कंगना रणौत: जुनूनी, हिम्मती, स्वाभिमानी लड़की जो हर लड़की को होना चाहिए

डरते तो हम सब हैं, अपने ही बनाए हुए मकड़जालों से जो हमसे अलग नहीं होते। आप तोड़ देंगे, वो चिपके रहेंगे थोड़े-थोड़े। कंगना ने हाल ही में इंडिया टीवी पर दिए इंटरव्यू में कहा कि वो क्यों डरे, किससे डरे। लेकिन ये कह सकने तक के सफ़र में उसने कई दिन देखे जहाँ मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक तौर पर उसके साथ बुरा होता रहा।

इस इंटरव्यू से दो तरह की बातें निकल कर आई हैं — १. उसकी फ़िल्म आने वाली है और ये सब हथकंडे हैं, २. कंगना देश की तमाम लड़कियों के लिए एक रोल मॉडल की तरह है।

जिन्हें ये लगता है कि एक लड़की फ़िल्म के प्रमोशन के लिए अपने निजी अनुभवों को, इस पुरुषवादी समाज के उस हिस्से से भिड़ेगी जहाँ पैसा इतना बोलता है कि आदमी फुटपाथ पर लोगों को रौंदकर निकल जाता है और देश के प्रधानमंत्री के साथ पतंग उड़ाता दिखता है, तो आपकी बुद्धि और विवेक पर मुझे संदेह है। संदेह इसलिए होता है कि आप का तर्क बिल्कुल वैसा ही है जहाँ लड़की का बलात्कार होने पर आसानी से कहा जाता है कि ऐसे ड्रेस पहनेगी तो होगा नहीं!

आपके दिमाग में एक कोढ़ है। उस पूरे इंटरव्यू को सुनिए जाकर और देखिए कि उसने अपने किस फ़िल्म का प्रमोशन कर दिया है वहाँ पर। वैसे भी कंगना की फ़िल्मों को सोशल मीडिया के दौर में प्रमोशन की आवश्यकता नहीं है। उसे यही करना होता तो वो सोशल मीडिया पर खुद भी होती। और अगर प्रमोशन ही करना है तो कौन नहीं करता?

फ़िल्म के आने से क्या उसकी बातें गलत हो जाती हैं? क्या एक अभिनेत्री अपनी बातों को, जिसे दबाने की पुरज़ोर कोशिश होती रही है, वो कहीं भी जाकर न बोले? फ़िल्में तो साल में एक से दो बनती ही रहती है, तब तो वो जो भी बात बोले, आप जोड़ देंगे कि फ़िल्म आ रही है। आप ये डिसाइड कर लीजिए कि किसी एक्टर के फ़िल्म आने के कितने दिन पहले की बातों को सीरियसली लिया जाना चाहिए। वो समय कितना है — एक सप्ताह पहले, एक महीना पहले, दो महीना पहले, छः महीना पहले? कितना?

दूसरी तरह के लोगों से मैं सहमत हूँ। उसकी निजी जिंदगी में क्या हुआ ये मेरे, या आपके, शोध का विषय नहीं होना चाहिए। वो तब तक नहीं होना चाहिए जब तक सामने वाला सहज रूप से उस पर बात कर रहा हो। कंगना मेरे लिए एक अभिनेत्री है, और अच्छी अभिनेत्री है। मुझे उसकी कई बातें, एक कलाकार के तौर पर रिस्पांसिबिलिटी लेकर अपनी इंडस्ट्री के बारे में कहना अच्छी लगती हैं जबकि यहाँ हर कोई पोलिटिकली करेक्ट बनता दिखता है। आमिर खान जैसे लोग एक मुद्दे पर शब्दों के आरोह-अवरोह और चयन पर नियंत्रण करते हैं, तो दूसरे मुद्दे पर देश छोड़ने लगते हैं।

इस समय में जबकि अमिताभ बच्चन जैसे लोग, जिन्हें किसी का डर नहीं होना चाहिए, ये कहते पाए जाते हैं कि सलमान फ़िल्म परिवार का हिस्सा हैं और उनके कोर्ट केस में हर के परिवार की तरह उनके पीछे हैं, कंगना स्टैंड लेती ही रही है। पैसे किसे प्रिय नहीं हैं? सबको पता है कि आईटम सॉन्ग करने पर एक दिन के काम में ठीक पैसा मिल जाता है, लेकिन कंगना ने इस पर कहा है कि वो इस तरह के बोल वाले गीतों पर नहीं नाच सकती क्योंकि बच्चे भी इसे देखते हैं। इस पर कोई सर्टिफिकेशन नहीं होता। जहाँ सलमान खान जैसे लोग कहते फिरते हैं कि विज्ञापण तो करना चाहता हूँ, लेकिन कोई ऑफ़र करे तब तो, वहाँ फ़ेयरनेस क्रीम के विज्ञापण को सिर्फ इसलिए नकारना कि वो उसके सिद्धांतों को ख़िलाफ़ है, उसके प्रति सम्मान का भाव ही लाता है।

सोलह साल की उम्र से अपने जुनून के पीछे भागते हुए, तीस साल की उम्र तक तीन राष्ट्रीय पुरस्कार पाना, जबकि न तो उनकी माताजी सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष थीं, न ही उनके डायरेक्टर निर्णायक मंडल में थे, बहुत कुछ कहता है।

अदाकारी से ज्यादा मैं उसके बेख़ौफ़ बोलने का क़ायल हूँ कि वो सही है तो उसे किसी बात का डर नहीं। अगर किसी को ऋतिक रौशन ही सही लग रहा हो, तो वो बात अलग है। लेकिन अभी तक जो घटा है इस संदर्भ में, और तमाम पैसे, पावर आदि के प्रयोग के बावजूद ‘फ़ेक’ ऋतिक को रौशन ख़ानदान ढूँढ नहीं पाया, या कंगना को कोर्ट तक भी घसीट नहीं पाया, तो लगता है कि बेनेफिट ऑफ़ डाउट कंगना को जाना चाहिए।

पूरे इंटरव्यू में अपने बालों से लेकर, अपने बोलने, और तमाम तरह के ‘इंडस्ट्री में रहना है तो ये करो’ वाले सुझावों को नकारते हुए, कितने बेहतर और स्पष्ट तरीक़े से उसने अपनी बात रख दी! किसी लड़की को, जो घर छोड़कर भागी है, जिसने किसी को प्रेम किया, वही आदमी उसके ‘फोटो, विडियो’ लीक करने की क़ानूनी नोटिस में धमकी देता है, उसे चुड़ैल और पागल साबित करता है, कैसा लगता होगा, ये वही समझ सकती है।

इस समाज में ये अजीब बात है कि बदचलन बस महिला हो सकती है, पुरुषों को किसी मुनि का वरदान है कि वो व्यभिचार भी करे तो उसे ‘बैज ऑफ़ ऑनर’ की तरह दिखाया जाता है! एक शादीशुदा पुरुष किसी लड़की से प्रेम करता है, जो कुँवारी है, तो इसमें चरित्रहीन कौन है? क्या इसके लिए इतना सोचना पड़ रहा है हमें? या, पूरे इंटरव्यू का निचोड़ इसी पर अटका हुआ है कि कंगना प्रमोशन कर रही है?

कितने नीच हैं आप जो ऐसा सोच लेते हैं?

हर फ़िल्म के समय विचार बदलने वाले लोग, दंगों के समय फ़िल्म देखने के लिए बचे रहने की सलाह देते अभिनेता, शराब पीकर जान लेने वाले स्टार, विचारधाराओं के खेल में देश छोड़ने तक की बात कहने वाले बेहतरीन लोग… ऐसे लोग तो भरे पड़े हैं इंडस्ट्री में, एक और हो जाता। कंगना भी यही कर सकती थी। वो भी करण जौहर की हिरोइन बनकर तमाम अवार्ड ले सकती थीं।

लेकिन उसने वो रास्ता नहीं चुना जो इंडस्ट्री पर एक मेकअप की तरह पुता हुआ है। तमाम चेहरे वो बात बोलते हैं जो पीआर एजेंसी कहती है। डैमेज कंट्रोल की बातें, ‘भाईचारे’ की बातें, सरकार बदलने पर मानवीय मूल्यों की बातें… वो बातें जो फ़िल्म दर फ़िल्म अपने रंग बदल देती है। कंगना भी यही करते हुए जी सकती थी। जिंदगी बेहतरीन तरीक़े से गुज़र जाती।

जिस इंडस्ट्री में अभिनेताओं को करोड़ों रूपए मेहनताने के रूप में मिलते हैं, उनके लिए पात्र गढ़े जाते हैं और अभिनेत्रियों को ‘लीड’ कहकर दो गीत, चार दृश्य में रखकर ग्लैमर की कमी पूरी कर दी जाती है, वहाँ कोई अभिनेत्री अपने अभिनय के बल पर अपने लिए पात्र लिखवा रही है, पैसे माँग रही है। ये क्या बड़ी बात नहीं? आमिर खान से ये सवाल पूछा गया था कि अभिनेता और अभिनेत्री को एक तरह का पैसा क्यों नहीं मिलता तो उन्होंने कहा था कि जब अभिनेत्रियाँ अपने बल पर दर्शक लाने लगेंगी, उन्हें पैसा बराबर क्या, उससे ज्यादा मिलने लगेगा।

कंगना ने वही किया। और जब एक स्त्री किसी पुरुषप्रधान समाज में टूटी, जर्जर सीढ़ियों को छोड़ते हुए अपनी अलग सीढ़ी बना लेती है तो बहुत दर्द होता है। ईगो हर्ट हो जाता है पुरुष का कि इसे तो मेरे बिस्तर में होना चाहिए था, ये कहाँ लक्ष्मीबाई बनकर घूम रही है! इसे तो मैं कहता कि टाँग फैलाओ, और वो फैलाती, फिर मैं कहता कि अगली फ़िल्म तुम्हारी। सबके साथ ये नहीं होता, लेकिन अधिकतर की इच्छा हो या न हो, फ़िल्म देने और पाने के इस तरीक़े को आप नकार नहीं सकते।

ये जेंडर पॉलिटिक्स और मेल सायकॉल्जी हमारे हर तरफ है। फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत ज्यादा है जहाँ हम ‘महिलाप्रधान’ फ़िल्में बनने पर आर्टिकल लिखने लगते हैं कि ‘अरे वाह! इसमें तो फ़ीमेल लीड के हिसाब से कहानी चलती है!’ क्या ये अजीब नहीं है कि आधी आबादी की कहानी गायब रहती है? क्या आपको नहीं लगता कि महिलाओं को नाचने, बिकिनी पहनने और शेक यॉर बूटी से ज्यादा होना चाहिए? क्या एक ही फ़िल्म में स्त्रियों की कहानी का विस्तार नहीं हो सकता? नहीं हो सकता तो लानत हैं ऐसे लेखकों और निर्देशकों पर। फिर आप स्टेज पर बैठकर ज्ञान मत बाँटिए कि समाज में ये हो रहा है, वो हो रहा है। जब पैसा ही सब कुछ है तो वही कमाइए, ज्ञान मत दीजिए।

कंगना ने इसी स्टेटस-को को चुनौती दी। उसने ये दिखाया कि सात-आठ करोड़ में बनी फ़िल्में भी सौ करोड़ का व्यापार कर सकती है। और आज वो खुद एक स्टार है। उसके लिए ‘सिमरन’ लिखी जा रही है, ‘लक्ष्मीबाई’ बन रही है। उसकी चर्चा हो रही है जब उसकी नाक पर तलवार लगता है। ये पहले हीरो की नाक पर होता था, हिरोइनों के कपड़े फिसलने पर आर्टिकल आते थे। ये डिस्कोर्स बदल रहा है। कंगना उसके केन्द्र में है।

कंगना के बोलने के लहजे से लेकर, उसके शब्दों के चुनाव तक, उसकी पूरी कहानी ऐसी है कि दिल करता है कि हमारी माँओं, बहनों, प्रेमिकाओं, पत्नियों की कहानी ऐसी ही हो। वो ऐसी लड़की बनें कि इस पैसा-पावर-पहुँच वाले पुरुषवादी समाज में न सिर्फ सोलह साल की उम्र में अपने जुनून के लिए प्रयासरत हो जाएँ, बल्कि नाबालिग़ होने पर किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हिम्मत से लड़ें, प्रेम करें तो जी भर कर करें और पीछे ना आएँ। और अगर कोई बदला लेने की सोचे, पागल बनाए तो उसे अपनी क़ाबिलियत से तमाचा मारें, उसे नंगा करके समाज के सामने फेंक दें और पूछें, “क्या कहना है? साल भर से कहाँ गायब हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?”….

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