चुनावी दौर में खेल परसेप्शन मैनुफ़ैक्चरिंग का है

‘चुनाव आ रहे हैं’ उसी तरह का सत्य है जैसा कि छोटे शहरों में नई फ़िल्मों के प्रमोशन में ‘चल रहा है’ का पोस्टर लगाकर रिक्शे पर बैठा अनाउंसर। हर साल पाँच से सात चुनाव होते हैं। पहले संवाद मीडिया की तरफ से एकतरफ़ा होता था तो रैलियों की भाषा, मैनिफेस्टों के वादे आदि अलग हुआ करते थे। पहले जगह कम था तो महत्वपूर्ण बातें छपकर आती थीं, या रेडियो पर बताई जाती थी।

सबकुछ नियंत्रित रूप से चलता था। फिर चौबीस घंटे न्यूज़ के कॉनसेप्ट ने इसे सड़कछाप बना दिया जहाँ जो ज़ोर से बोलेगा वही सच होगा, ऐसा होने लगा। संदर्भ हटाकर बयान दिखाना, बयान के हिस्सों को अपने हिसाब से तोड़कर, उसी व्याख्या करते हुए इस्तीफ़ा और पता नहीं गर्दन तक माँग लेने की बातें होने लगती थीं। इस समय तक भी आम आदमी पगलाया नहीं था। 

इसके बाद के दौर में संवाद पूर्णतः दोतरफ़ा से लेकर चौतरफ़ा और 360° वाला होने लगा। ख़बर न सिर्फ कोई भी देख सकता है, बल्कि दिखा सकता है, बाँट सकता है, बना सकता है और अपने मतलब के अर्थ निकाल सकता है। यहाँ सूचनाओं की ऐसी बमबारी होने लगी कि लोग टाइप किए हुए अक्षरों को सत्य मानकर अपने स्तर से सत्यापन करना ज़रूरी नहीं समझते। इनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जो कि प्रिंटेड का मतलब सत्य मानते हैं क्योंकि अख़बारों और टीवी पर दिखते शब्दों को इन्होंने ऑथेन्टिक माना था।

इस मल्टी-वे कम्यूनिकेशन बॉम्बिंग के दौर में शॉर्पनेल तो सबके दिमाग़ में घुसते हैं। कोई अस्पताल जाता है, दवाई लेता है और डॉक्टर की सलाह मानता है कि जहाँ-तहाँ से ख़बरों का तीर न लिया करे। बाकी लोग खुद ही डॉक्टर बन बैठते हैं कि इतना प्रदूषण तो चलता है। 

राजनीति का दायरा व्यापक होने से पहले ही संकुचित हो गया है। मुद्दों की बात, भले ही समाज उबल रहा है, व्यवस्थाएँ लचड़ हैं, और सरकार नाकाम हो, कोई नहीं करता। विपक्ष भी मुद्दों की बात नहीं करता क्योंकि उसे पता है कि इसका कोई फायदा नहीं, या वो इस दौर में अपनी बात बताने के लिए सक्षम नहीं हैं। 

इसीलिए आपको चोरों की जमात गठबंधन करती दिखती है, और हर चुनाव से पहले हिन्दू-मुसलमान और दलित उत्पीड़न के ख़बरों की बाढ़ आ जाती है। लगता है कि दलितों को सताने के लिए चुनाव आयोग से पहले से ही बात कर ली जाती है कि फ़लाँ तारीख़ को जो चुनाव है, उससे पहले ये सब होगा। बाकी समय दलित, अल्पसंख्यक, दंगाई सब गाँव में घुइयाँ की खेती में व्यस्त रहते हैं। चुनाव आते ही अचानक से कोई किसी को पीट देता है, किसी को मार देता है, कहीं दंगा हो जाता है। 

ये सब पहले भी होता था, आज भी हर दिन होता है लेकिन दिखाया तभी जाता है जब उसकी उपयोगिता हो। इससे किसी के भी ख़िलाफ़ एक नज़रिया बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। शीला दीक्षित को, जो कि इस देश की बेहतरीन मुख्यमंत्रियों में से एक थीं, सत्ता गँवानी पड़ गई क्योंकि देश में एक बलात्कार हुआ था जिसकी रिपोर्टिंग में पूरे देश और दुनिया को हिलाकर रख दिया था। मेरे मित्र धैर्यकांत ने इस कांड पर खूब खोजखबर ली और पाया कि मेडिकल रिपोर्ट से लेकर सज़ा तक पब्लिक ओपिनियन के प्रेशर में दे दी गई। 

एक परसेप्शन ने सरकार गिरा दी। परसेप्शन ये बनाया गया कि इस सरकार में बस बलात्कार ही होते हैं। उसी तरह, 2014 के चुनावों का सारा खेल परसेप्शन बिल्डिंग पर ही हुआ। दस साल की एंटी-इनकम्बेन्सी और कैग के रिपोर्ट ने एक सरकार गिरा दी। क़ायदे से देखा जाय तो न्यायिक व्यवस्था यह कहती है कि जब तक साबित न हो जाए, को भई अपराधी नहीं है। फिर भी, तमाम घोटालों के केस चल रहे हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस देश से ही गायब होती जा रही है। 

बिहार में भाजपा की जीत लगभग तय मानी जा रही थी, या वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती, लेकिन अखलाख की हत्या और आधे पेज के विज्ञापनों ने ऐसी हवा बाँध दी कि लगने लगा देश अचानक से मोदी के राज में असहिष्णु हो गया है और मुसलमानों को घरों से निकाल कर मार दिया जा रहा है। ख़बरें इस टोन में लिखी जाती थीं, और लिखी जाती हैं कि जिसमें डॉक्टर के आगे मुसलमान लगाना ज़रूरी माना जाता है। वही हत्या हिन्दू की हुई हो तो वो बस युवक ही रह जाता है, वो ‘हिन्दू डॉक्टर’ नहीं बन पाता। 

भाजपा ने इस परसेप्शन गेम को लगातार पिछले साल तक भुनाया है। पाँचवे साल में मोदी ने कई सेक्टर में बेहतरीन कार्य किए हैं, और उसके कुछ मंत्री लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन एक के बाद एक घटना को राष्ट्रीय स्तर का बताकर उसकी असफलताओं से जोड़ते जाने के कारण उसकी साख में बट्टा तो ज़रूर लगा है। 

चूँकि उसने वादा किया था तो हर वादा लोगों को पाँच ही साल में पूरा होते दिखना चाहिए। क्योंकि उसने कहा था कि वो चौकीदार है तो लोग अपनी बकरी चोरी होने पर भी उसे ही कोस लेते हैं। और ये कोसना अब स्थानीय स्तर का नहीं होता। इसलिए आप देखते हैं कि हर छोटे मसले को इतना तूल दिया जाता है कि सरकार को भंग करने की बात तक कर दी जाती है। 

ताजा मसला लिया जाए कि कथुआ और उन्नाव में बलात्कार हुए हैं। मीडिया में ये खूब घुमाया गया। प्रशासन ने दोनों मामलों में एफआईआर दर्ज कर लिया है, एक मामले में चूँकि एक विधायक पर आरोप है तो सीबीआई और एसआईटी तक की बात हो गई है। लेकिन लोग चुप नहीं हैं। लोगों को इस पर मोदी का बयान चाहिए। आप उनसे पूछ दीजिए कि बयान देने से क्या होगा? क्या बयान के बाद आप ये नहीं कहेंगे कि बस बयानबाज़ी करवा लो इससे, काम तो होता नहीं है! 

राजनाथ सिंह पर ‘कड़ी निंदा’ के चुटकुले बनाते वक्त हम ये गिनना भूल जाते हैं कि पिछले सालों में आतंकी हमलों से कितनी कम (2017 में शून्य) सिविलियन मौतें हुई हैं। हम ये भूल जाते हैं कि कश्मीर में हर दिन कितने आतंकी मारे जा रहे हैं। हम ये भूल जाते हैं कि नक्सलियों से पटे ज़िलों की संख्या 200 से घटकर पचास के क़रीब आ गई है। 

लेकिन मीडिया में किसी वारदात के बाद किसी भी राजनेता के बयान पर हमारे लिए ये कहना आसान होता है कि ये तो बस यही करेगा। मीडिया आँकड़े दिखाना पसंद नहीं करती क्योंकि उसको सिर्फ सेन्सेशन पर ही चलते रहना है। वहीं से उसका खाद-पानी आता है। वो पैसे लेकर, सत्ता के पक्ष और विपक्ष के लिए, प्रोग्राम बनाती है। उसके कार्टून ओर हेडलाइनों के विश्लेषण से आपको पता चल जाएगा कि यहाँ पत्रकारिता छोड़कर बाकी सारी बातें हो रही हैं। 

वैसे, परसेप्शन बनाने और उसको सस्टेन करने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा सोशल मीडिया है। यहाँ पर समर्थकों और विरोधियों के गुट हैं। यहाँ दोनों ही अपने मतलब की ख़बरें तलाशते रहते हैं, और मौक़ा मिलते ही एक दूसरे की ‘कह के ले लेते हैं’। ख़बरें हर रोज आती हैं, और ख़बरों से अपने मतलब के वाक्य तलाशना इंटरनेट और सर्च इंजन के समय में कोई कठिन कार्य नहीं है। 

लोगों के पास पढ़ने और सत्यापन का समय नहीं होता इसलिए वो हेडलाइन पढ़कर ही नज़रिया बना लेते हैं। क्लासिक उदाहरण है कि चुनाव आयोग ने कर्नाटक चुनावों के तारीख़ की घोषणा जब तक की, उससे पहले ही भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों के आईटी सेल वालों ने ये ख़बर शेयर कर दी। फिर क्या था, राहुल गाँधी से लेकर मीडिया के तमाम लोग और फेसबुकिया बुद्धिजीवी वर्ग पिल पड़े कि चुनाव आयोग भी नागपुर से चलती है आदि। 

कॉन्ग्रेस वाले भाजपा को घेरते वक्त भूल गए कि उसी समय उनके आईटी सेल से भी ट्वीट हुआ। साथ ही, हर आदमी ये भूल गया कि जो ट्वीट आए वो आधे ही सही थे, तथा ट्वीट करने वालों ने एक न्यूज़ चैनल की ख़बर से तारीख़ें ली थीं। लेकिन परसेप्शन बनाया गया कि मोदी तानाशाह है और उसने भाजपा के लोगों को हर जगह बिठा दिया है जिससे ‘संवैधानिक’ संस्थाओं का कोई औचित्य नहीं बचा। 

ऐसे ही हर अपराध पर सरकारों का इस्तीफ़ा माँगा जाता है मानो दूसरी सरकार आएगी तो अपराध ख़त्म हो जाएँगे। दंगे हुए तो सरकार इस्तीफ़ा दे, बलात्कार हुए तो इस्तीफ़ा दे। मतलब जो अपराध मिनट में पाँच होते हैं, और पूर्णतः सामाजिक हैं, उसके लिए सरकारों को भंग करने की बात उठती है। कहा जाता है कि ये सरकार स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों की बात नहीं करती, निकम्मी है, प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं। 

हम सोचने लगते हैं कि सही बात है, आठ साल की बच्ची का बलात्कार हुआ, पीएम चुप क्यों हैं। हमें ये न तो पता होता है, न ही हम पता करना चाहते हैं कि देश में रिपोर्टेड रेप का आँकड़ा क्या है। क्या पीएम हर रेप पर संवेदना व्यक्त करे, और बयान दे कि वो स्त्री सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं? क्या दिल्ली में पिछले पाँच सालों में रेप के मामलों में 277%  की वृद्धि के लिए केजरीवाल या दिल्ली पुलिस ज़िम्मेदार है? या फिर ये समाज जहाँ ऐसे लोग रहते हैं? 

आप जब किसी घटना को कुछ समय बाद देखते हैं, तो आप पाएँगे कि उसकी तुलना में कई वीभत्स घटनाएँ हुईँ जिनके बारे में किसी को पता तक नहीं चला। बलात्कार के बाद जलाकर मार देना क्या जघन्य नहीं है? लेकिन क्या आप कह सकते हैं कि आपने लोहरदगा के लड़की की वो ख़बर पढ़ी पिछले दिनों? क्या सरकारों द्वारा संचालित एजेंसियाँ और उनके लोग इस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं कि इन मामलों में भी पीएम के स्तर से जवाब आए? फिर तो थाने और विभागों को हटा दीजिए, और सारे जवाब मोदी से ही माँगिए! 

इस सोच को कि अचानक से देश बर्बाद हो गया है, बिना किसी तरह के डेटा या शोध को पढ़े, सही मान लेना बताता है कि ये परसेप्शन आप तक कैसे पहुँच चुका है। ठहरकर सोचिए कि सरकार वाक़ई कहाँ-कहाँ फिसली है, कौन से क्षेत्र हैं जहाँ पर जितनी बेहतरी की गुंजाइश हैं उतनी हुई नहीं, बजट किस क्षेत्र में ज़्यादा है, कहाँ कम है। देश चलता कैसे है, क्या हम और आप दाग़ी नेताओं को नहीं चुनते? क्या आपके गाँव का मुखिया और वार्ड कमिश्नर भ्रष्ट नहीं है? 

फिर आप आदर्श स्थिति क्यों माँगते हैं? विकास की अपनी गति होती है, वो होता रहेगा। ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सएप्प के दौर का एक सच यह भी है कि चुनाव को मैनिपुलेट करने का माद्दा इन तीन एप्स में है। यहाँ जिस तरह की बातें बनाई और बढ़ाई जाती हैं, वो आम जनमानस को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं। उनके लिए ये सही लगने लगता है कि यार मोदी को आधा मिनट तो लगेगा ये कहने में कि ये गलत हुआ। लेकिन वो ये नहीं जोड़कर देखेगा कि मिनट में कितने बलात्कार होते हैं, और क्या इस पर बोलना ही सरकार चलाना माना जाएगा या फिर पुलिस को अपना काम करने देना? 

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