आत्माओं के एकरूपता की अभिव्यक्ति है प्रेम

बहुत कम जीव हैं जो प्रेम नहीं करते। मानवों ने कविता-कहानियों के ज़रिए लाखों कहानियों को सँजोए रखा। सारे प्रेम अलग, सारे प्रेम की अभिव्यक्ति अलग। क्रिया वही, क्रियान्वयन अलग। हर जीव का प्रेम उसका अपना और अनोखा होता है। 

प्रेम हर्ष भी लाता है, विषाद भी। प्रेम करूणा भी है, वात्सल्य भी। प्रेम शहद भी है, निबोरी भी। प्रेम एक भाव नहीं, वह कई जटिल भावों के सरलतम बहाव की परिणति है। प्रेम अगर एक भाव भी कहा जाए तो भी वो उस मज़बूत रस्सी की तरह है जिसके रेशे बेहद कोमल, मुलायम और क्षणभंगुर होते हैं। इन रेशों की, सूक्ष्म भावों की प्रकृति भले ही कोमल, मुलायम और क्षणभंगुर हो, लेकिन वो जब टूटने से रह जाते हैं तो मज़बूती आती है। 

आपके एक भाव को, एक बात को आपके प्रेमी का दूसरा भाव, उसकी दूसरी बात संबल देती है, थामती है। इसी समरसता को, परस्पर सहयोग के कारण उस रस्सी का निर्माण होता है जो आप दोनों के ही अस्तित्व का आधार बन जाता है। पहले रेशे की प्रकृति को समझे बिना आचरण करने पर परिणामस्वरूप बनने वाली रस्सी की चाह रखना मूर्खता है। 

प्रेम हमें अंततः एक बनाता है, एक-सा बनाता है। इसका रास्ता हर बार अलग हो सकता है, लेकिन अपना रूप त्यागकर, दूसरे का रूप ले लेना ही प्रेम है। प्रेम में आप सिर्फ़ सामने वाले को खुश देखना नहीं चाहते, प्रेम में आप उस स्थिति में पहुँचना चाहते हैं जहाँ आप वैसा महसूस कर सकें जैसा आपका प्रेमी करना चाहता है। 

प्रेम में स्वार्थ बहुत ज़रूरी है क्योंकि स्वार्थ ही आपको अपने प्रेम की पराकाष्ठा की तरफ़ ले जाने का ज़रिया है। स्वार्थ यह है कि जब आप उसकी खुशी चाहते हैं, तो उस खुशी का परिणाम आपको खुशी देता है। अंततः दूसरे के लिए कुछ करना, हो जाना, हो जाने की कोशिश करना स्वयं की ही खुशी के लिए है। और ये दोनों तरफ़ से होता रहता है, होते रहना चाहिए। 

इसमें पलड़े नहीं हैं कि इसके काँटे को बीच में रखना है। ये कोई तराजू का दंड नहीं कि ऊपर-नीचे होने से बचने के लिए दोनों तरफ़ से ‘कुछ’ रखा जाए। नहीं, इसमें जब तक ‘दो’ की स्थिति है, तब तक समस्या है। इसमें हमेशा एकरूपता का प्रयास होना चाहिए। 

दो अलग प्रकृति के जीव जब एक साथ रहेंगे तो ज़ाहिर तौर पर बातें भी दो होंगी, प्रयोजन भी दो होगा, क्रिया भी दो तरह से होंगी। शुरुआत से ही इस बात को समझना कि लक्ष्य एक है, तो प्रयास भी वैसे भी होना चाहिए ही आपको उस स्थिति में पहुँचाएगा जहाँ आपको फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। कई जगहों पर हमें लगता है कि ‘समझौते’ ज़रूरी हैं। मुझे लगता है कि समझौते कभी भी एकतरफ़ा नहीं होने चाहिए। वो इसलिए कि समझौते में दो लोगों का होना आवश्यक है। 

अकेले मन को बाँधे रखकर ज़िंदगी जीने से बेहतर है कि अपनी बात कही जाए और फ़ैसले साथ लिए जाएँ। वरना एक दिन ऐसा आता है कि आपको याद दिलाया जाएगा कि सामने वाले ने कितने समझौते मन में ही कर रखे हैं, और आपसे पूछा जाएगा कि आपने कितने किए। 

प्रेम में दुकानदारी नहीं होती इसलिए लेन-देन, तराजू, मैंने किया-तुमने क्या किया आदि का स्थान नहीं होता। आप तलाश लीजिए ऐसे लोग, वो अभी भी एक दूसरे को गिनाते हुए जीवन काट रहे होंगे, या गिनाकर टूट चुके होंगे। 

प्रेम महज़ साथ होना नहीं, साथ चलना भी है। प्रेम की सबसे बड़ी ज़रूरत ‘स्वीकार्यता’ है। दो अलग लोगों को, एक दूसरे की प्रकृति के साथ अपनाना एक अनिवार्यता है। सामनेवाले की कमियाँ और ख़ूबियाँ, दोनों ही, अब आपके हैं। अगर आप उसे दूर करने में सक्षम हैं तो कर दीजिए, लेकिन उसे इतना मत धकेलिए कि कमियों के साथ इन्सान भी दूर हो जाए। 

ज़रूरी नहीं कि दो ‘परफ़ेक्ट’ लोग ही प्रेम करें या फिर प्रेम में लोग परफ़ेक्ट हो जाते हैं। बिलकुल नहीं। दो बिखरे हुए लोग, दो चोर, दो असफल और गिरे हुए लोग भी प्रेम करने में सक्षम हैं। प्रेम में लोग एक जगह ठहरते हैं, जहाँ दोनों को आराम मिलता है। प्रेम में ऊपर से चिल्लाने की बात नहीं होती कि तुम यहाँ तक क्यों नहीं आते। 

जब आप साथ होते हैं तो आप एक अलग स्तर पर बातें करते हैं। यहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, आप सोचते हैं और वो जानता है। आपको अपने करने का परिणाम पता होता है। आप जानते हैं कि आपका एक क़दम सामनेवाले को किस स्तर तक प्रभावित कर सकता है। 

इस स्तर तक आप बहुत कम बार, ज़्यादातर संबंधों में क्षणिक रूप में पहुँच पाते हैं। जिनकी ये गुत्थी सुलझ जाती है, वो समान लक्ष्य के साथ साथ-साथ हो जाते हैं। यहाँ पहुँचना कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। जब हम अपने आप को, दोनों ही पक्ष में, समीकरण से बाहर रख देते हैं, तब एक दूसरे की संतुष्टि मात्र ही हमें खुशी देती है। यही खुशी है जिसकी तलाश हम सबको है। यही एक होने की प्रक्रिया है। दादू दयाल कहते हैं कि आशिक जब माशूक़ हो जाता है, वही इश्क़ है। यही आत्माओं का मिलन है। 

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