वामपंथियों का चुनावी विश्लेषण: अंधविरोध, घटिया और चिरकुटई से परिपूर्ण

 

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घृणा और अवसाद से ग्रस्त चुनाव विश्लेषकों के पोस्ट देखकर लगता है कि ऐसे विश्लेषण के लिए मानसिक विकलांगता के अलावा कुछ भी योग्यता नहीं चाहिए। इसमें आपको तथाकथित पत्रकार और येचुरीनंदन माओवंशी कामभक्तों के पोस्ट पढ़कर हँसी आएगी कि आख़िर इतना ज्ञान क्या दाढ़ी बढ़ाने भर से मिल जाता है!

एक महोदय जो डेक्कन हेरल्ड के पत्रकार हैं, बहुत कोशिश किए कि निष्पक्ष होकर विश्लेषण कर दें कि यूपी के निकाय चुनावों में भाजपा की जीत नहीं हुई है, फ़लाने प्रतिशत से निर्दलीय हर जगह जीते हैं, भाजपा को तो ‘बस’ 16 में से 14 मेयर की सीटें मिली हैं।

‘बस’ 16 में से 14 मेयर की सीटें! अगर कोई पार्टी चुनाव हारने के बावजूद मेयर का पद पा जाती है, तो तमाम पार्टियों को चुनाव हारकर भी प्रधानमंत्री का पद पाने की जुगत भिड़ानी चाहिए। मेरी राजनीतिक समझ तो यही कहती है कि ‘पावर’ में होना ज़रूरी है, चाहे आप निर्दलीय पार्षदों की मदद से वहाँ पहुँचे हों, या किसी और से।

बेचारे पत्रकार (ऐसे पत्रकार बेचारे ही होते हैं) दूसरे पत्रकारों को गरियाते हुए शुरु करते हैं कि किसी को भी चुनावों की समझ नहीं है और भाजपा नहीं जीती है कहीं भी। फिर आँकड़ों को टॉर्चर करते हुए अपनी बात मनवा लेते हैं कि निर्दलीय प्रत्याशियों के चुने जाने का प्रतिशत इतना से इतना हो गया है। ये बात और है कि एक थोड़ा-सा जागरूक आदमी भी ये जानता है कि निकाय और पंचायत आदि के चुनावों में भाजपा-कॉन्ग्रेस से कहीं ज़्यादा स्थानीय चेहरों और मुद्दों को लोग वोट देते हैं।

ये प्रतिशत वाला खेल वैसा ही है जैसा कि बेचारे आज तक लोगों को ये कहकर बहलाते रहते हैं कि मोदी तो मात्र 31% वोट लेकर सत्ता में आ गया, 69% ने तो उसे वोट नहीं दिया। जैसे कि भारत में टू-पार्टी सिस्टम है, और मोदी को सत्ता दान में मिल गई! या फिर ये कि यूपीए, टीएमसी, वामपंथी सरकारों को इस देश में हमेशा 50% वोट शेयर मिलता रहा है। ये चिरकुटवृंद, खासकर झोलाछाप कामपंथी, आधी बात बताकर ही खेलते हैं, क्योंकि जो इनसे उलझते हैं उनको बाकी की आधी बात पता नहीं होती। ये उसी अनभिज्ञता को फ़ायदा उठाकर बॉन्ड बने फिरते हैं।

लेकिन जब ऐसे अंधविरोधियों के हाथों में बटेर लग जाता है तो वो खुद को शिकारी समझने लगते हैं। दाढ़ी बढ़ाकर चुनावी विश्लेषक और बुद्धिजीवी बनने की परंपरा यूँ तो पुरानी है लेकिन आज के दौर में ये लोग अपनी जमात में छुप नहीं पाते क्योंकि भक्त लोग उनकी लंगोट के सिरे खींच कर उन्हें नीचे की दाढ़ी समेत नंगा कर देते हैं। कारण बस इतना है कि जितनी सूचना पर इन कामरेडों का एकछत्र एक्सेस था, वो अब भक्तों के रेंज में भी उपलब्ध है। अब ये नंगापन जल्दी ही अपनी परतें गँवाकर बाहर आ जाता है।

ऐसे चिरकुट विश्लेषक जो ‘चप्पा-चप्पा, भाजप्पा’ काल में अपनी पहचान किसी भी क़ीमत पर तलाशते दिखते हैं, वो ‘नाया जोगी, गाँड़ में जट्टा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। इस कहावत का शाब्दिक अर्थ ये है कि जो नया जोगी/साधु बनता है वो सिर के साथ-साथ अपने गुप्ताँगो के पास भी जटाएँ बढ़ा लेता है।

आगे ऐसे विश्लेषणों में महोदय ये फ़रमाएँगे कि अखिलेश-मायावती तो प्रचार में भी नहीं उतरे! वाह! क्या लॉजिक है। जैसे कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग ने ये आदेश दिया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों के द्वारा चुनाव प्रचार में उतरना असंवैधानिक है। या कुछ ऐसा कहा गया हो कि अगर निकाय चुनावों में प्रचार किया तो इज़्ज़त चली जाएगी!

यहाँ मूल उद्देश्य शक्ति को बटोरकर, संगठित होना है। आज जब पूरा विपक्ष संगठित होकर भी एक चेहरा नहीं तलाश पा रहा, वहीं राष्ट्रीय से लेकर ग्रामीण राजनीति तक भाजपा अपने वोटरों को इकट्ठा कर रही है। इस कार्य के दूरगामी परिणाम होंगे। भले ही दिल्ली में स्थानीय नेताओं की जगह कैबिनेट को उतारकर भाजपा ने एक बार ग़लती कर ली, लेकिन हर बार नहीं।

भाजपा का उद्देश्य, जो कि हर पार्टी का होता है, या होना चाहिए, ये है कि वो हर जगह पर अपनी उपस्थिति दर्ज करे। चुनावों के प्रचार में ज़मीनी स्तर के, सबसे छोटी ईकाई यानि वोटर को, लोगों तक विकास कार्य पहुँचाना ही सबसे सीधा तरीक़ा होता है। अगर पंचायत के प्रतिनिधि, निगमों के पार्षद सड़कें सपाट कर दें, स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधार दें, अस्पतालों की स्थिति ठीक कर दें, तो भला भाजपा को प्रचार करते समय ज़्यादा कोशिश क्यों करनी पड़ेगी!

आगे विष-लेषक महोदय ये भी कहते फिर रहे हैं कि ये स्थानीय चुनाव हैं और इनसे ज़्यादा मतलब नहीं निकालना चाहिए। ज्यादा मतलब नहीं निकालना होता तो वो स्वयं ही आँकड़ों का सहारा लेकर ये बात साबित करने में नहीं जुटे होते कि भाजपा हार गई, कि निर्दलीय जीत गए। ऐसे घटिया और मोटिवेटेड विश्लेषणों की जड़ में सिर्फ़ यही सोच होती है कि किसी भी तरह एक पार्टी को डिस्क्रेडिट कर दिया जाय कि कोई लहर नहीं है, भाजपा की जगह तो निर्दलीय जीत रहे हैं आदि।

किसी ने कमेंट किया कि उनके आर्टिकल का टोन निष्पक्ष तो बिलकुल नहीं था क्योंकि जेएनयू के चुनावों को वो राष्ट्रीय स्तर की महत्ता देते हुए आर्टिकल ठेलते पाए जाते हैं। तो महोदय का कुतर्क यहाँ आया कि ‘जेएनयू नगर निगम नहीं, सेंट्रल यूनिवर्सिटी है जहाँ देश के कोने-कोने से विद्यार्थी आते हैं’। ये वाक़ई कमाल की सोच है कि नगर निगम के चुनावों की महत्ता स्थानीय है, और यूनिवर्सिटी की राष्ट्रीय!

जबकि देखा जाय तो सिवाय उस कैम्पस के मुद्दों के, कि मेस का चार्ज कितना हो, फ़ीस कितनी हो, हॉस्टल में क्या सुविधाएँ हों, उन चुनावों की राष्ट्रीय तो छोड़िए, उसके गेट के आगे की सड़क पर भी कोई प्रासंगिकता नहीं होती। ऐसे चुनावों का नगर निगम तो छोड़िए, गाँवों के वार्ड कमिश्नर के चुनावों से भी बहुत कम महत्व होता है। इन्हें एक तराज़ू में रखना बकचोदी है, विश्लेषण और तार्किक संवाद तो बिलकुल नहीं।

मैं बार-बार ये कहता हूँ कि मुझे चुनावों की समझ नहीं है। वो मैं इसलिए कहता हूँ कि मैंने सिवाय डीयू के छात्र चुनावों और अपने गाँव के पंचायत चुनावों के, किसी भी चुनाव को न तो कभी गौर से पढ़ा, न ही वोट देने के अलावा मतलब रखा। न ही मैं कमरे में बैठकर अमेरिका के चुनावों पर अपनी प्रतिक्रिया की जगह विश्लेषण देता हूँ। ये विश्लेषण नहीं, हीनभावना से ग्रस्त लोगों का बौद्धिक टाइमपास है।

भारत के चुनावों में हर स्तर पर अलग राजनीति और मुद्दे होते हैं। सबको मोदी के लिए रेफरेंडम बनाकर देखना मूर्खता है। साथ ही, हर चुनाव के आँकड़ों को ‘भाजपा की लहर’ खोजने के परिपेक्ष्य में रखना, पोस्ट लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने भर का प्रयास है कि ‘भाई हम भी हैं विश्लेषक’, जबकि पता आपको घंटा नहीं है कुछ।

जो लोग अपने यूनिवर्सिटी के चुनावों में ओल्ड मोंक पीकर, लड़कियों को ताड़ते हुए, नशे में उसका फ़ायदा उठाने से लेकर हर तरह से वोट को ‘मैनेज’ करने की फेरे में रहे हैं, वो आजकल राजनैतिक लेख लिखते पाए जाते हैं। ये अपने गाँवों को देखने नहीं जाते, न ही स्थानीय चुनावों में वोट देते हैं, वोटर आईडी नहीं बनवाते क्योंकि इनका लोकतंत्र से विश्वास उठ चुका है। इनका एक्सपोज़र मेरे गाँव के चौक पर पान लगाते पनवाड़ी से भी कम है जो कम से कम अपने गाँव और प्रदेश की राजनीति की समझ तो रखता है।

ऐसे लोगों से सवाल पूछना चाहिए कि ये जो गलत जगह पर जटाएँ बढ़ा ली गई हैं, उसका क्या कारण है। क्या उससे परेशानी नहीं होती? या फिर जाँघिए के बाहर निकलती जटाओं को ये इंटरनेशनल फ़ैशन से जोड़कर देखते हैं कि हम तो यूनीक़ हैं, ये वाला फ़ॉल-विंटर कलेक्शन में आएगा!

ये विश्लेषक न सिर्फ अंधविरोध में खड़े हैं, बल्कि इनकी समझ में खोट और दोष भी है। स्थानीय चुनावों में जाकर कभी इन्हें देखना चाहिए कि वहाँ किस तरह की राजनीति होती है, और कितने लोग पार्टी के नाम के साथ लड़ते हैं। जिन्होंने कभी देखा ही नहीं, उन्हें कैसे पता होगा कि यही सारे निर्दलीय दो महीने में पार्टी की सदस्यता ले लेते हैं, और कुछ सालों बाद विधायिकी का टिकट लेने के लिए पार्टी ऑफ़िस के चक्कर काटते हैं।

इन्हें राजनीति कि इतनी समझ नहीं है कि निकाय और पंचायत चुनाव राष्ट्रीय स्तर तक के सफ़र तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है, वहाँ लोग पार्टी नहीं, अपने बूते पर चुनाव लड़ते हैं। ये उनके लिए स्क्रीनिंग टेस्ट की तरह होता है कि हमने तो खुद को साबित कर दिया, अब आप देख लो कि अगले चुनावों में हमें अपनी पार्टी में रखोगे कि नहीं।

यही कारण है कि निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे चुनावों में हमेशा बेहतर प्रदर्शन करते हैं लेकिन महापौर उसी पार्टी का पार्षद बनता है जो प्रदेश या देश की सत्ता में है। यहीं से नेता बनने का प्रोसेस शुरु होता है, यहीं से ख़रीद-बिक्री का सिलसिला चालू होता है। करप्शन का पहला क़दम भी नेता यहीं से लेते हैं।

यही कारण है कि इन चुनावों को समझदार लोगों की तरह देखना चाहिए कि यही चुनाव, और यहीं के मेयर, भाजपा की नींव बन रहे हैं, जो कि भविष्य की लम्बी पारी के लिए बहुत सहायक होगी। टीवी पर दिखने वाले नेता रैलियाँ करते हैं, स्थानीय नेता घर-घर जाते हैं, वोट माँगते हैं, छोटी सभाएँ करते हैं। इसी कारण से सबसे निचले स्तर पर अपनी उपस्थिति मज़बूत करना ज़रूरी और समझदारी भरा कार्य है। जो प्रचार में नहीं उतरे, वो जानते थे कि उनसे कुछ होगा भी नहीं।

इन चुनावों को ऐसे देखिए। और हाँ, ये याद रखिए कि मैं विश्लेषक नहीं हूँ, मैं बस सामान्य बुद्धि का प्रयोग कर रहा हूँ।

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