दंगों का दौर शुरु हो गया है, कमर-पेटी बाँध लीजिए

 

दो-चार जगह दंगे हुए हैं रामनवमी के समय। वैसे, दंगे होते नहीं। ये कोई बीज नहीं है कि ज़मीन में दबा दो, कुछ समय में होने लगेंगे। दंगे कराए जाते हैं। रैलियों पर पत्थर फेंका जाता है, कोई बम फेंकता है, कोई गोलियाँ चलाता है।

ये धर्म का शक्ति प्रदर्शन होता है जिसका फ़ायदा राजनैतिक दल उठाते हैं। उसके बाद का फ़ायदा उठाने वाले लोग वो होते हैं जो दूसरी पंक्ति में खड़े होते हैं, और सेलेक्टिव सवाल पूछते हैं कि फ़लाँ दंगे पर फ़लाँ क्यों चुप हैं। कुछ लोग ऐसे मौक़ों पर सहानुभूति या संवेदना नहीं दिखाते वो किसी के ऊपर प्वाइंट स्कोर करना चाहते हैं।

दंगे और धार्मिक रैलियाँ, दोनों ही, पहचान और डर दिखाने के लिए कराए जाते हैं। माहौल इतना ख़राब है कि चाहे मुसलमान रैली निकाले या हिन्दू, उस रैली को बेवजह भी दूसरों के इलाके से निकलवाया जाता है। इसका प्रयोजन यही होता है कि ‘इन काफ़िरों को बता देंगे’, ‘इन मुसलमानों को दिखा देंगे’ कि हम कौन हैं।

इस चक्कर में वो रैलियाँ और यात्राएँ भी नकारात्मकता में रँगती जा रही हैं जो सैकड़ों सालों से निकाली जाती रही हैं। समय के साथ-साथ राज्यों की सरकारें अपने मतलब के वोटबैंक द्वारा तलवार और पिस्तौल लेकर सड़कों पर उतरने को ज़ायज ठहराने लगी हैं। मुसलमान भीड़ एक इलाके में आग लगाती है तो दूसरे इलाके की सरकार और वहाँ के नेता सवाल उठाते हैं। फिर हिन्दुओं की भीड़ जब आग लगाती है तब सवाल कोई और पूछने लगता है।

आगे क्या? आगे कुछ नहीं। ये एक सच्चाई है। ये ग़लत है लेकिन ये सच्चाई है कि पहले जो समाज हिंसक नहीं था, उसे अब हिंसक बनाया जा रहा है, या वो खुद ही एक का तुष्टीकरण देखकर हिंसक प्रवृति दिखाने लगे हैं। इस हिंसा और वोटबैंक का सहारा एक तरह के लोग लेते रहे, अब दूसरी तरह के लोग भी दंगे करा रहे हैं, और आगज़नी में शामिल हैं।

ये होता रहेगा। ये परिणाम है दशकों के तुष्टीकरण का, और एक विचारधारा को सहमति देते रहने का जिसके कारण दूसरा तबक़ा बहुसंख्यक होकर भी सहता रहा है। दंगों का सहारा किस पार्टी ने सबसे ज़्यादा लिया है, वो विकिपीडिया पर पढ़ लीजिए, फिर जज कीजिएगा। दक्षिणपंथियों को चरमपंथी जैसा व्यवहार करने पर उकसाया गया है, और इसके परिणाम बहुत भयावह होंगे।

आप चुनावों का इंतजार कीजिए। इस समय अखलाख मरेगा, वेमुला आत्महत्या करेगा, बर्धमान और धूलागढ़ में दंगे होंगे। इसमें से एक तरह के लोग दूसरी तरह की हिंसा को छुपा लेंगे। ये बहुत शातिर लोग हैं।

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