अच्छा, देश के युवा का मूड पता चल गया लेकिन आगे क्या?

अच्छा, देश के युवा का मूड पता चल गया लेकिन आगे क्या? 

मतलब, हर साल पता चल जाता है कि देश के (कुछ) युवा नक्सलियों के साथ हैं। यह पता चल जाता है कि मोलेस्टेशन और रेप के साथ-साथ जंगलों में महिला काडरों को सेक्स स्लेव बनाकर रखने वालों के साथ देश के प्रतिष्ठित संस्थान के युवा हैं। यह पता चल जाता है कि आतंकियों के जनाज़े को कंधा देने वालों के भी सपोर्टर आज की तारीख़ में ज़िंदा हैं, और उन्हें भी इस देश का लोकतंत्र नेता चुनने का मौका देता है।

ये वही युवा हैं, जो चार साल से यही चिल्ला रहे हैं कि लोकतंत्र की हत्या हो रही है। ये वही युवा हैं जो कहते फिरते हैं कि संविधान की जगह मनुस्मृति से राज किया जा रहा है। ये वही युवा हैं जो ये कहते हैं कि उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है। और, ये वही युवा हैं जो इतने दबाव में, इतने डर के माहौल में, इतने आतंक के साये में, इतने आपातकालों के बीच एक चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं। 

इन युवाओं को पहचानिए जो साल में एक बार देश के युवा का मूड बताकर, उस मूड का क्या हो गया, ये बताना ज़रूरी नहीं समझते। इस युवा को पहचानिए क्योंकि ये युवा ऐसे चुनाव जीतकर इतना ही साबित करता है कि नक्सली विचारधारा के न सिर्फ नेता हैं, बल्कि कैम्पस में 2000 विद्यार्थी ऐसे हैं जिनके लिए जब-तब सरकारी कर्मचारियों का सामूहिक नरसंहार एक सामान्य घटना है। 

इन युवाओं के मूड को पहचानिए जब 2015 में गठबंधन से पहले चारों पार्टियों के वोटों की कुल संख्या 3000 से ऊपर रहती थी, दो साल में वो 2000 तक पहुँच गई है। लेकिन, ये देश के युवा का मूड है। 

ये देश के ही युवा का मूड होगा जब अपने नेता को भरे चौराहे पर गोलियों से छलनी होकर मरा हुआ पाने वाली पार्टी अगले साल राजद के साथ गठबंधन करके आपको आदर्शों, नैतिकता और विचारधारा की बात बताएगी। और, अगर अगले साल भाजपा फिर से जीतती है, तो इसी आपातकाल, डर और आतंक के नाम पर कॉन्ग्रेस की एनएसयूआई के साथ भी ‘देश और समाज की भलाई के लिए’ गठबंधन बनाया जाएगा।

ये चुनाव और उसमें जीतने वालों के सर का सेहरा यह बताता है कि हम और आप जो इन विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों को गरियाते हुए पूरे विश्वविद्यालय को ही नाप देते हैं कि यहाँ नक्सली आतंकी पलते हैं, हम कुछ ग़लत नहीं कहते। क्योंकि यहाँ के (कुछ) युवाओं का मूड तो यही है कि आतंकवादियों के हिमायती और भविष्य के बलात्कारियों, मोलेस्टरों और बम बनाने वाले काडरों को अपना नेता बनाया जाए। 

ये चुनाव तो इस बात का कन्फर्मेशन होते हैं कि अभी भी वहाँ एक सड़ी और हिंसक सोच के लोग बैठे हुए हैं, और उनको सपोर्ट करने वाले भी। ये तो हमारे, आपके डर को ज़ायज ठहराते हैं कि हाँ, यहाँ आतंकियों की नर्सरी है, और जो बम नहीं बना रहे, जो जंगलों में अपने ‘साथियों’ की लाशों के पेट में बम नहीं छोड़ रहे ताकि वो मरते हुए भी दस-पाँच आम सरकारी मुलाजिम को मार दे, जो अपने साथ की महिला काडरों को सेक्स स्लेव नहीं बना रहे, वो सब मानसिक समर्थन ज़रूर दे रहे कि जो वो कर रहे हैं वो सही कर रहे हैं। 

तो, इंतज़ार कीजिए कि अगले साल ये गठबंधन 2100 से 1000 पर आए, फिर 800 और 700 तक जाए क्योंकि देश के बेहतर युवा वहाँ पहुँच रहे हैं, और ये सारी बातें देख रहे हैं कि कैम्पस की बुनियादी बातों की बात छोड़कर वहाँ के चुनाव में सारी हवा-हवाई बातें होती हैं, जो सुनने में बेहतरीन लगती हैं, लेकिन उनका उस कैम्पस की जीवनशैली को बेहतर बनाने से कोई वास्ता नहीं होता। ये वही लोग हैं जिनकी पढ़ाई और समझदारी ‘प्रेसिडेंशियल डिबेट’ में ट्रम्प से लेकर तेल के दामों का आम जीवन पर प्रभाव तक बयान कर देती है, लेकिन हाथ में डफ़ली लेकर तथाकथित विरोध प्रदर्शन में सारे ज्ञान और रचनात्मकता का निचोड़ ‘नीम का पत्ता कड़वा है, नरेन्द्र मोदी भड़वा है’ तक सिमट जाता है।

ऐसे चुनाव ज़रूरी हैं ताकि हमारे डरों पर मुहर लगती रहे कि हाँ, जब तुम कहते हो कि ये विश्वविद्यालय विषविद्यालय है, नक्सलियों और आतंकियों की प्रयोगशाला है, मोलेस्टरों का इन्क्यूबेशन सेंटर है, तो मान लो कि वो सच है। ये चुनाव ज़रूरी हैं ताकि लोग ये बोलने में बिलकुल भी न हिचकिचाएँ कि सब्सिडी पर पढ़ता हुआ एक छात्र गरीबी, समाजवाद, और देश की अर्थव्यवस्था पर भाषण तो बहुत अच्छा दे लेता है लेकिन कैम्पस से निकलते ही वो जर्मनी के किसी मल्टीनेशनल में ज्वाइनिंग ले लेता है। 

ये चुनाव ज़रूरी हैं शिनाख्त के लिए कि हमारी आँखों से, हमारे ज़ेहन से ये दृश्य और ख़्याल गायब न हो जाएँ कि जिन लोगों के सामने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगे थे, वो आज भी चुनाव लड़ और लड़ा रहे हैं। ये ज़रूरी है ताकि आम जनता ये जान सके कि जब एक सुर में इन्हें लपेटकर कोई इनकी हरामज़दगी पर बोलता है, तो वो सही बोलता है क्योंकि ये वही लोग हैं जो एक तरह की हिंसा पर सफ़ेद तख्ती पर लाल और काले अक्षर लिखकर शर्मसार होते हैं, लेकिन दूसरी तरह की हिंसा पर फूलों की तस्वीरें और कवियों की पंक्तियाँ लिखते हैं। 

ऐसे चुनाव बहुत ज़रूरी हैं। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *