अवैध बूचड़खाने, योगी सरकार, इमोशनल ब्लैकमेल और कानून

एक क़ानून है: उत्तर प्रदेश नगर परिषद् कानून 1959। इसमें ये निर्धारित किया गया है कि हर स्थानीय संस्था (नगरपालिका) की ज़िम्मेदारी है कि हर कसाईखाने से निकलने वाला माँस ताजा हो, तथा स्वास्थ्य-संबंधी बातों ख़्याल रखे। इसके दस बिंदुओं में, 421-430, ये बताया गया है कि ये बूचड़खाने कैसे काम करेंगे, जानवर कैसे ख़रीदे जाएँगे और निजी बूचड़खानों को कैसे चलाया जाना चाहिए।

पता चला है कि उत्तर प्रदेश में 140 बूचड़खाने और 50,000 से ज़्यादा माँस बेचने की दुकानें अवैध हैं। अवैध को अंग्रेज़ी में इल्लीगल कहते हैं, जिसका मतलब है कि उसके पास लाइसेंस नहीं है। लाइसेंस नहीं है का मतलब ये है कि वो सरकार को एक भी पैसा टैक्स में नहीं देते हैं। ना ही सरकार के नुमाइंदे ये सुनिश्चित करते हैं कि आपको जो माँस मिल रहा है वो कैसा है, कैसे आया है आदि आदि।

चूँकि ये आज तक चल रहे थे तो लोगों को आज लग रहा है कि ठीक है। लेकिन क्या सच में ठीक है? सरकार को करोड़ों का नुक़सान लगाने वाले, टैक्स चोरी करने वालों के प्रति आपकी हमदर्दी समझ में नहीं आ रही। ये क्या एक पार्टी के प्रति घृणा है या फिर आपको कानून से कोई लेना-देना नहीं? ये आप तय कर लें।

कानून की पढ़ाई में एक वाक्य पढ़ाया जाता है: इग्नरेन्स ऑफ़ लॉ इज़ नो एक्सक्यूज़। अर्थात् कानून की जानकारी ना होना कोई सही बहाना नहीं है। आप ये कह कर बच नहीं सकते कि मुझे तो पता ही नहीं था कि दुकान चलाने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता है। ये ज़िम्मेदारी सरकार की है कि वो आपको नोटिस दे, अगर आपने लाइसेंस नहीं लिया है। और आप जुर्माना भरकर अपना लाइसेंस ले लें। पिछली सरकारों ने ऐसा नहीं किया। क्योंकि ग़ैरक़ानूनी वसूली का राज चल रहा होगा। जब पैसा पार्टी फ़ण्ड में पहुँच रहा हो तो फिर कानून की परवाह कौन करता है।

ख़ैर, अब एक अलग हाय-तौबा मचाई जा रही है। इसमें मीडिया का कुछ हिस्सा बहुत ज़्यादा सक्रिय है। एक जगह ये बात पढ़ी कि सरकार को बूचड़खानों को बंद करने से कई सौ करोड़ों का नुक़सान होगा। ये पता नहीं कि ये आँकड़ा कहाँ से आया, लेकिन एक सामान्य बुद्धि वाला इन्सान ये ज़रूर समझ सकता है कि जो धंधे ग़ैरक़ानूनी हैं, उनसे सरकार को कभी पैसा नहीं मिलता। उनसे सत्तारूढ़ पार्टियों को हफ़्ता ज़रूर मिलता है। यही कारण है कि ये अवैध दुकानें और बूचड़खाने, बिना किसी नियम कानून के चल रहे थे।

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बूचड़खानों से निकलने वाले कचड़े का कोई माईबाप नहीं, वो फेंक दिए जाते हैं (तस्वीर कोलकाता के बूचड़खाने की है)

इन्हें ना तो पर्यावरण की चिंता थी कि वहाँ इस्तेमाल होने वाला पानी कैसा है, जो हड्डियाँ, चमड़ी, रक्त आदि वहाँ से कचड़े में जाता है, उसको सही तरह से कैसे हटाया जाय। इन्होंने इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया क्योंकि ये तो ‘चलता है’। कभी चलता होगा, अब नहीं चल रहा। इलाक़ों से आती बदबू, बीमारी फैलाने वाले कीड़े, सड़कों पर लगातार रिसते रक्त-मज्जे के लाल निशान इन इलाक़ों की पहचान थे। आशा है कि अब नहीं होंगे।

दूसरा तर्क जो कुछ लोगों ने दिया है वो ये है कि सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि जिनका ‘रोज़गार’ छिन गया है वो क्या करेंगे। मेरा मानना है कि सरकारों को सबके लिए रोजगार सुनिश्चित करना चाहिए। लेकिन इन्द्र पहला हक़ उनका बनता है जिनके पास कभी भी कुछ नहीं रहा, ना कि उनका जिन्होंने सरकार को सालों चूना लगाया है। पहले तो इन सबसे बक़ाया टैक्स वसूला जाय और इन्हें कानून के तहत जेल में डाला जाय।

ये तर्क बेहूदा है कि सरकार की ज़िम्मेदारी थी कि दुकानों को बंद करने से जाने वाले रोज़गारों की व्यवस्था करे। ये तो वही तर्क हो गया कि मेरा पचास हज़ार कमाने वाला लड़का बलात्कारी निकला तो सरकार उसे जेल में डालने से पहले मेरा घर चलाने की व्यवस्था कर दे! सरकार ग़ैरक़ानूनी धंधा करने वालों को कोई नौकरी नहीं देती, ना ही ऐसा करने की ज़रूरत है। वो जुर्माना भरें, सज़ा काटें और फिर क़ानूनी प्रक्रिया के तहत नई दुकान खोलें।

तीसरा, मार्मिकता और ब्लैकमेल की पराकाष्ठा वाला, तर्क ये मिला है कि चिड़ियाघरों के जानवरों को माँस नहीं मिल रहा। एक वेबसाइट ने तो ग़ज़ब की कहानी लिखी है कि गर्भवती शेरनी ने मुर्ग़े का माँस खाने से किया इनकार। और ज़ाहिर है कि ये बस एक ही ऐसी कहानी होगी। जब भूख लगती है तो बिरयानी की जगह आदमी सादा चावल भी खाता है। जानवर भी दस-बीस दिन ज़िंदा रह सकते हैं दूसरे माँस पर।

जो भी हो, अगर क़ानूनी रूप से कोई कार्य हो रहा है तो उसमें भावनाओं की बात नहीं होनी चाहिए। ना ही इसमें हिन्दू-मुसलमान करने की बात है। कानून सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए और जब तक सरकारें कानून लागू करने के लिए क़दम उठाती रहेंगी, समाज बेहतर ही होगा।….

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