गौण मुद्दों के दौर में आपातकाल का हर रोज आना दोगलई का चरम है

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नमस्कार,

मैं चैनल से निकाला हुआ पत्रकार

आपलोगों ने तो टीवी देखा ही होगा, डिबेट देखी होगी, ट्वीट पढ़े होंगे, एनालिसिस सुनी होंगी… मैं ये सब नहीं करता। क्योंकि मुझे टीवी के सुप्रसिद्ध अभिनेता रवीश कुमार जी ने टीवी देखने से मना किया हुआ है। उन्होंने जबसे बोलना शुरु किया था ‘टीवी कम देखा कीजिए’, मैं तब से टीवी देखना छोड़ चुका हूँ। 

आज की बासी ख़बर यह है कि दो पत्रकारों ने एक चैनल से ‘इस्तीफा’ दे दिया है। उन्होंने खुद भी इस बात का खंडन नहीं किया है, न ही चैनल ने ये कहा कि उन्हें ‘निकाला’ गया है। निकाले जाने की ख़बर चैनल और पत्रकारों को छोड़कर सारे लोगों को है। ये ख़बर कहाँ से आई, किधर-किधर गई पता नहीं, लेकिन देश में गैस से जूझते इन्सान के डकार और पाद से भी ज़्यादा फ्रीक्वेंट हो चुका आपातकाल एक बार फिर आ गया है। 

मैं तो अस्सी के उत्तरार्ध में पैदा हुआ हूँ, तो आपातकाल के बारे में कुछ नहीं जानता लेकिन ये पके हुए बालों वाले पत्रकार, जिनके सर से लेकर अंगूठे और बीच की हर जगह के बाल सफ़ेद होकर झड़ने लगे हैं, उन्हें भी किसी पत्रकार का इस्तीफा देना आपातकाल लगता है तो मुझे लगता है कि इंडियन एक्सप्रेस वालों ने बेकार ही पन्ना काला करके छाप दिया था, और भाजपा जैसी पार्टियाँ बेकार ही इमरजेन्सी की बरसी मनाती है। इतने छात्र नेता लालू से लेकर नितीश समेत जो उसी इमरजेन्सी की पैदाइश हैं, वो सब क्या किसी पत्रकार के इस्तीफा देने या अख़बार द्वारा निकाल दिए जाने पर इंदिरा गाँधी को कोसते रहे? 

भारतीय मीडिया और तथाकिथित इंटेलिजेन्सिया की हालत बहुत खराब है, इनके दिमाग में इतना टार भर चुका है कि ये बीमार, बहुत बीमार हो चुके हैं। इनकी हालत प्रोमिथियस या सिसिफस की तरह हो गई है। इन्हें हर दिन मोदी और भाजपा को राज करते देख कष्ट होता है, और रात को ये अपने प्रोग्राम में उसे कोस कर सो लेते हैं। अगले दिन फिर वही असहनीय पीड़ा… ये क्रम चलता रहता है। 

भास्कर से एक बार में कई सौ पत्रकार निकाल दिए गए, न्यूज18 ने भी खूब छँटनी की, एनडीटीवी हर साल करोड़ों के घाटे में चल रहा है, और पिछले साल दसियों लोगों को निकाल चुका है। ऐसे ही उसके कुछ एंकर भी बाहर किए गए थे। तो क्या सब में मोदी का हाथ है? तब न तो रोजगार की बात हुई, न इस पर कि लगातार बाहर हो रहे पत्रकार नहीं रहेंगे तो खबरें कौन लाएगा? 

तब किसी को याद नहीं आया कि स्ट्रिंगर, अव्यवस्थित पत्रकारिता के चलन और कम सैलरी पर काम करने वाले ज़मीनी खबरें कहाँ से लाएँगे। तब ये याद नहीं रहा कि सरकार की नीतियों की आलोचना स्टूडियो से नहीं गाँवों की ख़बरों से ही हो सकती है जहाँ के लिए अधिकांश योजनाएँ बनती हैं। तब ये बवाल क्यों नहीं हुआ कि गिरती अर्थव्यवस्था के कारण मीडिया संस्थानों से लगातार पत्रकार निकाले जा रहे हैं। मेरे ही जितने अनुभव वाले हिन्दी पत्रकारों की सैलरी हर संस्थान में मेरी एक तिहाई क्यों है? वर्नाकुलर पत्रकार कहाँ से पत्रकारिता के स्तम्भ को सींचते रहेंगे जब उनके लिए बचत का मतलब किसी तरह तीन बार भोजन कर पाना होता है?

आज राजदीप से लेकर आशुतोष, और सगारिका से लेकर शेखर गुप्ता तक ऐसे बिलबिला रहे हैं जैसे मोदी ने पुण्य प्रसून जैसे लीचड़ पत्रकार को फोन करके, स्पीकर ऑन करने को कहा, और सबकी मौजूदगी में ये कहा कि ‘हमारी योजनाओं की आलोचना करोगे तो मालिक से कहकर निकलवा दूँगा’। 

ये पुण्य प्रसून जैसे लोग खुद को पत्रकार तो न ही कहें। इन सबकी प्रतिबद्धता अपने व्यवसाय को लेकर उतनी ही है, जितनी नेताओं की देश के लिए होती है। कहने में अच्छा लगता है कि देश सर्वोपरि है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में ये कह देते हैं कि प्रमोशन में भी रिज़र्वेशन होना चाहिए। कहने में अच्छा लगता है कि संविधान में सब बराबर हैं लेकिन अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलट कर एससी एसटी एक्ट के तहत सवर्णों को बिना जाँच जेल भिजवाने का कानून बना दिया जाता है। 

वैसे ही, कहने में अच्छा लगता है कि पत्रकार सरकारों की आलोचना करते हैं, लेकिन सच सबको पता है कि ये लोग हिट जॉब करते हैं और स्टूडियो से किसी एक पार्टी के ख़िलाफ़ या किसी पार्टी के लिए कैम्पेनिंग करते हैं। पुण्य प्रसून जैसे लोगों के चेहरे पर घाघ लिखा हुआ है जो क्रांतिकारी होने की परिभाषा बदल देता है। किसी फ़र्ज़ी औरत के नाम से सरकार के बारे में गलत ख़बर चला देता है, और कहता है कि उसने ज़मीनी हक़ीक़त दिखाई है। 

मैं क्या नया कह दूँ इस मीडिया के बारे में? किसे यह बात नहीं मालूम कि मीडिया भी देश की तरह दो धड़ों में बँटा हुआ है? ये नौटंकी किस बात पर हो रही है? हम उन पत्रकारों की बात कर रहे हैं जो जनता के द्वारा नकार दिए गए हैं। ये वो पत्रकार हैं जो हर रात एक बार रोते हैं कि उन्हें उनके व्यूअर बताते हैं कि उनके चैनल को ब्लैकआउट किया जा रहा है। दो लोगों के टीवी की तस्वीर लगाकर ये साबित हो जाता है कि सिग्नल ब्लॉक है। जबकि ये पत्रकार चुपके से उस एरिया में किसी भी दिन जाकर रिपोर्टिंग नहीं कर पाए कि पता चले सच में किसी खास एरिया से सिग्नल गायब हो रहा है। एनडीटीवी वाले टाटास्काय को पैसे न दें, और चाहें कि उनका चैनल हर घर में आता रहे, ये तो ज़्यादती है। 

हास्यास्पद बात यह है कि निधि राजदान जैसे लोग, राजदीप जैसे लोग, और बाकी नाम भी जोड़ लीजिए, ये कहते पाए जाते हैं कि सरकार पत्रकारों की बात दबा रही है। जब आप इस बात को कह पाने में सक्षम हैं, इस बात पर शो कर लेते हैं, तो फिर ये बात अपने आप में विरोधाभाषी है। जब मोदी इतना शक्तिशाली है ही, और वो मीडिया को दबा ही रहा है तो सबसे पहले तो ज़्यादा भौंकने वाले कुत्तों के मुँह पर जाली लगा देता, लेकिन कोई भारत में तो कोई वाशिंगटन पोस्ट में तमाम बातें लिख रहा है जो वो लिखना चाहता है। 

साथ ही, सुबह ये बात भी सामने आई, बिल्कुल वैसे ही जैसे बुद्धिजीवियों को ये पता चली कि मोदी ने इस्तीफा दिलवाया है, कि कपिल सिब्बल आने वाले दिनों में एक चैनल लॉन्च करने वाले हैं जिसके लिए उन्हें मोदी विरोधी पत्रकार चाहिए। बड़े पदों पर बैठे पत्रकारों का नोटिस पीरियड भी तीन से छः महीने का होता है। तो हो सकता है कि लोग बेहतर करियर के अवसर देखते हुए चैनल बदल रहे हों। कई पत्रकार अपने ही राइवल चैनल में नौकरी करते दिखते हैं। 

एक घटिया और पिछलग्गू विपक्ष, इस तरह की मीडिया ब्रिगेड के साथ मोदी और भाजपा को घेरने चले हैं, इच्छा रखते हैं कि मोदी की जीत न हो, और मुद्दे क्या हैं इनके पास? मोदी ने पत्रकार को निकलवा दिया; मोदी ने चैनल ब्लैकआउट करवा दिया; मोदी ने अपने भाषण में तीन बार झूठ बोला; मोदी ने ‘अपनी’ विदेश यात्रा पर इतने पैसे ख़र्च किए; मोदी के गले मिलने का क्या फ़ायदा हुआ; स्टॉक मार्केट के ऊपर जाने से क्या होता है; मूडीज़ और वर्ल्ड बैंक की रेटिंग सुधरने से क्या होता है; तीन गाँव में बिजली तो नहीं पहुँची तो सौ प्रतिशत कैसे हो गया…

आप गिनने बैठेंगे तो आपको यही पत्रकार ऐसे वाहियात ख़बरों पर हल्ला करते मिलेंगे जिन्हें सुनकर या पढ़कर आपको कहीं से नहीं लगेगा कि ये देश या समाज को लेकर सीरियस हैं। हम पत्रकारिता के उस दौर में हैं जहाँ हिरोइन के इन्स्टाग्राम के पोस्ट पर खबरें बनती हैं, और उस पर सौ कमेंट्स के बीच दो निगेटिव कमेंट लिखने वालों के ऊपर ‘फलाना एक्ट्रेस शट डाउन द ट्रोल्स विद एपिक रिप्लाय’ को सबसे ज़्यादा लोग पढ़कर उसे ट्रेंड करा देते हैं। 

हम उस दौर में हैं जहाँ एक बलात्कार के बाद सिर्फ बलात्कार की ख़बरों को चलाया जाता है। एक आदमी द्वारा लाश को घर ले जाने में आई दिक्कत पर एक सप्ताह तक उसी तरह की लाश ले जाती मानवता पर रोया जाता है जैसे कि हमें ये पता नहीं कि देश की जनसंख्या और स्वास्थ्य सेवा का क्या हाल है। बालासोर में एक साड़ी को आधा फाड़कर, बिना किसी अंतःवस्त्र के घुटने से ऊपर और छाती ढकने की कोशिश करती महिला पर कोई स्टोरी नहीं होती, क्योंकि उससे आज के ट्रेंडी दौर में ट्रेंड नहीं होगा। 

ऐसा नहीं है कि देश में सबकुछ ठीक है, लेकिन हाँ नेताओं से ज़्यादा गिरे हुए लोग मेरी जमात के हैं, जिन्हें आप पत्रकार कहते हैं। आप क्या बोलें, क्या सोचें, क्या लिखें, ये सब हमारे जैसे लोग तय करते हैं। आपकी सुबह हम बनाते हैं, आपकी आँखों में लीड खबरें डालकर, ट्विटर का ट्रेंड बताकर, फ़ेसबुक पर क्लिकबेट हेडलाइन देकर। हम दोनों तरफ से खेलते हैं। जो, जब, जहाँ ज्यादा पैसा देगा, हम उसके लिए लिखते और बोलते हैं। 

यही सच्चाई है, बाकी जितनी आदर्श बातें आप करते हैं या किसी को करते सुनते हैं, विशुद्ध दोगलई है या आपकी अनभिज्ञता या भोलापन। वही दोगलई आज आया हुआ आपातकाल है जहाँ किसी प्राइवेट संस्था की नौकरी त्यागकर दूसरी प्राइवेट संस्था जाने की प्रक्रिया में गए पत्रकार को, उसके अलावा सभी लोग, सरकार की कार्रवाई मान रहे हैं। 

इन दोगलों से सावधान रहिए। 

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