अय्यर अभिजात्य रंगभेद के पर्याय हैं, ये ‘उड़ता तीर’ राहुल की जनेऊ काट देगा

कॉन्ग्रेस की एक समस्या नहीं है, और यही कारण है कि देश एक बारगी कॉन्ग्रेसमुक्त ज़रूर होगा। फिर से रिवाइव कर जाए उसमें संदेह नहीं, क्योंकि मानवीय प्रकृति ही ऐसी होती है कि सत्ता पाने के बाद आदमी और पार्टियाँ जनता को कुछ ज्यादा ही हल्के में लेने लगते हैं।

पहली समस्या तो लीडरशिप का अभाव है जहाँ राहुल गाँधी के खिलाफ अध्यक्ष पद के लिए कोई बस नाम के लिए भी पर्चा नहीं भरता। जहाँ राहुल गाँधी दिशा और दशा निर्धारित कर रहे हों, वहाँ आज के दौर में पार्टी अपने स्थानीय नेताओं के ज़ोर पर कुछ प्रादेशिक चुनाव जीत सकती है, राष्ट्रीय तो बिल्कुल नहीं।

छवि बदलने की प्रक्रिया बहुत देर से शुरु हुई है, वो भी उस समय में जब नकली विडियो और फोटोशॉप के एक्सपर्ट विरोधी पार्टियों में बैठे हुए हैं। सामने वाली पार्टी पर छींटाकशी करते हुए, जनेऊ पहनकर हिन्दू बनने में राहुल गाँधी ने बहुत देर कर दी। साथ ही, मीडिया पता नहीं क्यों गुजरात चुनावों को रैलियों के भाषण से ज़्यादा नहीं बना पा रहा।

बनारस लोकसभा चुनावों में जब भाजपा ने राममंदिर का मुद्दा नहीं उठाया तो केजरीवाल और मीडिया ही भाजपा से पूछने लगी कि क्यों नहीं उठाया। राममंदिर का मुद्दा भाजपा के लिए बैकसीट ले चुका है, और वो अब इसे विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए प्रयोग में लाते हैं कि देखो वो धर्म की राजनीति करके हिन्दुओं को उकसा रहे हैं। गुजरात में इस बार २००२ की भी आहट नहीं दिखी, ये भी अपने आप में एक कमाल की ही बात है!

ख़ैर, मणिशंकर अय्यर और कपिल सिब्बल जैसे नेताओं ने भाजपा को खूब मदद पहुँचाई है। सिब्बल कर रहे हैं वकालत और राम मंदिर को 2019 चुनावों से जोड़ देते हैं। ये सब वो तब कर रहे हैं जब राहुल गाँधी के जनेऊधारी हिन्दू होने की बात डंके के चोट पर कही जा रही थी। राहुल गाँधी टेम्पल रन खेल रहे थे, और कपिल सिब्बल बीच में लँगड़ी मार गए!

ये सब आप उस आदमी के सामने कर रहे हैं जो ‘चाय वाला’ कहे जाने पर ‘चाय पर चर्चा’ करने लगता है, तथा ओबामा से लेकर इवांका तक से कहलवा लेता है कि भारत में चाय बेचने वाला भी पीएम बन सकता है। मोदी को इस विधा में महारत हासिल है। आप गाली दीजिएगा, वो उसे कोट पर मेडल बनाकर चिपका लेगा, और कहता फिरेगा कि देखो ये कितना बड़ा अचीवमेंट है।

आपने राममंदिर कहा, और उधर आपको हिन्दूविरोधी का तमग़ा देकर भाजपा ने राहुल गाँधी के मंदिर भ्रमण से कमाए चुनावी पुण्य को दूषित कर दिया। ये एक नशा है, कसमसाहट है कि कभी हम वहाँ होते थे, ये कैसे पहुँच गया। ये शब्द वैसी सोच के पर्याय हैं कि हमारे बाप के संसद में कोई और कैसे पहुँच गया। ऐसे बिना सोचे-समझे बोले जाने वाले शब्द इसी बात के परिचायक हैं कि सत्ता अचानक से चले जाने से, जब आप कानून मंत्री से एक वक़ील भर रह जाते हैं, और सामने ऐसा केस हो जिसे आप लगभग हारने वाले हों, तब बिलबिलाहट होती है।

मणिशंकर अय्यर ने औरंगज़ेब वाली बात कहकर जो घागे का सिरा पकड़ाया था, वो आज मोदी को ‘नीच’ कहकर खींचने को दे दिया। और जब धागा मोदी को दे रहे हो, तो नंगे होने को लिए तैयार रहो। राजनीति में शब्द ही बात बनाते और बिगाड़ते हैं। जुमलों से लोग सत्ता पाते हैं, और अभिव्यक्ति में पिछड़ने पर सत्ता गँवाते हैं।

तुम मोदी को नीच कहोगे, वो अपनी तमाम आइडेंटिटीज़ से ‘नीच’ को जोड़कर भुना लेगा कि देखो एक गरीब आदमी को नीच कह दिया, देखो हमारी जाति को नीच कह दिया, देखो गुजराती को नीच कह दिया, देखो ओबीसी को नीच कह दिया… अब सँभालते रहो कि क्या कहा, कैसे कहा।

अय्यर क्या इतने मासूम हैं कि वो कह देंगे कि उनकी हिन्दी खराब है और लोग मान लेंगे? जब हिन्दी खराब है तो बोलते ही क्यों हो? ये खराब हिन्दी नहीं, खराब सोच है कि आपको इस स्तर तक उतरना पड़ता है कि किसी के जन्म को, किसी के कर्म को आप हीन मानते हैं। ये एलिटिस्ट मानसिकता का उदाहरण है कि मैं कहाँ था, क्या हो गया, वो कहाँ था, क्या हो गया…

अब राहुल गाँधी की टीम, पहले से कहीं बेहतर स्तर से, इस बात को नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रही है। सबसे पहले तो अय्यर से माफ़ी माँगने को कहा, ये कहते हुए कि भाजपा जैसी भी है, हम विरोधियों का सम्मान करते हैं। ये बात और है कि ‘ज़हर की खेती’ से लेकर तमाम ‘सम्मानसूचक’ शब्द उनकी पार्टी के नेता और माता समयानुसार कहते रहे हैं।

टीम बदलने से ये बदलाव ज़रूर हुआ है कि कॉन्ग्रेस की बयानबाज़ी में एक रिस्पॉन्सिबिलिटी दिखने लगी है। अब ये लोग ग़लतियाँ मान लेते हैं, और उसमें भी हास्य ढूँढ कर खुद पर हँस लेते हैं। ये बात राजनीति से गायब होती दिख रही थी। पहले वो अकड़ते थे, फिर सत्ता से बहुत दूर होने पर, अकड़ ढीली हुई है। नकली आक्रामकता की जगह भाजपा के ही रास्ते से ये आगे बढ़ रहे हैं। बिज़नेस में एक टर्म होता है रेप्लीकेट करना, कि अगर कोई सक्सेस स्टोरी है, तो बिना काम का इनोवेट करने के अलावा दूसरा रास्ता रेप्लीकेट करना भी है।

राहुल गाँधी की टीम ने अय्यर साहब से माफ़ी भी मँगवा ली और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा का स्टंट भी कर दिया है। अध्यक्ष बनने से पहले ‘इतना कड़ा रुख़’ उन्हें सूट करता है कि नहीं, मुझे नहीं पता, लेकिन डैमेज हो गया है और गुजराती लोग मोदी की बात शायद ज़्यादा सीधे तरीक़े से समझेंगे कि अय्यर ने उन्हें नीच कहकर पूरे गुजरात के ग़रीबों, दलितों, गुजरातियों को नीच कहा है।

जो भी बात हो, अय्यर साहब की टाइमिंग लाजवाब है। आचार संहिता के कारण अब इसका डैमेज कंट्रोल तो बस ट्विटर से ही हो सकता है। वो हो रहा है। ‘चाय वाला’ कहना लोकसभा चुनावों के समय एक बेहतरीन ‘उड़ता तीर’ बनकर आया था जो कॉन्ग्रेस के बैकग्राउंड में पैबस्त हो गया था। ‘नीच’ मोदी भी उसी तरह का ‘उड़ता तीर’ है जो राहुल गाँधी की नई जनेऊ काट देगा।

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