छात्रों के मुद्दे को मेरा समर्थन है, नेताओं को नहीं

कल मैं प्रतापगढ़ फ़ार्म्स में चिल कर रहा था। कोई ख़बर नहीं आई, फोन कभी देखा नहीं। लौटते हुए अपने बॉस के घर गया, वहाँ बारह बजे रात तक रुककर बहुत सारी बातें की। फिर डेढ़ बजे अपने रूम पर पहुँचा, जो कि नॉर्थ कैम्पस के उसी इलाके में है जिसे आईएएस परीक्षाओं का केन्द्र कहा जाता रहा है: मुखर्जीनगर।

सुबह जगा तो किसी ने छात्र राजनीति पर बात की, तो मैंने अपने विचार लिख दिए जो आप में से कइयों ने पढ़े। मैं आज भी यही मानता हूँ कि फ़र्ज़ी लोग ही नेता बनते हैं, और वो भीड़ों को अपने फ़ायदे के लिए हमेशा इस्तेमाल करते हैं। ताजा आंदोलनों में अन्ना आंदोलन की ‘सफलता’ उसका पर्याय है। उसके बाद कुछ छात्र नेता जो डीयू से निकले हैं, जिनका आप नाम भी नहीं जानते होंगे, और कुछ जो जेएनयू से निकले हैं, जिन्हें आप बख़ूबी जानते हैं, लोकप्रिय माने गए क्योंकि मीडिया में उनकी खूब बातें हुईं।

जबकि मैंने कुछ लिखा, और उसके उदाहरणों में से एक कल के कांड (जिसकी पूरी जानकारी बहुत देर बाद खबरें खोजकर पढ़ने से मिली) पर भी थी, कई लोग नाख़ुश हैं। वो उनका अधिकार है, लॉजिकल बात है उनका बुरा मानना। मैं घेरे के उस पार होता तो मैं भी बुरा मानता।

मैंने 2004-7 के दौरान किरोड़ी मल कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य से बीए किया। उस दौरान मैंने छात्र राजनीति को बहुत क़रीब से देखा जिसमें कॉलेज के हॉस्टलों से लेकर पूरे नॉर्थ कैम्पस इलाके के तमाम वयोवृद्ध छात्र नेता ‘भाग’ लेते थे। इस पर मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूँ, डीटेल में नहीं जाऊँगा। मैंने नेहरू विहार में जाटों और बिहारियों की लड़ाई भी देखी है, पुलिस द्वारा प्रतियोगियों को खदेड़कर गलियों में डंडे से मारते भी देखा है, चन्द्रावल में भयंकर तनाव का माहौल भी देखा है, और हर साल यूनिवर्सिटी चुनावों के समय बाड़ा हिन्दूराव हॉस्पिटल में सर और शरीर पर सत्रह टाँके लगवाने उन छात्र नेताओं को भी देखा है जिन्हें विरोधियों ने बैठने को कहा था, और वो नहीं माने।

अगर गाँधी विहार की बात करूँ तो 2004 में तीन कमरे का रेंट 3600 था। 2010 के मार्च में मैं तीन कमरे का किराया 5700 दे रहा था। फिर कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान कॉलेज हॉस्टलों के रेनोवेशन के नाम पर सारे बच्चों को बाहर कर दिया गया। वो वहाँ से गाँधी विहार, नेहरू विहार, मुखर्जी नगर, इन्द्र विहार, ढक्का, परमानंद, इन्द्रा विकास और वज़ीराबाद की तरफ आए। जो एक रूम का कमरा 4000 में मार्च तक था, वो जुलाई में बच्चों की छुट्टियों से वापस आने पर 6000 का हो गया था।

दो रूम वाले फ़्लैट का रेंट, तीन रूम के फ़्लैट का रेंट 50% तक बढ़ा दिया गया क्योंकि सप्लाय और डिमांड की बात थी। हम रूम रेंट अग्रीमेंट बनवाना नहीं चाहते क्योंकि उसमें खर्चा लगता है, और मकान मालिक कभी बनाना नहीं चाहता। वो मकान देने से मना कर देता है। चूँकि सरकार ने दिल्ली से बाहर शिक्षा के साधन नहीं दिए, और दिल्ली में इतने छात्रावास नहीं बनवाए कि कम से कम कॉलेजों के सारे छात्र भी हॉस्टलों में रह लें, तो छात्रों के पास कोई चारा नहीं है।

मतलब, मकान मालिक जो माँगे वो दीजिए, बिजली बिल जो माँगे वो दीजिए, या फिर कहीं और मकान तलाशिए। ये सब करप्शन है। लेकिन करप्ट कौन नहीं है? एक या दो आदमी, जो दिल्ली से वापस बिहार चला जाता है, लेकिन वो ज़्यादा पैसे नहीं देता। बाइक को रोकने पर पॉल्यूशन का काग़ज़ नहीं होने पर सौ रुपए देकर हम कोर्ट जाने से बचना चाहते हैं। ये कन्विनिएन्स है। आपको करप्ट होने का मौका मिलता है तो आप थोड़ी देर के लिए आदर्शों को भूल जाते हैं।

मैं आदर्श आदमी नहीं हूँ। मुझे जब, जहाँ ठीक कमरा मिला, मैंने उतना रेंट दिया। मैंने आजतक किसी आंदोलन में भाग नहीं लिया क्योंकि अनुभवों के आधार पर अभी भी आंदोलनकर्मियों की नीयत में सकारात्मकता दस प्रतिशत से ज़्यादा नहीं देख पाया हूँ। कॉलेज के पास बस स्टैंड बनवाने से लेकर रेंट को व्यवस्थित करने का मुद्दा मेरे आने से पहले भी हर छात्र चुनाव में रहा है, और शायद आगे भी रहेगा।

बात यह नहीं है कि छात्र आंदोलन करे या न करे, बात यह है कि मैंने आजतक एक भी ऐसे छात्र नेता को नहीं देखा जिसकी नीयत पर भरोसा कर सकूँ। चाहे वो कॉलेज वाले रहे हों, या मुखर्जीनगर पुलिस बीट ऑफिस के पीछे के टेंट में आंदोलन खड़ा करने वाले। रेंट की समस्या पर शीला दीक्षित से लेकर, मनीष सिसोदिया तक को लिखा और बोला जा चुका है।

बीच में एक बार रवीश कुमार भी बत्रा आए थे कोचिंग संस्थानों पर कोई कार्यक्रम करने। फिर कई बार कारें फोड़ने से लेकर पीछे वाले हाइवे पर डीटीसी बसें जलाने का भी काम छात्रों ने किया है। ये उनके विरोध का तरीक़ा रहा होगा। मैं सड़क पर नहीं उतरा तो मैं यह वेदना नहीं जानता। न ही, मुझे ये जानने में कोई उत्सुकता है।

चौदह सालों में मकान मालिक भी वही हैं, मैं भी वही हूँ। मकान मालिक मनमाना किराया इसलिए ले रहे हैं क्योंकि एक सिस्टम बना हुआ है। छात्रों की मजबूरी है, और सरकारी तंत्र के पास इसका समाधान नहीं है कि ऐसे कमरों में लोग क्यों रह रहे हैं जहाँ हवा और धूप नहीं पहुँच सकती। मुझे पता नहीं कि यहाँ कितने छात्र रहते हैं, लेकिन एक एस्टिमेट बनाया जाए तो डीयू में एक लाख, और उतने ही और प्रतियोगी परीक्षाओं वाले लोग यहाँ रहते हैं। आप इसे पाँच लाख मान लीजिए। अब जोड़िए कि इतने लोगों के लिए कितने कमरे चाहिए।

अब बात आती है कि मैं इन नेताओं के विरोध में क्यों हूँ? पर्सनल खुन्नस? हो सकता है ये सच हो क्योंकि मैं ऐसे नेताओं में से कुछ की असलियत आप से बेहतर तरीके से जानता हूँ, तो विश्वास नहीं होता। बाकी, अपना अनुभव भी उसी तरफ विचार को मोड़ता है, तो ऐसे लोगों के लिए मेरे पास कोई हमदर्दी नहीं। शायद उन्हें इसकी ज़रूरत भी नहीं है।

मैं ये भी जानता हूँ कि इसी इलाके से सैकड़ों लोग कुछ बनकर निकल चुके हैं, या आस-पास रह रहे हैं। मैं ये भी जानता हूँ कि कई लोग अटेम्प्ट खत्म करने के बाद भी मानसिक तौर पर वापस लौटने या कुछ और करने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते। इसके पीछे खुद को बेहतर आँकने से लेकर, गलत तरीके से तैयारी, या तैयारी के नाम पर कुछ और करना आदि रहता है। साथ ही, ये एक सामान्य सी बात है कि जितनी सीटें है, और जितने बच्चे उस लायक हैं, वही उन मानदंडों पर सफल होंगे, या कहे जाएँगे। ये मानदंड मेरे नहीं हैं।

आपके सामने एक दीवार है, आपने ऐलान कर रखा है कि आप उसे फाँद जाएँगे, और आप उन्हें किसी भी कारण से तय समय या, तय कोशिशों में नहीं फाँद पाते तो आप असफल ही माने जाएँगे। हो सकता है आप सौ मीटर की रेस के लिए बने हों, और वहाँ बेहतर कर सकते हों, लेकिन आपने दीवार फाँदने को लक्ष्य माना। आप वो नहीं कर पाए तो आप अपने ही द्वारा तय लक्ष्य को पाने में असफल माने जाएँगे। ये सफलता या असफलता मैं तय नहीं करूँगा।

साथ ही, बहुत पहले हिन्दी मीडियम के छात्रों के लिए लगातार कम होते रिजल्ट्स के कारण कोचिंग संस्थानों ने ये ख़बर फैलानी शुरु कर दी कि यूपीएससी हिन्दी के साथ अन्याय कर रही है, और उन्हें बढ़ने का मौका नहीं देती। कुकुरमुत्ते की तरफ पनपते हर संस्थान में हिन्दीभाषी क्षेत्रों को लोग भरे पड़े होते हैं। इन्हें तरह-तरह के पैकेज का ऑफ़र देने वाले संस्थानों की नोटिस बोर्ड पर चिपकी हिन्दी की कविता में मैंने वर्तनीदोष सुझाए हैं।

इसी कारण एक फ़र्ज़ी बुनियाद पर सफल आंदोलन किया गया था। उससे बहुत लोग बाहर आए, लेकिन छः प्रयास मिलने के बावजूद वो अपने तय लक्ष्य को पा नहीं सके। इसीलिए, वो अपने तत्कालीन मुख्य लक्ष्य को पाने में असफल ही कहे जाएँगे। वो एक सफल गायक, पेंटर, मज़दूर, स्टॉक ब्रोकर से लेकर तमाम चीज़ों में बेहतरीन और उस विधा के शिखर को चूमने वाले हो सकते हैं, लेकिन पढ़ाई की उस परीक्षा में वो असफल ही माने जाएँगे।

मेरे आस-पास ऐसे बहुत लोग हैं जो यूपीएससी नहीं पास कर पाते, लेकिन क्या मैं उन पर फ़ैसले सुनाता हूँ? नहीं, क्योंकि मेरे पास ये करने का ना तो कोई मोटिवेशन है, न ही वक्त। क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि हमारे समाज के एक हिस्से में जन्मे अधिकतर बच्चे का भविष्य उनके माँ-बाप ही तय कर देते हैं, और वो उसी प्रेशर में आत्महत्या से लेकर, गलत दायरों में घुसकर अपनी प्रतिभा बेकार कर लेते हैं।

नेता बनने में कोई बुराई नहीं है, न ही ये असंवैधानिक कार्य है। फिर हम तमाम नेताओं को क्यों गाली देते हैं? क्या हम उन सारे नेताओं को एक तराज़ू में नहीं तौलते जब मनमोहन की गलती के कारण शीला दीक्षित की सरकार गिर जाती है? कितने लोगों को आप जानते हैं जिनका लक्ष्य राजनीति में जाने का होता है, वो ये कहते हैं कि वो समाजसेवा करना चाहते हैं, और आप उन्हें वास्तव में अपने स्तर पर वैसा ही करता हुआ पाते हैं?

फिर मैं ऐसे आदमी को क्यों समर्थन दे दूँ? आप जो मुझे सवाल पूछ रहे हैं कि मैं कौन होता हूँ ये डिसाइड करने वाला कौन सफल या असफल है, क्या मुझे इतना विवेक नहीं है कि मैं जो देख रहा हूँ, उस पर विचार रखूँ? मैं क्यों कूद जाऊँ इस तथाकथित आंदोलन में, और आपका नेता बन जाऊँ? जबकि आप भी मेरी ही तरह फ़ेसबुक से ही समर्थन दे रहे हैं, और भर्त्सना कर रहे हैं। क्या आपके घर के लोग आपको उस आंदोलन में देखना चाहते हैं?

आप मुझे लाठी खाते देखना चाहते हैं? किसके लिए खा लूँ? आपके लिए? आपके लिए जो ऐसे नेताओं के बारे में सारी बातें जानते है, फिर भी चूँकि उसके मन की बात हो रही है तो मुझसे पूछ रहा है कि क्या मुझे पर्सनल खुन्नस है? या फिर, उनके लिए जो एक भीड़ का हिस्सा हैं? उनके लिए जो अपनी कमियों को तंत्र पर फेंककर जस्टिफाय करते दिखते हैं?

पर्सनल खुन्नस विकसित करने में भी समय लगता है। ये एक दिन में नहीं हो जाता। किसी को लगातार देखने के बाद ही कोई विचार रखता हूँ मैं। असफल आदमी असफल ही रहेगा, आपके भावुक होने से, या आपके मन के मुद्दे उठाकर वो सफल नहीं बन सकता। वो दूसरे क्षेत्र में बेशक सफल हो जाएगा, लेकिन उसका छात्र जीवन जा चुका है, वो वहाँ सफल नहीं हो सकता।

मैं छात्रों के हर मुद्दे को अपना समर्थन देता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ रहकर तैयारी करना कितना कठिन है, और डीलरों-मालिकों की नौटंकी कितनी घटिया है। मुझे मालूम है कि कमरों में हवा नहीं पहुँचती। लेकिन मुझे ये भी मालूम है कि जो आपकी आवाज़ उठा रहा है, वो एक खोखला आदमी है, जिसकी नीयत पर मुझे संदेह है।

आपको भूसे से भरे शेर को नेता मानना है मानिए, मेरा समर्थन आपको हो सकता है, आपके ऐसे नेता को नहीं। फिर तो आप कल को मुझे इस बात पर गाली दे सकते हैं कि लालू की रैली में गरीब और दलित हैं, तो मैं लालू को समर्थन क्यों नहीं दे रहा? आप ये पूछने लगेंगे कि लालू तो ग़रीबों के हक़ की बात कर रहा है, उसके या उसके बेटे के नेता बनने में मुझे क्या दिक्कत है? फिर उस तर्क से आप मुझे यहाँ तक पटक देंगे कि मैं ग़रीबों के विरोध में हूँ और चूँकि कोई उनकी बात करने वाला नहीं है तो लालू ही सही!

फिर आप पूछ देंगे कि जेल जाने की है हिम्मत? लालू हमारे लिए जेल जा रहा है, है कूवत अजीत भारती में? नहीं, अजीत भारती के सामने बहुत सारे काम हैं जो वो करना चाहता है, और अपने स्तर से ही किसी भी लड़ाई को लड़ सकता है। लेकिन, इसका ये क़तई मतलब नहीं है कि वो वैसे लोगों के समर्थन में आ जाए, जिनकी नीयत कुछ और है।

मैं लाठी नहीं खा सकता, न ही वो मेरा काम है। मैं पढ़ने आया था, पढ़ा। उसके बाद मैं कुछ काम कर रहा हूँ। मेरा काम लिखने का है, तो मैं लिखता हूँ। मैं जहाँ से कुछ भी, किसी भी प्रतिशत में कर सकता हूँ, वो मैं करता हूँ। चूँकि कोई हवाई जहाज चला रहा है, और मुझे दिख रहा है कि वो जहाज ठीक से नहीं चल रहा, तो क्या मुझसे ये अधिकार भी ये कहकर छीन लिया जाएगा कि है कूवत जहाज उड़ाने की!

ये क्या कुतर्क है? तुम में है कूवत, तुम्हारे पास समय है, तुम इस बात को लेकर श्योर हो कि तुम्हारे सड़क पर उतरने से कोई मामला सुलझ जाएगा तो तुम बेशक उतरो। मुझे हर मुद्दे के बारे में पता भी है, और लिखता भी हूँ। तुम उतरो, मैं तुम्हारी नीयत पर संदेह नहीं करता, तो मैं तुम्हें अपना समर्थन दूँगा।

जो अपना लक्ष्य पा जाते हैं, वो यहाँ नहीं रुकते। इसे पलटकर भी नहीं देखते। ये आंदोलन हमेशा से ज़ारी है, बस कभी-कभार ऐसे मौक़े आते हैं जहाँ पुलिस ग़ैरज़िम्मेदाराना तौर पर लाठी चार्ज करती है, और भीड़ उसी ग़ैरज़िम्मेदाराना तौर पर सड़क पर खड़ी गाड़ियों के शीशे तोड़ देती है। पुलिस कहती है कि भीड़ उग्र थी, भीड़ कहती है कि मकानमालिकों ने खुद ही शीशे तोड़ दिए।

जब तथाकथित गौरक्षकों द्वारा किसी आदमी की भीड़ हत्या होने पर इस देश के प्रधानमंत्री से सवाल किए जाते हैं, और तमाम बातें लिखी जाती हैं, तो मैं मुखर्जीनगर की भीड़ के उग्र होने पर उसके तथाकथित नेता को कैसे समर्थन दे दूँ, वो भी तब जब जवाबदेही की बात करने में वही आदमी हर दिन ये सवाल उठाता है? उसे मेरा समर्थन कैसे मिल सकता है जो खुद को नेता मानता है, लेकिन अपने समर्थकों को नियंत्रित नहीं कर सकता?

विद्यार्थियों की समस्याएँ हैं, और मैं उनके साथ वैचारिक समर्थन में हूँ, लेकिन मेरे पास डेढ़ दशक में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जिसके आधार पर मैंने कह सकूँ कि इस समस्या का निकट भविष्य में कोई समाधान है। जब हर उस व्यक्ति के पास चिट्ठी जा चुकी है, जहाँ जा सकती थी, तो फिर आप ज़्यादा से ज़्यादा हर रोज चिट्ठी भेज सकते हैं, या संसद आदि के बाहर प्रदर्शन कर सकते हैं।

आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए आप बेशक कूदिए, क्योंकि आपकी लड़ाई आप ही लड़ सकते हैं, मैं नहीं। मेरी अपनी कई लड़ाइयाँ हैं, जो मैं अपने स्तर पर लड़ता हूँ। मुझमें सड़क पर उतरकर नेता बनने के गुण हो सकता है न हों, लेकिन मैं नेताओं की निष्ठा तो जानने की कोशिश कर ही सकता हूँ।

इसलिए, वो जो मुझे कोस रहे हैं कि मैं छात्रों के साथ नहीं हूँ, ये जान लें कि मैं ग़रीबों और वंचितों की बात रोज करूँगा लेकिन आपका झंडा लालू के हाथ में होगा, और आप चाहेंगे कि मैं लालू को समर्थन दे दूँ, तो वो मुझसे नहीं हो पाएगा। छात्र एकता ज़िंदाबाद, लेकिन पिछले कुछ समय से किसी भी छात्र नेता ने खुद को साबित नहीं किया है कि वो क्यों नेता कहे जाने चाहिए, इसलिए, उनके लिए मेरा समर्थन नहीं है।

मैं हमेशा मुद्दों की बात करता रहा हूँ, आगे भी करूँगा, लेकिन जब मैं कुछ बातें जानता हूँ, जिससे कोई आदमी मेरे लिए संदेह के दायरे में आता है तो मेरा समर्थन उसे नहीं है। ये निजी विचार है, यूनिवर्सल ट्रूथ नहीं। आप बेशक उन्हें समर्थन दीजिए क्योंकि आपके पास ऐसा करने के पचास कारण होंगे, मेरे पास एक भी नहीं।

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