झारखंड रेप-हत्या कांड: इन गाँवों के लोग किस दुनिया में रह रहे हैं?

ख़बर यह है कि एक 16 साल की नाबालिग़ लड़की को, कुछ लड़के उसके घर से अगवा कर लेते हैं जब उसके परिवार वाले किसी शादी में गए होते हैं। फिर सामूहिक बलात्कार करते हैं। उसके बाद गाँव में पंचायत बुलाई जाती है और लड़कों को सौ बार उठक-बैठक लगाने और पीड़िता को 50,000 रूपए देने की बात होती है। 

आरोपियों का समूह अपमानित महसूस करता है कि गाँव के सामने उसे ऐसी सज़ा दी गई। फिर वो माँ-बाप के सामने ही लड़की को आग लगाकर जला देते हैं। इसके बाद पुलिस को पता चलता है और अधजली लाश को क़ब्ज़े में लिया जाता है, 14 लोगों की गिरफ़्तारी होती है जिसमें मुखिया और सरपंच शामिल हैं। क़रीब 30 लोगों का नाम है, बाकी की खोज़ ज़ारी है। 

मुझे इसमें ये समझ में नहीं आ रहा कि क्या चकरा गाँव के किसी भी आदमी के पास एक फोन नहीं था? जब इतना भयानक कांड हुआ तो क्या किसी ने पास के थाने में जाने की नहीं सोची? पूरे गाँव में एक आदमी ऐसा नहीं था? क्या इतनी देर में कोई आदमी गाँव से थाने तक जाकर ख़बर नहीं कर सकता था? पीड़िता के परिवार वाले ऐसे मामले में पंचायत के पास जाते हैं! 

मुझे नहीं पता कि झारखंड के चतरा ज़िले के उस गाँव में पंचायतों का कितना ख़ौफ़ है लेकिन इस तरह के अपराध होने के बाद भी पंचायतों पर निर्भरता क्यों है? क्या पुलिस जैसी संस्था के बारे में लोगों को पता नहीं है या फिर वहाँ पुलिस से विश्वास ही उठ गया है कि लोग वहाँ जाना ज़रूरी नहीं समझते? 

मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ये कैसे हो जाता है! अगर बलात्कार और हत्या एक ही साथ हो जाए तो समझ में आता है कि किसी के पास समय नहीं था मदद या पुलिस को बुलाने का। लेकिन दो घटनाओं के बीच इतना समय रहा हो, पूरी पंचायत चली हो, और फिर भी ये हो गया? क्या पंचायतें बलात्कारों को इतने सरल तरीक़े से देखती है कि सौ उठक-बैठक लगवा दे?

क्या यहाँ भी पीड़ितों दलित है? दलित का मतलब जाति से नहीं, उसकी सामाजिक स्थिति से लगाएँ। क्या बलात्कारी लड़के दबंग थे? हाँ, वो दबंग थे। इसीलिए पंचायत ने रसूखदारों, परंतु जाति से दलित धनु भुइयाँ, को मामूली सज़ा सुनाकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने कहा। 

अब आप बताइए कि इसका क्या किया जाए? यहाँ कौन सा हिन्दू-मुसलमान, दलित-सवर्ण खेला जाए? यहाँ तो अपनी ही जाति-बिरादरी के लड़कों ने ये घृणित काम किया। इसमें किसका दोष है? इसमें चर्चा भी क्या करें? इसमें न मसाला है, न चुनाव पर कोई असर पड़ना है। 

मुझे अजीब लगता है जब बलात्कार जैसे वैयक्तिक अपराधों के लिए किसी धर्म, जाति या पूरे राष्ट्र का नाम काला कर दिया जाता है। क्या दलित द्वारा दलित का बलात्कार और हत्या से शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए? क्या वो शर्मिंदगी और क्रोध सिर्फ़ हिन्दू-मुसलमान, दलित-सवर्ण वाले मामले में ही लागू होता है? 

क्या यह समस्या सामाजिक नहीं जहाँ कोई लड़का एक लड़की का बलात्कार करता है, पेट्रियार्कल माइंडसेट वाली महिला मुखिया उसकी सजा में उठक-बैठक लगाने बोलती है, और फिर भरी पंचायत में पीड़िताके पिता को आवाज़ उठाने पर आरोपी पीटता है? 

यहाँ कौन सा एंगल निकाला जाए? 

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