मानव और कहानियों की कहानी

सत्तर हजार साल पहले जब पहले मानवों ने ‘हंटर-गैदेरर’ (शिकारी-संग्रहकर्ता) के रूप में खुद को स्थापित किया था और गॉसिप की कला सीखी थी, तब से हमारा इतिहास शुरू होता है। मानव तो पहले से थे पर इतिहास तब से शुरू होता है जब हमें आस-पास का ज्ञान होना शुरू हुआ और हम चीजों (फल, नदी, जानवर, आग आदि) के बारे में जानकारी रखने लगे।

सत्तर हजार साल पहले के मानव और आज के मानवों में शारीरिक और बायोलॉजिकली कोई अंतर नहीं है। कुछ प्रवृत्तियाँ आज भी नहीं बदली हैं उनमें से एक है ‘इनटॉलोरेंस’ या ‘बर्दाश्त ना कर पाना’। दूसरा है गॉसिप। गॉसिप करना सत्तर हजार साल पहले झुंडों में रहने वाले मानवों के लिए एक दूसरे को जानने का ज़रिया था। और आग के बाद अगर कोई सबसे बड़ी उपलब्धि है तो वो थी दूसरे से तीसरे के बारे में जानना।

आजकल गड़बड़ी हो गई है। आजकल गॉसिप का मतलब जानना कम और फैलाना ज्यादा हो गया है। दूसरी बात ये हो गई है कि हम खुद कुछ भी करें लेकिन दूसरा वही काम कर रहा है तो हम एक नैतिक पोजिशन लेकर बैठ जाते हैं कि भई स्मृति ईरानी तो ज्योतिषी के पास गई। सुजान और मेहर में अर्जुन रामपाल फूट डाल रहे हैं।

कई बार लगता है कि खूब गाली दें। फिर सोचता हूँ कि क्या करना है, काम से काम रखो। इंटॉलोरेंट तो मानव जाति ही है, सो हम भी हैं। कैसा लगेगा जब मैं कहूँगा कि मानवों को रातों-रात उसके ‘कहानी और कल्पना’ की शक्ति ने धरती का बादशाह बना दिया और इसी कल्पना के कारण तुम्हारा धर्म है, जाति है, मानवाधिकार हैं, फ़ेमिनिज़्म है, देश हैं, जहाँ काम करते हो वो कंपनी है?

कैसा लगेगा जब मैं ये कहूँगा कि ये सारी बातें तुम्हें और करोड़ों लोगों को एक साथ रखकर काम कराने के लिए कही गई एक कपोल-कल्पित कहानी है? क्योंकि मानव सोच सकता है उस चीज के बारे में जो है ही नहीं। तीस हजार साल पहले की बनाई एक मूर्ति मिलती है गुफ़ा में जिसमें सर शेर का है और शरीर मानव का और वो दो पैरों पर खड़ा है। ये बात सिर्फ मानव ही सोच सकते थे इसीलिए बंदरों का देश नहीं है, शेरों का फ़ेमिनिज़्म नहीं है और कुत्ते कंपनियों में काम नहीं करते। जरा सोचो कि देश क्या होता है। परिभाषा नहीं चाहिए, देश होता क्या है? किसने डिसाईड किया कि ये हैं मानवाधिकार? जो लोग तेहत्तर जवानों को घेरकर मार देते हैं उनके लिए मानवाधिकार क्या हैं?

सबके लिए कहानी रची गई, कही गई और इतनी बार कही गई कि विश्वास होता गया। ये देश है, इसकी ये कहानी है। हम्मूरावी ने समझा दिया की अगर तुमने किसी की बेटी को मार डाला तो वो तुम्हारी बेटी को मारेगा, यही न्याय है और ये उसे ईश्वर ने दिया है। पूरा बेबीलोनिया मानता रहा। हमने कहा कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से हैं, शूद्र पैर से और ये कहानी तीन हजार साल से चलते चलते चार जातियों से तीन हजार जातियाँ बना गईं। अमेरिका ने सुनाया कि काले लोग हैम के बेटे हैं जिन्हें बाईबिल में ग़ुलाम संतान बनने को कहा है सो उन्हें ख़रीदते रहो। और बाईबिल खुद लिखकर हमने बीच में भगवान को क्रेडिट दे दिया। फिर अंग्रेज़ बायोलॉजिस्टों ने पेपर निकाला कि काले लोग सच में मूर्ख, गंदे और नालायक होते हैं। इन कहानियों को समाज ख़रीदता रहा। कहानी लिखने वाले सब मर गए और काला-गोरा आज तक चल रहा है।

बात ये है कि सत्तर हजार साल गुज़र गए लेकिन आईपैड बनाकर भी हम वहीं हैं जहाँ थे। कहानी कह रहे हैं कि संस्कृत पढाईए तो ये हो जाएगा, इस्लाम के रास्ते में आने वालों को मार डालो तो बहत्तर हूरें मिलेंगी आदि आदि। आदमी वही है, कहानियों का बदलाव हर स्तर पर हो रहा है। छोटे स्तर के लिए छोटी कहानी, बड़े स्तर के लिए बड़ी कहानी। फेसबुक पर आप ‘पाँच बातें जो कहती हैं कि नॉर्थ इस्टर्न लड़कियों को ज़रूर डेट करना चाहिए’ पढ़कर ख़ुश हो लेते हैं जबकि पता नहीं लिखने वाला जिंदगी भर सिंगल रहा हो। पता करने की कोशिश भी नहीं करते।

आदमी के जीवन का उद्देश्य कुछ नहीं होता। गधों के जीवन का कोई उद्देश्य नहीं होता। दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं है सिवाय इसके कि हम कहानी बना सकते हैं। ये बाहर के देश घूमने जाना, स्काय डाईविंग आदि एडवेंचर नहीं हैं। ये आपकी रोमेंटिक इमेजिनेशन है, ये कहानी आपको किसी ने कही है कि दूसरे कल्चर के लोगों को जानना चाहिए। जब कोई काम नहीं बचा तो चलो ये भी कर लें। रस्सी पाँव में बाँधकर कूदने का अनुभव लेना चाहिए। पर क्यों? सारी दुनिया घूम ली उससे क्या हो गया? पैराशूट लगाकर कूद लिए तो क्या हो गया! थ्रिल क्या होता है खुद से पूछिए? हर कल्चर को जान लिया तो क्या? मैं नहीं जानता तो क्या? क्या सारी चीज अंततः एक पन्ने पर टिक करने के लिए है कि ये कर लिया, ये भी कर लिया?

अगर बचपन से तुम्हें कहीं छोड़ दें और ये कहानी सुनाएँ कि देश से बाहर जाना धर्म के ख़िलाफ़ है तो तुम्हारा सारा ज्ञान धरा रह जाएगा। जरा सोचो कि ऑब्जेक्टिव रियालिटी क्या है? जरा सोचो कि तुम कोई किताब ना पढ़ते, स्कूल ना जाते तो क्या करते? भूख लगती तो खाना खोजते और खा लेते। सोचते शायद कि क्या करें। सो जाते, शिकार करते और खा लेते। ये कहानी नहीं कहता कोई कि थाईलैंड के खानपान का लुत्फ़ लिया जाय क्योंकि थाईलैंड तो है ही नहीं। और है भी तो क्या हो जाएगा खा करके? एक और टिक लग जाएगा, यही ना?

मानवाधिकार क्या हैं, नारीवाद क्या है, पुरूष का पौरूष क्या है? क्या मेरी बहन का स्नेहवश मेरे कपड़े आयरन कर देना मुझे सेक्सिस्ट बनाता है! क्या मेरी माँ का घर का सारा काम करना और मेरा उस बात को स्वीकारना मुझे सेक्सिस्ट बनाता है? अगर हाँ तो कैसे? अगर नहीं तो कैसे?

ज्यादा कहानी सुनने से आदमी ज्यादा सोचने लगता है। फिर उसे लगता है कि इस विषय पर भी विचार देना चाहिए। फिर वो सोचता है कि पिकासो की पेंटिंग उसे समझ में क्यों नहीं आती। फिर वो सोचता है कि खजुराहो की मूर्तियाँ एक विद्रूपित और रिप्रेशन के शिकार समाज की वीभत्स कला का नमूना है। फिर वो सोचता है कि नंगे रहने में क्या बुराई है। फिर वो सोचता है कि सड़कों पर चूमने में क्या दिक्कत है।

ये सारी बातें जायज़ या नाजायज़ क़रार दी जा सकती हैं। ज़रूरत है सटीक कहानी की। ज़रूरत है एक कहानी कि जिसे सब मानते हों। वेद से एक श्लोक उठाकर सुना दो कि कहा गया है एक मानव शांति का प्रतीक बनकर आएगा, और क़ुरान में ये कहा है कि वेद में जो लिखा है वो सच होगा। फिर बुद्ध को इस्लाम का पैग़म्बर बना दो। दशावतार की कहानी सुना सुना कर थक गए लेकिन बुद्ध को विष्णु का अवतार बना दो। प्रवचनों में सिर्फ ये कह दो कि उपनिषदों में ये लिखा है और लोग मान लेंगे क्योंकि लोग मान लेते हैं।

सोच लो कि मैं नकारा हूँ, या मेरे छत पर रहने वाला पड़ोसी जो अपनी बीबी को रोज पीटता है। वो भी ख़ुश है, बीबी भी ख़ुश है। ख़ुश नहीं होती तो भाग जाती, केस कर देती या मार डालती। उसे ना तो मानवाधिकार का पता है, ना ही सत्तर के दशक का ‘मेल शॉविनिस्ट पिग’ वाला आंदोलन। इसीलिए उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता। उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता तो मुझे भी फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन फिर तुम मुझे कायर, ग़ैरज़िम्मेदार आदि कहोगे। और जवाब में जो मैं कहूँ कि मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता तो फिर क्या कर लोगे? मेरे बारे में एक सोच बना लोगे कि मैं ‘वैसा आदमी’ हूँ। उससे क्या हो जाएगा! तुम्हारी मेरे बारे में सोच बना लेने से या ना बनाने से समाज में क्या बदलाव आ जाएगा? या समाज में बदलाव आए, ये क्यों ज़रूरी है?

ये सब सोच के बताओ। या मत ही बताओ। किसी बात से कुछ नहीं होता। ये कोई फिलॉसफी नहीं है। ये परम सत्य है। बुद्ध को निर्वाण मिल जाता अगर वो समझ लेते कि किसी बात से कुछ नहीं होता। सारी बात कहानियों की है। है तो कहानी लेकिन पढ़ लिया है, सुन लिया है, गाँठ बाँध ली है। अब तो उस हिसाब से काम करना पड़ेगा। ख़ालीपन, नहीं जानना, नहीं जानने की इच्छा रखना भी हमें मनुष्य ही बनाती है। कितना भी कोई कह ले कि तुम्हारा कोई विचार नहीं है, तुम दीपिका के क्लीवेज वाले आर्टिकल पर कोई राय नहीं रखते, तुम जर्क हो, चीप हो, विद्वान हो, इससे मेरे शरीर में ना तो एक किडनी अलग से लगना है, ना कान कट के गिर जाना है। मोरालिटी, विचार, सदाचार, दुराचार सब क्लिष्ट कहानियाँ है जो हमने सुना है और बच्चों को सुनाएँगे।

बदनाम आदमी भी मस्त जिंदगी जीता है। जिस दिन वो समझ गया कि उसे बदनाम कहना या करना समाज के हाथ में है और वो इसका कुछ नहीं कर सकता, तो उसकी जिंदगी आसान हो जाएगी। जीने के लिए पेट को अन्न चाहिए, पानी चाहिए, हवा चाहिए। इसमें हमारे पूर्वजों ने कहानियाँ जोड़ दी। लेकिन ये नहीं बताया कि रोटी कपड़ा और मकान के साथ कहानी भी ज़रूरी है। बता देते तो भाँडा फूट जाता और हम आराम से पचास-सौ की टोलियों में रहते, दिन में तीन घंटे काम (शिकार) करते और आराम से रहते। आईफ़ोन, फेसबुक, वॉशिंग मशीन और इमेल होने से जिंदगी आसान नहीं होती, ये एक कहानी है जिसको तुमने रट लिया है।

इन कहानियों को चाहकर भी हम भूल नहीं सकते। इसका हिस्सा बनना ही पड़ेगा क्योंकि सब इसी ‘इमेजिन्ड ऑर्डर’ का हिस्सा हैं। हम इन्हें इतना चाहने लगे हैं कि सच जानने के बावजूद वापस नहीं आ सकते। हमें कहानियों की ज़रूरत होने लगी है। ख़ाली टाईम में आदमी करेगा क्या? कहानी बनाएगा, कहानी सोचेगा और कहानी का हिस्सा बनता रहेगा।

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From: 2014

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