मॉस्को नाइट: पापा’ज़ बार में ‘यू आर जॉनी डेप’ एवम् ‘मेरे पास तेल का कुआँ होती’

तय हुआ कि मॉस्को आए हैं तो यहाँ की ‘नाइट लाइफ़’ का भी आनंद लिया जाय वरना महामहिम पुतिन को बुरा लग जाएगा। हम तीन मित्र, मैं, भारी बर्बाद डीके और बहुत ज़्यादा अमीर कबीर जी, गूगल पर छानबीन करने लगे कि पास में कौन सा बार है। मुझे याद आया कि मेरी एक रूसी मित्र क्सेनिया यहीं मॉस्को से ही है, तो उससे पूछना उचित रहेगा।

उसने बताया कि पापा’ज़ नज़दीक भी है, और अच्छा भी। निकल लिए हमलोग। ऊबर वाला दो बार 12-12 मिनट करके टाइम बढ़ाता रहा। फिर मैंने विचार दिया कि पैदल ही चला जाय गूगल मैप के सहारे। यहाँ गूगल मैप और ट्राँसलेटर इतना जान बचाता है कि क्या कहूँ! चलने लगे, और फिर एक ट्राम दिखा। हमारी इच्छा थी कि यहाँ के ट्राम का भी आनंद लें।

चढ़ गए, तो गेट पर, ट्राम के अंदर ही, मेट्रो टाइप कार्ड सटाकर घुसने वाला गेट था। हमारे पास कार्ड नहीं था, और पास में कोई कंडक्टर भी नहीं दिखा। रूसी लोग सटा-सटाकर निकल लिए। हमलोग ड्राइवर के बंद केबिन के पास खड़े रहे। कंडक्टर था नहीं, भाषा आती नहीं थी, तो लगा कि टिकट पहले बुक करना होता होगा। फिर एक स्टेशन बाद बिना टिकट के उतर गए। मन ही मन बेइज़्ज़त टाइप का फ़ील हुआ सो अलग।

फिर ऊबर बुक किया तो फिर से 14 मिनट का इंतज़ार! मैंने फिर सुझाव दिया कि चलते रहना चाहिए। चलते रहे। ठंढ ऐसी थी कि… (वाक्यांश लगा लीजिए अपने हिसाब का)। एक पुल आने पर मेरे दोनों मित्रों ने तय किया कि ये सिगरेट पीने की जगह है, और ठंढ भी बहुत ज्यादा है, “अजीत जी, आप ऊबर बुक कीजिए तब तक।” ऊबर बुक किया, तो चार मिनट का इंतज़ार बताया। थोड़ी देर में कार आ गई।

हम पहुँचे ‘बाप के बार’ में। हमने सबसे पहला गोल मेज़ लूट लिया और बैठ गए। बीयर और कोका कोला मँगाया गया, साथ में कुछ चिकन, वेज सैलड और स्कोडा लहसुन। बीयर तो महँगा मिलता है बार में, ये मुझे पता था लेकिन 10 रूपए वाली 250ml की कोक 225 रूबल (1 रूपया=1.1 रूबल) देख के मेरा दिमाग झनझना गया।

मैंने मित्रों के सामने आवाज़ बुलंद की कि ये क्या बकवास है, मैं नहीं पीऊँगा। कबीर जी ने कहा कि पैसे की चिंता मत कीजिए, और इन्ज्वॉय कीजिए। मुझे अपने किसान पिता की याद आने लगी तो बताया गया कि इमोशनल होने का हक़ सिर्फ पीनेवालों को होता है। मुझे ये कहकर शांत कराया गया कि ‘बार में ऐसा ही होता है, चिल मारिए’। ऐसा नहीं है कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन किसी चीज का मूल्य दस गुणा ज़्यादा लिया जाता हो, तो मैं विचलित हो जाता हूँ। जैसे कि दिल्ली में सिनेमा देखने जाने पर, मैं मर जाऊँगा लेकिन पॉपकॉर्न नहीं ख़रीदता। पानी भी अगर बीस की जगह चालीस का दे तो मैं पीता ही नहीं।

ख़ैर, बैठ कर पी-खा रहे थे और मेरी वेशभूषा तथा शक्ल के कारण मैं कई लोगों में कौतूहल का विषय बन रहा था। कुछ लड़कियाँ मुझे देखकर बिना काम के मुस्कुरा रही थीं, कोई मेरी नज़र मिलते ही शरमा के अपनी दोस्त से गिगलिंग करते हुए बतियाने लगती थी, तो कोई घूरकर फ़ील करा रही थी कि मुझे घूरा जा रहा है। मेरी पीठ बार काउंटर की तरफ थी और बार के दोनों तरफ़ के लोग मुझे दाहिने या बाएँ तरफ़ से देख पा रहे थे।

कुछ देर में एक मोहतरमा अपने एक पुरुष और एक महिला मित्र के साथ बीयर लेकर हमारे टेबल तक आ गईं। कहने लगीं, “ओ माय गॉड! यू आर जॉनी डेप?” मैंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है, मैं भारतीय राष्ट्रवादी टूरिस्ट हूँ। उसने फिर दस मिनट तक हमारे टेबल पर तमाम बातों कह डालीं कि उसके देश में आने पर हमारा स्वागत है, और आशा की कि हमें कोई परेशानी न हो रही हो। फिर कहने लगी कि अगले दिन वो भारत जा रही थी, गोवा में नया साल मनाने।

मैं मुस्कुराता नहीं तो और क्या करता! मैं मंद-मंद मुस्कुराता रहा। वो बोलती रही कि उसके ऑफ़िस की एक छोटी सी कॉरपोरेट पार्टी है और वो मेरे, तथा मेरे दोस्तों के साथ नृत्य करना चाहेगी। मैं मुस्कुराता रहा। उसने फिर अंग्रेज़ी में कहा, “देखो ना! डीजे हमारे मतलब के गाने नहीं बजाता। उसने कहा है कि अगर मैं दो तीन और लोगों को ले आऊँ तो वो बेहतर गाने बजाएगा। आप चलिए न हमारे साथ डान्स फ़्लोर पर…”

मेरे सामने आधा तला हुआ मुर्गा पड़ा था, जिसकी क़ीमत छः सौ रूबल थी। निर्मोही आदमी तो हूँ ही, सो मैंने कहा, “आपलोग चलिए, मैं एक घंटे बाद खाना ख़त्म करके ज़रूर आऊँगा।” उसने फिर से एक बार आग्रह किया, और मैंने फिर से मना कर दिया कि मैं ‘बाद’ में आऊँगा। और ये बात भी सच है कि मैं बाद में गया भी, लेकिन वो लड़की वहाँ नहीं थी। मैं डान्स तो कर ही लेता, लेकिन चिकन ज़्यादा ज़रूरी था।

ख़ैर, तब तक वर्जिन-सम्राट डीके को हमारे कबीर भाई ने ढाढ़स और हिम्मत दिया कि यहाँ वो किसी को बीयर के लिए पूछ सकते हैं। डीके ने कहा, “हय! सच्चो? किसी को भी?” कबीर जी ने कहा कि ढूँढ लीजिए और पूछ लीजिए, ज़्यादा से ज़्यादा नकार दिए जाएँगे और क्या। बात सही थी। डीके ने हिम्मत जुटाई और सामने की एक मोहतरमा के पास जाकर बैठ गए। फिर पूछ दिया कि क्या वो उसके लिए एक बियर ख़रीद सकते हैं।

उसने हाँ कर दी। और डीके उठकर हमारे पास आया। हमने पूछा कि यहाँ क्या करने आए हो? बोला, “अरे पैसा नहीं है महाराज! रूबल लाइए जल्दी!” कबीर जी ने बड़े भाई की तरह हज़ार-हज़ार के पाँच-दस नोट दे दिए और कहा, “आनंद में कमी नहीं होनी चाहिए, शर्माइए मत, जमकर लहरिया लूटिए। जय मिथिला, जय विद्यापति!” डीके उसके बाद मोहतरमा के साथ हर सिप पर ग्लास टकराकर पी रहा था। इस पूरे वाक़िये में कोई ड्रामाटाइजेशन या मसाला नहीं है, सिवाय ‘जय विद्यापति’ वाली बात के।

इधर ‘यू लुक लाइक जॉनी डेप’ का काण्ड बार-बार हो रहा था। मैं पछता रहा था कि कहाँ बैठ गया हूँ मैं! थोड़ देर बाद तीन तंदुरुस्त लौंडों का ग्रुप आया। उनमें से एक कबीर जी के पास गया और कान में धीरे से बोला, “जॉनी डेप? आई वान्ट फोटो।” कबीर जी शाकाल वाले लुक में रहते हैं, तो उनको बाउंसर या पता नहीं दोस्त या कुछ और समझ के पूछा हो। फिर एक ने हिम्मत जुटाई, “हे जॉनी! फोटो?” और वो फोन निकाल कर सेल्फ़ी लेने का इशारा करने लगा। मैंने मुस्कुराते हुए हाँ कह दिया और फिर वो लोग नकली जॉनी की तस्वीर लेकर खुश हो गए। आते-जाते तीन बार थम्सअप करते हुए गए।

तब तक डीके अपने जलवे बिखेर रहा था। बाहर सिगरेट के लिए निकला तो कहने लगा, “अरे! हम बोले कि हम अबू धाबी में बिज़नेसमैन हैं, और तेल का कुआँ है मेरे पास। मेरे पास तेल का कुआँ होती! आगे पूछी तो बोले कि लंदन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस से पढ़ाई की है, और रूस साल में दो बार आता हूँ।” हम और कबीर जी माथा पकड़-पकड़ के हँस रहे थे। आस-पास खड़े लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। उसी दौरान मैंने एप्पल जूस ऑर्डर किया था, और उसमें बारटेंडर ने पाइप डालकर दिया था। मैंने पाइप निकाल दिया था ताकि वो व्हिस्की टाइप दिखे। ऐसा मैंने क्यों किया मुझे याद नहीं।

कुल मिलाकर ये रात बहुत सही गुज़री। डीके ने क़रीब सात बीयर उतारने के बाद, बार से बाहर, जो भी लड़की मिलती उसे ये कहता रहा, “मैं अरब का शेख़ होती, मेरे पास अबू धाबी में तेल का कुआँ होती।” फिर एक सीरिया की लड़की से सिगरेट माँगकर वही कहानी सुनाने लगा। मैं और कबीर जी हँस-हँसकर पागल हुए जा रहे थे।

अंततः, बार में डीके को मिली यूक्रेन की लड़की बाद में डीके की मित्र बन गई और शराब का नशा उतरने के बाद भी उसने कॉल किया, और मिलने आई। ये अपने आप में एक अच्छी बात थी। आगे क्या हुआ, वो यहाँ बताने में मुझे लज्जा आती है।

पीएस: अगले पोस्ट में ‘स्ट्रिप क्लब’ में जाने का वर्णन होगा।….

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