घृणा की खेती करते फेसबुकिया बुद्धिजीवी की फ़र्ज़ी संवेदना

 

जब आदमी को ज्ञान हो जाता है, और उसे ये लगने लगता है कि उसके साथ ये हो चुका है और वो ज्ञानी है, तब वो मोहम्मद अयूब पंडित को घसीटकर मारे जाने वाली लिंचिंग की ख़बर से आहत नहीं होता, वो अगली ख़बर का इंतज़ार करता है कि कब बीफ़ की अफ़वाह पर लिंचिंग की ख़बर आएगी।

तब ही उसे लगता है कि उसके ज्ञान का, उसकी संवेदना का असली उपयोग हो पा रहा है। दोनों में मुसलमान ही मरा है, दोनों को भीड़ ने ही मारा है, दोनों की जाँच हो रही है, लेकिन ज्ञानी आदमी पहले को भूलते हुए, दूसरे को सीधे देश की परिकल्पना से जोड़कर लिख देता है।

भले ही बात ये हो कि झगड़े की शुरुआत सीट को लेकर हुई और फिर किसी ने बीफ़ का एंगल जोड़ दिया। जहाँ तक ख़बरों की बात है, तो आप तक वही पहुँचती है, जो आपको पढ़ना होता है।

जैसे कि एनडीटीवी अयूब की लिंचिंग पर ये लिखता है, “मैन ओपन्स फ़ायर आउटसाइड जामिया मॉस्क़, किल्ड बाय मॉब’।

जैसे कि आप वही ख़बर पढ़ते हैं कि लगता है फ़िज़ाओं में कितनी घृणा है। आप खुद को नहीं देखते कि ये बीफ़-बीफ़ पर मरने-मारने वाले आपके जैसे ही लोग हैं, इन्हें सरकार ने ट्रेन नहीं किया है। लोगों को मारने का बहाना चाहिये। जैसे कि आप जैसे ज्ञानियों को देश को दुत्कारने का।

किसने कह दिया कि झंडा लेकर सड़क पर वन्दे मातरम् कहते हुए घूमो? किसी ने कहा क्या? या ये भी उसी मीडिया की ख़बर है जो आपको आपके हिसाब का कस्टमाइज्ड घृणा का डोज़ देती है? आपको नहीं लगता कि आप क्या कर रहे हैं? आप जो ज्ञान बाँट रहे हैं, और हर तीसरे दिन भारत दुर्दशा पर माथा पकड़ कर कराहने लगते हैं कि देश को क्या हो गया है, आप ही वो आदमी हैं जो माहौल को विषाक्त कर रहा है।

आप ये जताने की भरपूर कोशिश में हैं कि सरकारों ने ‘मॉब लिंचिंग’ का कोई कोर्स शुरु किया है जहाँ से प्लेसमेंट हो रहा है। हर दिन आप वही बात खींचते हैं जिससे कि लगता है वाक़ई देश में रहना मुश्किल है। हलाँकि ऐसा करने वाला हर आदमी रोज़ ऑफ़िस जा रहा है, हर दिन सड़कों पर रुकता है, हर दिन गाड़ी में बैठता है।

दुर्घटना को अपने काम की घटना बनाने में बहुत देर नहीं लगती। आप लोग कीवर्ड ढूँढते हैं। आपको हर घटना को साम्प्रदायिक बनाना है, ताकि आपकी बुद्धिजीविता के चूल्हे में आग जलती रहे। आप संवेदना दिखाने से ज्यादा घृणा का प्रदर्शन करते हैं। इसी से लग जाता है कि आपकी प्राथमिकता देश की चिंता नहीं, कुछ और ही है। और वो ‘कुछ और’ क्या है, ये आपको अच्छे से पता है।

आपको ऐसी घटनाओं की ज़रूरत होती है ताकि आप तीन लाइन में ‘भारत एक बर्बाद देश है’ कहकर ज्ञानपुंज बन जाएँगे। आपको इसरो नहीं दिखता, आपको रोज़ बनती सड़कें नहीं दिखतीं, आपको बिजली में आत्मनिर्भरता नहीं दिखती, आपको जीएसटी के फ़ायदे नहीं दिखते, आपको वो एक भी बात नहीं दिखती जिससे लगे कि देश में कुछ सही हो रहा है।

आप घृणा पर पलते हैं, वो आपका तेल है। आपके सिस्टम में ये तेल नहीं जाएगा तो आपका माथा सीज़ कर जाएगा। आप अपने थ्री लाइनर भारत दुर्दशा वाली संवेदनशील बात नहीं लिख पाएँगे। लोग मरते हैं, लोग मरेंगे, उसमें जाति ढूँढना, धर्म ढूँढना आपकी ओछी बुद्धि का परिचायक है। आप ज़हर घोल रहे हैं जबकि आपको व्हाट्सएप्प का कटाक्ष एक तथ्य लगता है और आप शेयर कर के ‘ऑफर्ड विदाउट कमेंट’ लिख देते हैं जैसे कि सच में कोई प्रणय रॉय के बारे में ये लिखकर फैलाएगा कि उसके कमरे में डार्टबोर्ड है जिस पर मोदी की तस्वीर है।

आपका उद्देश्य ये नहीं है कि इस पर चर्चा हो। आपका एकमात्र उद्देश्य है घृणा की खेती बढ़ती रहे। आप उसमें तेल डालते रहिए। आपके जैसा हर इंसान घटनाओं से बहुत दूर होता है। इसीलिए आपको ये लग्ज़री है कि आप हमेशा एक घटना को ऐसी संवेदनशीलता से पटकते हैं कि लगता है आपके बग़ल के केबिन में ये हुआ और आपने ये सुना, “मारो, गाय का माँस है इसके पास!”

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