वामपंथी नेतृत्व चुने हुए प्रधानमंत्री को बम से उड़ाकर लोकतंत्र को बचाना चाहता है!

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नमस्कार,

मैं वामपंथी पत्रकार!

आपलोगों ने आज एक चिट्ठी पढ़ी होगी जो देश की सबसे हिंसक और आतंकी विचारधारा के पोषितों के पास से मिली। न सिर्फ़ एक प्रतिबंधित संगठन अपने साल भर के गोला बारूद के लिए करोड़ों रुपए के इंतज़ाम की बात करता दिखा, बल्कि देश को बचाने के नाम पर राजीव गाँधी की हत्या के तरीके को अपनाते हुए, मोदी को किसी रोड शो के दौरान बम से उड़ाने की बात बहुत ही सहजता से कह दी है।

आख़िर कम्यून की बात करने वाले, जिनका प्रभावक्षेत्र लगातार सिमटता जा रहा है, वो लोकतंत्र में क्यों यक़ीन रखेंगे? उनके लिए तो सच वही है जो वो मानते हैं। चूँकि उनका कोई कॉमरेड अपनी पार्टी का संविधान और पार्टी लिट्रेचर पढ़ लेता है तो वही परम सत्य हो जाता है क्योंकि उससे बाहर जो भी है, वो झूठ है। 

परसों पुणे पुलिस द्वारा पाँच वामपंथी आतंकी पकड़े गए थे, जिन्होंने न सिर्फ़ दलित अधिकारों की बात करने वाले एक्टिविस्ट का मुखौटा ओढ़ रखा है बल्कि वो हर आतंकी मित्र को बताने के लिए हर संभव प्रयास करते दिखते हैं। इनके कई साथी अलग-अलग राज्यों की हवालातों में देशविरोधी आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के कारण सड़ रहे हैं। लेकिन तंत्र पर इनके पुराने इन्वेस्टमेंट के कारण थोड़ी जान अभी भी बाकी है, और अंत समय में ये ज़ोर लगा रहे हैं। 

हलाँकि जिस हिसाब से सब चल रहा है, इनको कुछ फायदा होने से रहा। ग़ज़ब की बात यह भी है कि दलितों और आदिवासियों को अपने निजी स्वार्थ के लिए उकसाकर मारने वालों ने उसी चिट्ठी में उनके हितों की बात की है और कहा है कि वर्तमान सरकार उन्हें तबाह कर रही है। और अंत में बेचारे ये भी कह गए कि जो भी हो, पार्टी सर्वोपरि है, आदमी नहीं। शायद इसी कारण कोरेगाँव और उत्तर भारत में हुए दलित आंदोलन में 12 लोग पार्टी और विचारधारा की बलि चढ़ गए।

यही कारण है कि ये भीमा कोरेगाँव में हिंसा कराते हैं और झूठी अफ़वाह फैलाकर इन्हीं दलित और आदिवासियों को मरने के लिए छोड़ देते हैं ताकि इनकी पार्टी का नाम हो और लगे कि इनकी विचारधारा ज़िंदा है। इनकी विचारधारा अब महज़ तीन-चार कॉलेजों में सिमट कर रह गई है जहाँ के चुनावों को जीतकर ये बराबर बताते हैं कि देश का युवा क्या चाहता है। बाद में इन पार्टियों के छात्र नेता सीडी देने के बहाने लड़कियों को कमरे में बुलाकर बलात्कार करते हैं। 

बलात्कारों से याद आया कि जेएनयू जैसी संस्थाओं में इन्होंने लड़कियों को हमेशा अपने विरोधियों के लिए इस्तेमाल किया है। न सिर्फ विरोधी पार्टियों के प्रत्याशियों पर सेक्सुअल ऑफेन्स के चार्जेज़ लगवाए हैं, बल्कि ब्लैकमेलिंग का सहारा लेकर कई बार उन्हें चुनाव न लड़ने पर मजबूर किया है। ‘तुम्हारा देह पार्टी की संपत्ति है’, ऐसी दार्शनिक लगने वाली बातें कहकर सीधी-साधी लड़कियों का शारीरिक शोषण इन छात्र चुनावों वाली पार्टियों की पहचान है। 

इन्हीं विश्वविद्यालयों में सुदूर प्रदेशों से आई सीधी लड़कियों का शारीरिक शोषण और बलात्कार इनके नेता लगातार करते रहे हैं और जब तक लड़की को होश आता है तब तक वो न तो घरवालों को कुछ कहने लायक रहती है, न ही उसके पास पुलिस के पास जाने का विकल्प होता है क्योंकि इन्हें ‘इज़्ज़त’ के नाम पर ब्लैकमेल करने की धमकी दी जाती है। साधारण परिवारों से आई लड़कियों को ये अपना शिकार बनाते रहते हैं, और एक घटिया, हिंसक और अप्रासंगिक विचारधारा के इंधन के रूप में इनके शरीर का इस्तेमाल होता रहता है। 

जब विचारधारा का स्तर इतना गिरा हुआ हो, पार्टी फ़ंड और आतंकी गतिविधियों के लिए धन की लगातार कमी हो रही हो, अपने विचारधारा की सरकारें देश और दुनिया से गायब हो रही हों और इनके द्वारा हथियाए इलाकों को सरकार लगातार वापस अपने नियंत्रण में ले रही हो तो इनका कुलबुलाना लाज़मी है। अब इनका प्रभावक्षेत्र बस चंद पेपरों के कॉलम लिखने और टीवी पर आने वाले पतित पैनलिस्टों के रूप में सिमट गया है। थोड़े बहुत वो बचे हैं जो ख़ुमारी में फ़ेसबुक पर समर्थन में लिखकर इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी तलाशते रहते हैं। 

जब विचारधारा के अस्तित्व पर इस तरह के प्रश्नचिह्न लगते हों तो ज़ाहिर है कि पार्टी के संविधान की माला जपने वाले लोग, किसी सीधे-साधे पार्टी मेम्बर के गले में बम बाँधकर मोदी के पास भी भेज सकते हैं। जिस तरह का मानसिक दिवालियापन इनके काडरों में दिखता है, उससे लगता है कि खुद को उड़ाने वाले बहुतेरे मिल जाएँगे। 

हम उस देश में हैं जहाँ इस चिट्ठी को भी शायद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान ली जाए। ये कहा जा सकता है कि उन्होंने तो बस लिखा ही है कि जान ले ली जाए। ऐसे लिखने वाले तो रोज ही फेसबुक पर धमकियाँ देते रहते हैं। कुछ लोग ये कह देंगे कि ये चिट्ठी सरकार ने प्लांट करवाई है इन्हें फँसाने के लिए। कुछ कह देंगे कि ऐसी कोई चिट्ठी है ही नहीं, ये भाजपा आईटी सेल का कमाल है जिसने पुलिस को बोला कि इसे लीक कर दे। ये वही लोग हैं जो गौरी लंकेश की हत्या के आधे घंटे बाद बता चुके थे कि हत्या किसने की। 

आपके दोस्तों में भी ऐसे हिंसक और आतंकी लोग होंगे। उन्हें पहचानिए। अगर वो नया-नया वामपंथी बना है तो उसे बाहर निकालिए। अगर वो घाघ है तो उसे ब्लॉक कीजिए या रोज घेरकर सवाल कीजिए कि उसके बाप, चाचा और दादा लोग कब ये हिंसा की राजनीति छोड़ेंगे। आख़िर किस लोकतंत्र की बात हो रही है कि बहुमत से चुनी पार्टी और प्रधानमंत्री की हत्या की बात की जा रही है उसे बताने के नाम पर? 

आख़िर किस ज़माने में रह रहे हैं हम कि संवैधानिक तरीके से प्रधानमंत्री बने शख़्स या उसकी पार्टी की विचारधारा को दबाने के लिए प्रधानमंत्री की हत्या का षड्यंत्र रचा जा रहा है? चुनावों में तो सबके रास्ते खुले हुए हैं, अगर ये लोग दलितों और आदिवासियों के हिमायती हैं तो ऐसे राज्यों और इस देश में उनकी सरकार क्यों नहीं बनती? देश में तो तीन-चौथाई आबादी दलितों और आदिवासियों की ही है, इनके सांसद विलुप्तप्राय प्रजाति क्यों हो गए हैं?

ज़ाहिर है कि जिन जंगलों में इन्होंने आदिवासियों और दलितों को फुसलाकर उन्हें अपनी ढाल बनाकर रखा हुआ है, वहाँ विकास तो होने नहीं दे रहे। सड़के बनाने वालों को नरसंहार में मार देते हैं। सुरक्षाबलों को एम्बुश कर देते हैं। शिक्षकों को पढ़ाने नहीं देते। गोली के दम पर महिला कार्यकर्ताओं का लगातार बलात्कार करते हैं। ऐसे लोगों को कोई आदिवासी या दलित क्यों वोट देगा?

इनके पत्रकारों और पुरुष कार्यकर्ताओं पर बलात्कार और यौनशोषण के इल्जाम लगाने वाली लड़कियाँ आपको मिल जाएँगी अगर आप खोजें तो। इनके चंगुल से भागी महिलाएँ, जो पार्टी के लिए समर्पित थीं, तन तक के स्तर तक, उसका इस्तेमाल सिर्फ सेक्स के लिए क्यों होता है इन जंगलों में? जो बाहर आना चाहती है उसकी हत्या क्यों कर दी जाती है? 

जंगलों में माओ और लेनिन की ये नाजायज़ औलादें आख़िर कौन-सी व्यवस्था चलाते हैं जहाँ महिलाओं को सेक्स स्लेव्स की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जिन आदिवासियों के अधिकारों की बात करते हुए ये वर्तमान सरकार को फासीवाद बताते हैं, उन्हीं के घरों में घुसकर ये बलात्कार और हत्याएँ क्यों करते हैं?

ये घटिया लोग हमें वैचारिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाएँगे? ये बताएँगे कि लोकतंत्र कैसे चलना चाहिए? आतंकियों को बाहर निकलवाकर, समानांतर सेना बनाकर, ये उन तमाम इलाकों को विकास के नक़्शे पर नहीं आने देना चाहते, जहाँ ये सालों से रह रहे हैं। अब यहाँ सुरक्षा बल एक तय योजना के तहत घुसकर इन सूअरों को मार रही है, और इलाकों को इन घृणित आतंकियों के क़ब्ज़े से छुड़ा रही है, तो दर्द तो होगा ही।

यही कारण है कि इन्हें लगता है कि हड़बड़ाहट में मोदी को मार देने से भी इनकी विचारधारा बची रह जाएगी। किसी को मारना बहुत ज़्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि दो बोतल दारू और आधा किलो मुर्गा पर हर वामपंथी बिकने को तैयार हो जाता है। मैंने देखा है अपने आदर्शवादी वामपंथी मित्रों को विचारधारा की टाइट लंगोट को पैसों के लिए उतारकर फेंकते हुए। 

इनके सुसाइड बॉम्बर को दारू और मुर्गा दे दो तो भी तैयार हो जाएगा। वो तो इतने में भी मान जाएगा कि आधा काम होने के पहले, आधा काम होने के बाद! सेक्स ऑफ़र कर दो तो अपने परिवार को भी कन्विन्स कर लेगा साथ जाकर सुसाइड बॉम्बिंग को अंजाम देने के लिए। ये तो इतने छिछले, गिरे और बेकार के कार्यकर्ता होते हैं कि इनको बहत्तर हूरों के मिलने का भी पाठ पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। 

अस्तित्व पर आ रहे संकट और फ़ंड की इतनी कमी है वामपंथियों में कि सनी लियोनी की पोस्टर ख़रीदकर देने के वायदे पर भी इन लोगों को मोदी को बम से उड़ाने के लिए तैयार किया जा सकता है। 

नमस्कार। 

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