐसा है। दोनों में संबंध होना चाहिए। पात्रों का शिल्प कैसा है? क्या कथानक में पात्र धीरे-धीरे आगे या पीछे बढ़ रहा है, जिससे कथानक की दिशा पर प्रभाव पड़ता हो? इन बातों पर पात्रों को कसना ज़रूरी है। क्या किसी पात्र में आप अपने आसपास के किसी व्यक्ति की झलक देखते हैं? क्या वैसा ही पात्र आपने किसी और किताब में, फ़िल्म में, तस्वीर आदि में देखा है? अगर हाँ तो दोनों में एक तुलना भी रखी जा सकती है।

पात्रों की महत्ता पर भी आपका ध्यान होना चाहिए कि क्या इसको यहाँ होना चाहिए, ये बोलना चाहिए? ज़ाहिर है कि कहानी तो लेखक की है, लेकिन क्या उसमें विरोधाभास है? क्या किसी पात्र को जितना मुखर या शांत होना चाहिए, उससे इतर तो नहीं जा रहा? क्या किसी पात्र की कई बातें बस कथानक को लम्बा खींचने के लिए तो नहीं कही गईं? इन सब बातों पर पात्रों की समीक्षा ज़रूरी है। साथ ही आपको कौन-सा पात्र बेहतर या बुरा लगा, और क्यों, ये लिखना भी ज़रूरी है।

कई बार लेखक अपनी बातें संवादों के ज़रिए नहीं, बीच-बीच में किसी पात्र या परिस्थिति को लेकर कहता रहता है। उससे आपके विचार मिलते या नहीं मिलते, और क्यों, इस पर बात करनी चाहिए। लेखकीय टिप्पणियाँ कथानक में अपना जगह किस हद तक बना रही हैं? क्या लेखक अपनी बातों को कथानक के ज़रिए कहने में असफल है कि उसे टिप्पणियों की ज़रूरत पड़ रही है? या उसने अपनी बातों को बस बेहतर लगने के लिए रख दिया है? अगर लेखक ने बस ये सोचकर कोई बात लिख दी हो कि उसे कहीं पर कोट किया जाएगा, तो वो बात भी बताइए कि इसकी ज़रूरत नहीं थी।

कथानक का मूल भाव क्या है? संवादों और टिप्पणियों के ज़रिए क्या लेखक किसी सामाजिक या राजनैतिक स्थिति पर ध्यान दिलाना चाहता है? जैसे कि किसी उपन्यास में स्त्री पात्र को सशक्त करना नारीवाद से जोड़ा जा सकता है। कहीं नकारे पुरुष का नेता बन जाना सामाजिक व्यवस्था पर कटाक्ष हो सकता है कि कैसे लोगों को हम राज करने के लिए चुन रहे हैं। समलैंगिक संबंधों की बात किस तरह से की गई है? ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर लेखक ने अपनी बातें कैसे रखी हैं, क्या वो आपको सही लगता है? इन सारी कसौटियों पर इनको कसिए और बताइए कि ये कहाँ हैं।

कई बार फ़ैशन-सा चल पड़ता है कि एक ही तरह की कहानी हर लेखक लिखता रहता है क्योंकि वही चल रहा है। क्या आप इससे सहमत हैं कि एक ही तरह की कहानी लिखी जानी चाहिए या फिर आपका फ़ॉर्मूला साहित्य से विरोध है? अगर हाँ तो क्यों, नहीं तो क्यों। आपकी साहित्यिक समझ क्या माँगती है? क्या आपको विविधता चाहिए या बस एक ही तरह की बातें आती रहें, क्योंकि वो किसी की अभिव्यक्ति है? क्या वृहद् साहित्य में ऐसी फ़ॉर्मूला रचनाओं की जगह है, अगर हाँ तो कहाँ और क्या?

आप और विस्तार चाहें तो हर पात्र पर आपके विचार होने चाहिए। आप अगर खुद लिखते तो उसे क्या बनाते, ये भी बताइए। ये वैसे ऑप्शनल है। जैसे कि कई बार उपन्यास या कहानी खुले अंत के साथ लिखी जाती है ताकि आप सोच सकें कि पात्र कहाँ जाएँगे कथानक को लेकर। उनका कोई अंत नहीं होता। ऐसी परिस्थिति में आपको क्या अंत सही लगता है, और क्यों ये लिखना भी ज़रूरी है।

एक बात ध्यान में रखें कि कहानी का कोई भी शब्द बेकार न हो। ये पाठकों को ठगना है। बेहतर लेखक ने अगर कहानी में ये कहा है कि उसके घर की रसोई में से बराबर गैस के लीक करने की बदबू आती थी, तो इस वाक्य का एक उद्देश्य होना चाहिए। आगे कहानी में या तो घर में आग लगेगी, या किसी को उस दुर्गंध से तकलीफ़ होगी, या कोई ज़रूरी बात उस गंध से छुप जाएगी। बेकार में शब्दों को जाया करना एक औसत लेखन का उदाहरण है। कहानी कसी हुई होनी चाहिए, भले ही वो चार सौ पन्नों की हो। उन शब्दों का प्रयोग, जिससे कथानक के किसी हिस्से पर असर न होता हो, करने से बचना चाहिए।

लम्बी कहानी या लघु कथा में भी कमोबेश यही तरीक़ा अपना सकते हैं। लघुकथाओं की समीक्षा भी कई बार मूल कहानी से कई गुणा लम्बी हो सकती है। ये इस पर निर्भर करता है कि आपकी साहित्यिक समझ कितनी है। वहाँ से आप कितनी चीज़ों को जोड़ सकते हैं, अपनी जिंदगी या समाज से कैसे संबंध बनाकर देखते हैं। कहानी में भी वही सारी बातें लागू होती हैं, और इन सारे सवालों के उत्तर में क्या आता है इसी पर समीक्षा होनी चाहिए।

कहानी संग्रह की समीक्षा में आपको थोड़ा अलग तरीक़ा लगाना होगा। इसमें हर कहानी की समीक्षा अलग-अलग कर सकते हैं, अगर समय और जगह हो। या आप इन कहानियों की पारस्परिक तुलना कर सकते हैं। लेकिन तुलना तभी होनी चाहिए जब कहानियों ता मूल भाव समान हो, मिलते-जुलते कथानक हों। क्या किसी एक कहानी में पात्र बेहतर गढ़ा गया है? क्या किसी पात्र का कोई हिस्सा आपको दूसरी कहानी में दिखता है? क्या कहानीकार ने हर कहानी को उसी गम्भीरता से लिखा है, या फिर कहीं आपको लगता है कि ध्यान नहीं दिया गया? इन सब बातों को ध्यान में रखकर संग्रह की समीक्षा कीजिए।

व्यंग्य, कटाक्ष और हास्य आदि के संग्रह की समीक्षा में आप हमेशा ये देखें कि उसका उद्देश्य जो है वो पूर्ण हो रहा है कि नहीं। क्या फूहड़पन के लिए लिखने वाले ने लोकप्रिय बातें कर दी हैं या उसका उद्देश्य समाज की विकृतियों को, कुरीतियों को, राजनैतिक विसंगतियों को सामने लाने की है? क्या व्यंग्य फूहड़ और लक्ष्यहीन है या फिर उसकी सतही वाक्यों का गूढ़ मतलब भी है? कई बार व्यंग्य को हास्य समझकर लोग हँसकर भूल जाते हैं कि व्यंग्यकार का उद्देश्य हँसाना नहीं, थप्पड़ मारना था। क्या हास्य-व्यंग्य-कटाक्ष संग्रह में कही गई बातों का सामाजिक सरोकार है जिसके ज़रिए समाज पर ताना मारा जा रहा है? अगर हाँ, (या नहीं) तो क्या वो सफल है? व्यंग्य करने वाले ने जो बातें की हैं वो हमारे जीवन की तो हैं लेकिन क्या वो महज़ एक ऑब्जर्वेश्न है, या फिर उसकी उपयोगिता है कि समाज सीखकर सुधार करे?

लेखों की समीक्षा उनके सही और गलत होने को लेकर होती है। क्या लेखक ने किसी गलत मंशा से तो नहीं लिखा? उसमें क्या वो जानबूझकर कोई बात ज्यादा बार कर रहा है, और कोई दूसरी बात छुपा ले रहा है? ऐसी बातें आपको फेसबुक पर लिखे पोस्ट और लोगों के लम्बें आलेखों में दिख जाएगा कि वो किसी एक विचारधारा को हमेशा सही, किसी दूसरे को गलत मानकर चलते हैं। लोग मन के मुताबिक़ एक ही बात को एक जगह सही और दूसरी जगह गलत बताते रहते हैं। अगर आप उनकी समीक्षा कर रहे हैं तो आपको पता होना चाहिए कि उन्होंने कब क्या कहा था। हवाहवाई मत कहिए कि यहाँ वो कहा था, वहाँ वो कहा था। तथ्य लाइए और बताइए कि क्या सही है, क्या गलत।

कविताओं की बात करें तो मेरे लिए सबसे ज़रूरी बात है कि क्या भाव के बहाव में अनवरतता है? कहीं वो जाते-जाते रुक तो नहीं रहा? भाव कविता का मूल है, शब्द विन्यास अलग बात है। कई बार कविताएँ भाव से अलग शब्द और वाक्य विन्यास दिखाने हेतु होती हैं, कई बार अलंकार आदि के प्रयोग हेतु। ऐसी कविताओं को उसी आधार पर देखा जाना चाहिए। आजकल कविताएँ अंतर्भाव और समसामयिक मुद्दों पर लिखी जाती हैं। क्या वो आप तक पहुँच रही हैं? अगर हाँ तो कौन सी बात अच्छी है कवि की? क्या वो आपकी संवेदनाओं तक पहुँच रही हैं? क्या जिस मुद्दे को उठाया गया है वो आप समझ पा रहे हैं, अगर नहीं तो कवि से कहाँ चूक हुई है, ये बताइए।

अंततः, किसी भी रचना को बकवास कहकर ख़ारिज करना गलत है। उतना ही गलत है एक शब्द में बेहतरीन कहकर छोड़ देना। हो सकता है कि आपने चंद हिस्से पढ़े और वो आपको घटिया लगे, तो अपनी बात उतनी ही तक रखें। पूरी किताब पढ़ने के बाद दो लाइन में प्रतिक्रिया देना गलत है। कम से कम उसे समीक्षा तो न कहें। समीक्षा करें तो उसमें आपकी हर सहमति और असहमति के पीछे तर्क होने चाहिए। आप ये कहकर भाग नहीं सकते कि ये बुरा है, ये अच्छा है। उसमें क्यों और कैसे की बात भी करें।

नहीं करेंगे तो आपकी प्रतिक्रिया से किसी का फ़ायदा नहीं। मैं ऐसी आलोचनाओं को पढ़ने की भी ज़हमत नहीं उठाता। खोखली प्रतिक्रिया मत दीजिए। मेरी किताब घटिया है तो सारे मापदंडों की बात करते हुए आप अपनी क़ाबिलियत दिखाइए और बताइए कि आपकी समझ है साहित्य को लेकर। जब किताब की समीक्षा करें, और वो साहित्यिक हो, तो बाज़ार की अहमियत की बातें सबसे अंत में रखें क्योंकि ये जंग हमेशा से रही है कि ‘आर्ट फ़ॉर आर्ट्स सेक’ हो या फिर वो लोक-समाज को ध्यान में रखकर लिखी जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *