वेब सीरीज़ के मामले में भारत नब्बे के दशक के हॉलीवुड की खराब फ़ोटोकॉपी है

जब भी रचनात्मक क्षेत्र में हम घुसते हैं तो तुलनात्मक अध्ययन के लिए कुछ मानदंड होते हैं। फ़िल्मों, सीरीज़ आदि की बातें करें तो हम उसमें कहानी, ट्रीटमेंट, कैमरा, साउंड, परफ़ॉर्मेन्स, निर्देशन आदि देखते हैं। ज़ाहिर है कि जब बाज़ार और विश्व खुलता है तो सीमाएँ टूटकर बराबर हो जाती हैं। इसी कारण मिस्र के किसी बीस साल के लड़के द्वारा निर्देशित एनिमेटेड फ़िल्म चर्चा का विषय हो जाती हैं, या चार्ली चैपलिन की साइलेंट फ़िल्मों को भी आजतक देखा जाता है। 

आजकल भारत में वेबसीरीज़ का बाज़ार आया है। नेटफ़्लिक्स से लेकर एमेज़ॉन प्राइम, हॉटस्टार, ज़ी फ़ाइव, ऑल्ट बालाजी आदि वेबसीरीज़ बनाकर परोस रहे हैं। इनकी हालत वैसी ही है जैसे किसी भी वेबसाइट के सफल होने के लिए ट्रैफिक जुटाने के लिए हम पैंट उतारकर होमपेज पर खड़े हो जाते हैं। सॉफ़्ट पोर्न से लेकर परवर्टेड हेडलाइनों से भरी कहानियाँ, क्लिकबेट हेडलाइन लगाकर लोगों को इकट्ठा करते हैं। बाद में कहते हैं व्यापार है, ऐसे ही होता है। 

दो वेबसीरीज़ जो चर्चा का केन्द्र बनी हैं इस साल, सेकरेड गेम्स और मिर्ज़ापुर, दोनों ही कहानी के स्तर पर ज़बरदस्ती हैं। ‘सेकरेड गेम्स’ के बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ और जब मैं इसे वाहियात सीरीज़ कहता हूँ तो लोग मुझे ये कहते हैं कि नहीं, ये ब्रिलिएंट हैं। फिर मैं कहता हूँ कि ब्रिलिएंट तो ‘नारकोस’ है, ‘हाउस ऑफ़ कार्ड्स’ के शुरुआती सीजन्स हैं, तो कहते हैं कि ‘कहाँ आप अमेरिका से तुलना कर रहे हैं’। 

जब कॉपी वहीं से कर रहे हो, तो फिर तुलना क्या बंग्लादेश के अलोम बोगरा से करूँ? खैर, अलोम के विडियो से हँसी तो आती है कम से कम! 

रियलिज्म या यथार्थवाद का मतलब सेक्स और गाली नहीं होते। सेक्स और गाली से टीनएज बच्चे और इनफिरियोरिटी, पीयर प्रेशर से जूझते युवाओं को रिझाया जा सकता है क्योंकि उन्हें तो रियलिज्म के नाम पर मस्तराम और लिटेरोटिका भी दे दो तो वो ऑर्गेज्मिक फ़ील करने लगते हैं। लेकिन प्रेम का रियलिज्म सेक्स नहीं है। न ही हर अपराधी के जीवन में हर छः मिनट पर सेक्स होता है। 

होता भी है तो, उसको दिखाना ज़रूरी नहीं। ज़रूरी इसलिए नहीं क्योंकि अपराधी अपराध करता है, सेक्स नहीं। सेक्स भी करता है, लेकिन करता तो टट्टी भी है, तो क्या उसको हर तीन मिनट में कमोड पर बैठा दिखा दें? शायद टट्टी करते इसलिए भी नहीं दिखाते क्योंकि उनके बदले निर्देशक स्वयं ही खूब टट्टी कर देते हैं सीरीज़ में। 

अस्सी-नब्बे के दशक में बड़े टीवी के घर में आ जाने से हॉलीवुड की फ़िल्मों के दर्शकों में कमी होने लगी। तब इन्होंने इस बात पर दाव खेला कि टीवी पर तो सेंसर वाले कंटेंट दिखाए जाते हैं, वो फ़िल्मों में सेक्स, किसिंग आदि सीन दिखाएँगे। उस समय पोर्न सहज उपलब्ध नहीं थे, तो बड़े पर्दे पर ‘ऑरिजिनल सिन’, ‘ब्लू लैगून’, ‘बेसिक इन्सटिंक्ट’ जैसी फ़िल्में चर्चित हुईं। ये वो नाम हैं जो मुझे स्कूल टाइम में एएक्सएन पर देखने से याद हैं। 

याद यह भी है सबको कि उस समय के हर फ़िल्म में ‘सीन’ रहते ही थे। फिर इंटरनेट और पोर्न के सर्वसुलभ होते ही नई सहस्त्राब्दि के शुरुआत के साथ हॉलीवुड से ज़बरदस्ती के सेक्स और इन्टेन्स किसिंग सीन्स गायब हो गए। हर फ़िल्म से अब ये एक-दो फ़िल्मों तक सिमट गया है। 

भारत में ये बात सबको समझ में नहीं आ रही कि ‘बेसिक इन्सटिंक्ट’ या ‘ऑरिजिनल सिन’ को कालजयी नहीं माना गया, और दस साल में वो गायब हो गए। इसलिए, ये महज़ चर्चा में आने का शॉर्टकट ज़रूर है लेकिन गाली और सेक्स सीन यथार्थवादी चित्रण से बहुत दूर दर्शकों की जननेंद्रियों को थोड़ी देर के लिए गुदगुदी देने के अलावा किसी काम का नहीं। 

साथ ही, जिनका जीवन कसौटी, तारक मेहता, भाभीजी, भारद्वाज-मल्होत्रा परिवार की चिक-चिक में बीता हो, उनके लिए तो ‘सेकरेड गेम्स’ ही ‘नारकोस’ है। लेकिन, जब वो दर्शक, जो पढ़े लिखे हैं, इंटरनेट कनेक्शन है, नारकोस जैसे सीरीज़ देख सकते हैं, वो ऐसी घटिया प्रोडक्शन्स पर आहें भरते हैं तो अजीब लगता है। 

चूँकि हर कोई मीडियोकर काम ही कर रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि जो भी चीज बने उसे हम कालजयी कहकर पूजने लगें। क्रिएटिविटी के मामले में हमारी फ़िल्म और टेलिविज़न इंडस्ट्री बहुत ही नकारी और घटिया है। हज़ार हिन्दी फ़िल्मों में पाँच फ़िल्म अच्छी नहीं होती हमारे देश में। साउथ का भी वही हाल है। 

टीवी सीरियल तो क्या करते हैं, वो सबके सामने है। इस मामले में छोटी संस्थाएँ ‘पिचर्स’ जैसे सीरीज़ बनाती हैं तो वो एक फ्रेशनेस लेकर आती है कि क्रिएटिविटी बची हुई है। लेकिन नेटफ़्लिक्स और प्राइम जैसे संस्थान लूजमोशन को बर्फ़ी कहकर प्रस्तुत करते हैं तो अनुराग कश्यप का नाम भर होने से लोग प्रेशर में आ जाते हैं कि ‘यार मेरी क्या औक़ात अनुराग को कुछ कहूँ’। 

इस कारण आप वही कहने लगते हैं, और खुद को समझाने लगते हैं कि जो भी अख़बारों में, वेबसाइटों पर ‘निष्पक्ष रिव्यू’ के नाम पर छपा है, वही सत्य है। जबकि सत्य तो यह भी है कि आजकर हर फ़िल्म का प्रमोशनल बजट फ़िल्म, सीरीज़ आदि के बजट के लगभग या आधा तो होता ही है। पीआर कम्पनियाँ पहले से तैयार रिव्यू पोस्ट करवाती है एंटरटेनमेंट बीट के पत्रकारों से। 

आप उसे पढ़कर अपने आप की बेहतर जजमेंट को कमतर मानकर, खुद को ही बुरा या नासमझ कहने लगते हैं। लेकिन खुद को कमतर आँकना एक कठिन कार्य है इसलिए आप इस पीआर का हिस्सा बनकर, उनके शब्दों को अपनाकर, हर ऐसी खराब कृति पर ‘वाह, क्या बनाया है अनुराग ने’ कहने पर मजबूर हो जाते हैं। 

ऐसे लोग आपके भीतर हीनभावना डालते हैं कि तुम्हें कितनी समझ है, जबकि सत्य तो यह है कि अगर आईआईटी का बच्चा दूसरी क्लास के बच्चे को यह न समझा पाए कि दो और दो चार क्यों होते हैं, तो गलती बच्चे की नहीं, बताने वाले की है। लेकिन हमारा समाज उस बच्चे को मंदबुद्धि कहकर, आईआईटी के छात्र के सर पर छतरी तान देता है। 

फ़िल्में या सीरीज़ आम लोगों के लिए बनती हैं। हाँ, हर व्यक्ति को हर चीज अपील नहीं कर सकती लेकिन कुछ सामान्य मानदंडों पर हर कृति को आँका जा सकता है। गुलज़ार ने ‘जब तक है जान’ में क्या वाहियात लिरिक्स लिखें हैं, इसको स्वीकारिए और ज़ोर से कहिए। चूँकि कोई गुलज़ार है, और मैं बैंक का काम करता पीओ, तो अजीत भारती को उसके गीतों को बुरा कहने की औक़ात नहीं, ऐसा मानना ग़लत है। 

हर फ़िल्ममेकर की हर फ़िल्म बेहतरीन नहीं हो सकती। राम गोपाल वर्मा ‘सत्या’ भी बनाता है, ‘आग’ भी। अनुराग कश्यप ‘वासेपुर’ भी लाता है, ‘बॉम्बे वेलवेट’ भी है। एक फ़िल्म में वो हर नायक को खिलने की जगह देता है, और फिर हर फ़िल्म में एक एक्टर को एक ही तरह से फैज़ल खान बनाए दिखाता है। तो क्या आम आदमी को ये सब दिखता नहीं? 

सब दिखता है, लेकिन नकली परिवेश की नकली बातचीत के दौर में ईमानदारी से किसी क्रिएटिव आर्टफॉर्म की प्रस्तुति को बेकार कहने में झिझक होती है। झिझकिए मत। बेकार कहिए, और तर्क के साथ कहिए कि ‘नहीं भूल सकता मैं… जब तक है जान, जब तक है जान’ छिछले शब्द हैं जो कि किसी सातवीं कक्षा के बच्चे की कविता लगते हैं जिसे टीचर ने कहा हो कि आधे घंटे में लिखकर ले आओ। 

‘मिर्ज़ापुर’ नहीं देखी है, लगता भी नहीं कि देखूँगा क्योंकि हाइप होने के बाद ‘मसान’, ‘सेकरेड गेम्स’ आदि देखकर भयंकर निराशा हुई कि क्यों समय बर्बाद किया। औसत दर्जे के काम को हाइप कर देने से उसकी क्वालिटी नहीं सुधर जाती, वो रहती तो घटिया ही है क्योंकि उन्हें कसने के मानदंड हैं। इनकी कहानी बिखरी हुई, ट्रीटमेंट में छिछलापन, संवादों में ज़बरदस्ती, अभिनय में एकरूपता, निर्देशन में उदासीनता देखकर आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *