गोरी चमड़ी पर दाग दिखते हैं, काले-भूरों पर तो ख़ून भी खो जाता है

क्या हुआ लंदन वालो, आहत हो? संवेदनाएँ मिल गईं राष्ट्राध्यक्षों की? आतंकी को पकड़ भी लिया? फेसबुक से फ़िल्टर बदलवाए कि नहीं, यूरोपियन देश हो तो फ़िल्टर तो बदलने का ऑप्शन आना ही चाहिए। काले-भूरे लोगों का देश थोड़े ही हो।

भारत वाले कब से कह रहे थे कि भाई आतंकवाद है, आतंकवाद है! कहते रहे कि पाकिस्तान में गढ़ है लेकिन तुमने उसे ‘कॉन्फ्लिक्ट’ कहा और बदले में पाकिस्तान को अरबों डॉलर का ग्राँट देते रहे। भारत वालों ने संसद हमले पर कहा, मुंबई अटैक पर कहा, सरोजिनी नगर, अजमेर, मुंबई ट्रेन ब्लास्ट पर कहा कि पाकिस्तान से जिहादी, रेडिकल इस्लामी आतंक आ रहा है, और तुम कहते रहे कि ये आपसी झगड़ा है।

अब ये आलम है कि कभी सलमान अबेदी, कभी ख़ालिद मंसूर लंदन में हमले करता है, तो कभी ओरलैंडो गे बार में कोई अल्लाहु अकबर करता गोलियाँ बरसाता पचास लोगों को मार देता है। फिर कभी नीस में हमले होते हैं, कभी बेल्जियम में। कभी डैलस में, तो कभी पेरिस में। अगर अमेरिकन लोन वूल्फ अटैक टेरर डेटाबेस की मानें तो 2000 से अबतक क़रीब 58 हमले अकेले आतंकियों ने अंजाम दिए और इसमें 169 जानें गईं और 258 घायल हुए। ये सारे हमले यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों पर हुए।

लेकिन तुम रटते रहे कि नहीं, नहीं ये सब तो छिटपुट मामले हैं। और तो और तुमने इंटरनेट पर भी ये माहौल बना दिया है कि आतंकी हमले तो जब अमेरिका का ट्रेड सेंटर गिरा तभी से माना जाय। गूगल पर ‘टेरर अटैक’ लिखिए, तो सबसे पहले 9/11 का ही सजेशन आता है मानो उससे पहले कभी हमला हुआ ही ना हो। हो सकता है अल्गोरिदम भी गोरे लोगों की मौत को ज़्यादा तरजीह देता हो।

फिर अगर आप विकिपीडिया पर ‘टेरर अटैक इन …’ करके देशों के नाम देकर खोजेंगे तो यूरोपीय देशों में हुई आगज़नी से लेकर, दो गुटों के बीच के संघर्ष का आँकड़ा मिल जाएगा और वो भी 1800 से लेकर आजतक का। वही हाल अमेरिका का भी है। लेकिन भारत के नाम आपको ये आँकड़ें 1970 के बाद से मिलेंगे। और उसमें भी अगर आपको हमलों के नाम और बाक़ी जानकारी चाहिए तो 1984 के बाद से आँकड़े मिलेंगे।

जब बात आँकड़ों की हो ही रही है तो भारत में 1970 के बाद से 2015 तक कुल 9,982 आतंकी घटनाओं में 18,842 मौतें हुईं, 28,814 लोग घायल हुए। अगर 1984 से 2016 तक के आँकड़ें लें तो क़रीब 80 आतंकी हमलों में 1985 मौतें हुईं, और लगभग 6000 से ज़्यादा घायल हुए। अगर और क़रीब के दिनों को लें, तो 2005 से अब तक हुए आतंकी हमलों में 707, मौतें हुईं, और 3200 के क़रीब घायल हुए हैं।

अब आईए यूरोप पर जहाँ, तुर्की और रूस को छोड़कर, आतंकी हमलों में 2004 से अब तक 615 मौतें हुईं और 4000 के लगभग लोग घायल हुए। अमेरिका में 2000 से अबतक क़रीब 3188 मौतें हुईं जिसमें से 2996 लोग सिर्फ 9/11 वाले हमले में मारे गए। यानि, बाक़ी के हमलों में 192 लोग मरे। अमेरिका के लगभग 90% से ज़्यादा हमलों में ईकाई अंकों में मौतें हुई हैं। यूरोप में आतंकी हमले भी 2004 के बाद से ही शुरू माने जा सकते हैं, क्योंकि उससे पहले वो वैश्विक आतंकवाद से पीड़ित नहीं दिखते।

अब आप इन मौतों को आँकिए। जो अमेरिका मानवाधिकारों की रट लगाते कहीं भी पहुँच जाता है, क्या उसके वश की बात नहीं थी इस वैश्विक ज़हर को फैलने से पहले ही रोक देना? क्या यूरोप के नेता इस कैंसर की पहचान नहीं कर पाए थे? या फिर उनके पास इंतज़ार करने का समय था क्योंकि काले-भूरे ही तो मर रहे थे जो चूहों की तरह जनन करते हैं?

इसीलिए, जब इन हमलों में कोई विदेशी मरता है तो मेरी संवेदना पक्षपात करती है। मेरे देश के कई हज़ार लोग बच सकते थे, बच सकते हैं, अगर ये तथाकथित बड़े राष्ट्र अपनी स्वार्थपूर्ति, तेल व्यापार और हथियारों की बिक्री के लिए, इन लोगों की बलि चढ़ने से रोक लें। लेकिन नहीं, इनके यहाँ मौतें अभी भी ईकाई अंकों में होती हैं। ये अभी भी बच जाते हैं, क्योंकि इनका इंटेलिजेंस बेहतर है।

लेकिन लोनवूल्फ के दौर में इंटेलिजेंस कितना काम आएगा, ये तो वक़्त ही बताएगा। फ़िलहाल अपनी संवेदनाओं का कोटा पूरा कीजिए और अगर फ़िल्टर चेंज कर पा रहे हों तो कर लीजिए।….

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