हारनेवालों के पुराने राग घिसकर फट चुके हैं

तथ्य यह है कि भाजपा हार गई है। भाजपा अपने घर में हारी है। भाजपा वहाँ हारी है जहाँ उसकी जीत तय मानी जा रही थी, राजस्थान को छोड़कर। ये सारी बातें सत्य हैं। लेकिन दूसरा सच यह भी है कि 2004 के आम चुनावों से पहले कॉन्ग्रेस इन तीनों जगहों पर हारी थी, लेकिन लोकसभा चुनाव जीत गई। यह भी सच है कि कई बार लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोटिंग का पैटर्न बदल जाता है। 

कुछ लोग ये सब बकवास कर रहे हैं कि ‘कॉन्ग्रेस की जीत नहीं, भाजपा की हार है’, ‘भाजपा का वोट प्रतिशत कॉन्ग्रेस से ज़्यादा है’, ‘नोटा के कारण भाजपा हारी है’, ‘लोगों ने साबित कर दिया कि वो कितने बड़े मूर्ख हैं’ आदि। इनका मतलब क्या है? इन बातों का मतलब होता क्या है? इससे क्या बदल जाता है आखिर? 

जहाँ कॉन्ग्रेस जीती है, और जहाँ सरकार बना रही है, वहाँ उसने सीधे सेंध मारी है। वो उसकी जीत कैसे नहीं है? जीतना किसको कहते हैं? यही जीत है। जीत जब अरुणाचल में सरकार बनाना है, जब कर्नाटक में सरकार बनाना है, ढाई साल बाद बिहार में सरकार बनाना है, पूरे नॉर्थ ईस्ट में सरकार बनाना है, तो फिर राजस्थान और मध्यप्रदेश भी जीत है। उनको हार पर चर्चा करनी होगी तो वो सोचेंगे कि तेलंगाना और मिज़ोरम में उन्होंने क्या किया। इसलिए ये बेकार की बातें तो मत ही कीजिए कि उसकी जीत नहीं, इसकी हार है। 

लोकतंत्र है तो लोग ही चुनेंगे। चाहे लोगों ने लालू को सत्ता दे दी, या फिर कॉन्ग्रेस को, आम जनता को ब्लेम करना या उन्हें मूर्ख बताना आपकी समझ पर सवाल उठाता है। आम जनता को उन बातों से मतलब होता है जो उनके जीवन पर तात्कालिक प्रभाव छोड़ती है। उसे महँगाई, रोजगार, भ्रष्टाचार से मतलब है। उसे इस बात से मतलब है कि उसके धार्मिक हितों की रक्षा सत्ता में आने के बावजूद क्यों नहीं हो रही।

आम जनता को ये जानना है कि आखिर वाड्रा का नाम चुनावों में ही क्यों लिया जाता है जबकि सारी एजेंसियाँ आपके लिए काम कर रही हैं। आप हर बात का ज़िक्र भर करके कब तक जनता को पागल बनाते रहोगे? 

और जब जनता जवाब देती है तब आप जनता को कोसने लगते हैं! ये किस तरह का समर्थन है? अगर किसी भी पार्टी या विचारधारा को समर्थन देते हैं तो एक-सी स्थिति बनाकर रहिए। कल तक ईवीएम हैक हुआ करता था तो आज भी रोइए, नहीं तो पाँच महीने बाद फिर मत रोने लगिएगा। अगर राहुल गाँधी एक नॉन-इशू को इतनी बार बोलता है कि वो भ्रष्टाचार का मुद्दा हो जाता है, तो आपको ये देखना चाहिए कि आपने कितनी बार इस बात पर लिखा, बोला या किसी से बात की?

आप तो तुरंत सरकार और विचारधारा का समर्थन त्यागकर, सत्य जानते हुए, धर्मराज बनने लगते हैं कि ‘अगर कोई पूछ रहा है तो सरकार को बताने में क्या हर्ज है’। क्या ये तरीक़ा है समर्थन देने का, और बाद में रोते रहिए कि आपकी पार्टी हार गई। ये तो उन्हीं के हाथों खेलने जैसा हुआ कि बाउंड्री लाइन पर बैठे लोग नोटा दबाकर चले आए। 

इसलिए, बेहतर यह होगा कि अपनी ज़मीन तलाशिए। मोदी प्रधानमंत्री है, और राज्यों में पार्टी के लोग स्वयं ही अपने नेताओं की जड़ें खोदने में लगे पड़े हैं। मोदी हर जगह जाकर डैमेज कंट्रोल नहीं कर सकता। जो वोट देने खुद नहीं जाते, वो नोटा का राग छेड़कर बहुतों को प्रभावित कर रहे हैं, कि अपनी शक्ति दिखाओ। लेकिन किसको दिखा रहे हो? उसका परिणाम क्या रहा?

परिणाम यह रहा कि वैयक्तिक रूप से नकारने के चक्कर में सामूहिक रूप से तुमने उन्हें सत्ता दे दी जो तुम्हारा बंटाधार कर देगा। बंटाधार इसलिए करेगा क्योंकि इनका इतिहास बंटाधार करने का ही रहा है। यही जनता एक बार अकर्मण्य और एक बार समझदार नहीं हो जाती। जनता हमेशा अपना फायदा देखेगी। लेकिन हम और आप जैसे लोग, जिनके विचारों से शायद दो लोग प्रभावित होते हैं, वो अगर चोरों के साथ हो जाएँगे तो वही होगा जो हुआ है। 

ये होना भी ज़रूरी था क्योंकि निरंकुश सत्ता मदमस्त हाथी की तरह होकर अपनों को ही रौंदने निकल जाती है। शायद पार्टी के नेता अब इस बात पर गौर करेंगे कि आयुष्मान योजना के बजट के लिए पैसे जुटाने के चक्कर में पेट्रोल को नब्बे तक पहुँचाना एक गलत निर्णय था, शायद अब वो यह बात देखेंगे कि जिस आग पर सुप्रीम कोर्ट ने ढक्कन रखा था, उसमें होशियारी दिखाने की ज़रूरत नहीं थी। 

अगर धर्म की बातों पर अमल नहीं कर सकते, तो उन्हें चर्चा का विषय मत बनाओ। मंदिर नहीं बना सकते तो राम की भव्य प्रतिमा का झुनझुना मत बजाओ। वाड्रा को गिरफ़्तार नही कर सकते, तो उसकी बातें मत करो। जो 60 साल बनाम 60 महीने की बात की थी, उसके 55 महीने निकल गए। इनमें तुमने बहुत कुछ किया, उसे बताओ और दोहराओ। 

राजनैतिक चर्चा का स्तर गिराकर गोत्र और जाति का निर्धारण करने की बजाय जनता पर छोड़ दो कि वो चुने कौन किसके हित में है। विकास अगर मुद्दा है, तो विकास ही मुद्दा रहे। चुनावी सभावों में ‘मेरी माँ को गाली दी, मेरे बाप को गाली दी’ करने से बेहतर है कि उन बातों पर कुछ कहा ही न जाए। लोगों को जो कहना है, कहने दो। अपनी चर्चा का स्तर तो मत गिराओ कि सामनेवाले चिरकुट को भी ये कहने का मौका मिल जाए कि देखो प्रधानमंत्री क्या कह रहा है। 

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