NSFW: एकांकी: हमको चाहिए आजादी

(पट खुलता है, और नैपथ्य से नारेबाज़ी की आवाज़ें आती हैं।)

एक आवाज़: बस्तर को चहिए
सारे: आजादी
एक आवाज: अरे केरल माँगे
सारे: आजादी
एक आवाज: पंजाब को चाहिए
सारे: आजादी

(अचानक पिटाई की आवाज़ें आती हैं। और भगदड़ मच जाती है। कुछ लोग भागते भागते स्टेज पर पहुँचते हैं जो कि किसी ढाबे जैसा है। वहाँ इधर-उधर पत्थरों पर बेठने की जगह है।)

कॉमरेड अनमोल रतन: सरदार लोग धो दिया यार! इतना तो बलात्कार की अभिव्यक्ति के बाद भी नहीं पिटे थे।

कामरेड मुखर्जी: भोंसड़ी के! ‘पंजाब माँगे आजादी’ कौन बोल दिया?

अनमोल: अरे हमको लगा कि बस्तर, कश्मीर, केरल आदि बोल ही रहे हैं तो पंजाब बोलने में क्या है?

मुखर्जी: तुमको ऐसा ही लगा होगा कि हर लड़की पास बूब्स और वजाइना है तो रेप कर लें, इसीलिए कर लिए! चूतिया साला!

अनमोल: अरे नहीं कामरेड, वो तो जब बताई कि उसके पास फ़िल्म की सीडी है और प्रोफ़ाइल देखे तभी से हमको प्यार हो गया। आई तो बोले कि स्त्री का शरीर कम्यून की प्रॉपर्टी है। उसे हमारे हवाले कर दे। बहुत बात समझाए, मार्क्स और एंगल्स भी बताए। ये भी बताए कि क्रांति का मार्ग सेक्स से होकर ही जाता है। लेकिन वो क्रांति में अपना सहयोग नहीं दे रही थी।

मुखर्जी: ये तो ठीक समझाया तुमने। लड़कियाँ पता नहीं क्यों अपनी वजाइना को इज़्ज़त से जोड़ देती है। वो तो बस एक अंग है, जैसे हाथ है, पाँव है… इनको फर्स्ट इयर में फ़्री का दारू पिला कर इतना समझाते हैं कि सेक्स के बंधनों से ऊपर उठो। बाप कहे कि शादी करो, तो तुम चार लौंडे से सेक्स करो। शादी बंधन है, सेक्स ही मुक्ति का मार्ग है…

अनमोल: वही तो! हम समझाते रहे। लेकिन वो थी कि सीडी देकर जाने के लिए उतावली थी! इस पितृसत्तात्मक समाज में वापस जाना चाहती थी। मैं उसे इस समाज के ढकोसलों से, बंधनों से मुक्त करना चाहता था। फिर मुझे लगा कि कभी-कभी बीमार को डॉक्टर की नसीहत समझ में नहीं आती, लेकिन डॉक्टर तो ऑपरेशन करता है ना बेहोश कर के। हम भी बेहोश कर के उसको मुक्त कर दिए! लेकिन एक बात बोलें, अगर वो जगी रहती ना तो वो देख पाती कि मुक्ति का मार्ग, इस पितृसत्ता की ज़ंजीरों से अलग होना कितना आनंददायक है…

(कहते कहते कामरेड अनमोल रतन खड़ा हो गया और साथ ही उनके पजामे में भी उभार आ गया। ये देखते हुए मुखर्जी ने उसका हाथ खींचकर वापस बिठाया।

मुखर्जी: अरे बैठो कामरेड! लेकिन तुमको रेप नहीं करना चाहिए था।

अनमोल: काहे? हमलोगों को तो पहले ही दिन ये सिखाया गया था कि सेक्स और क्रांति समानांतर चलते हैं। और हम तो ये कोई पहला बार नहीं किए। बेहोश करके पहले भी पितृसत्ता के बंधनों से तीन को मुक्त कर चुके हैं।

मुखर्जी: लड़की को बेहोश करने से बेहतर था कि तुम अपने तर्कों से उसका मन मोह लेते! तुम उसको ठीक से समझा नहीं पाए! इतने ऊँचे पोस्ट पर हो और एक लड़की को सेक्स के लिए समझा नहीं पाए। इस साल ‘इण्डक्शन’ में पूरी सभा की लड़कियों को क्रांति में सेक्स सहयोग देने के लिए कैसे तैयार करोगे? और तुम तो जानते हो कि हमारी सारी क्रांति सेक्स के फल्क्रम पर ही टिकी है। समझा कर उसी वक्त कर लो। जब तक उसको पता चलेगा रेप हो गया है, और अगर सुबह बताएगी तो हमारे कामरेड सब तो ‘विक्टिम शेमिंग’ में आगे रहते ही हैं। फिर बाबा लोग समझा देंगे कि एक बलात्कार पीड़िता को ये पितृसत्तात्मक समाज कैसे देखता है। शर्म के मारे मर जाएगी। फिर भी नहीं मानेगी तो उसको रंडी बनाकर बदनाम कर देंगे…

अनमोल: ये सब याद था कामरेड! लेकिन उस वक्त हमको थोड़ी जल्दी थी। हमारा एक समस्या है…

मुखर्जी: क्या समस्या है?

अनमोल: अरे शीघ्रपतन का… और लड़की के सामने हो जाता तो प्रेज़िडेंट का सारा रुतबा निकल जाता। तो हमको लगा कि पटक के पेल ही दें! एक बार फिर जाते-जाते बोले कि कोल्ड ड्रिंक तो पी लो। उसी में मिला दिए और फिर…

मुखर्जी: अच्छा छोड़ो…

(तभी कामरेड भट्टाचार्य आते हैं और पत्थर पर बैठे चार पाँच लोगों से, जो थोड़े दूर हैं, दस-पाँच रूपया माँगकर जमा करते हैं।)

मुखर्जी: लाल सलाम कामरेड भट्टाचार्य! कुछ माल-वाल है कि ऐसे ही?

भट्टाचार्य: लाल सलाम भोंसड़ी के! माल क्या झाँट से तोड़ लें? ख़रीदना पड़ता है।

अनमोल: ये क्या! हमारे जाते ही ‘लाल सलाम कामरेड’ की जगह ‘लाल सलाम भोंसड़ी के’ हो गया? बहुत बदलाव हो गया…

(भट्टाचार्य और मुखर्जी दोनों ने उसकी तरफ एक हीनता के भाव से देखा और इधर-उधर थूक दिया)

भट्टाचार्य: (दूर बैठे लोगों से) लाल सलाम कामरेड, थोड़ा ज्वाइंट मारने के लिए योगदान चाहिए था।

(दो तीन लोग दस और पाँच के नोट, सिक्के आदि देते हैं। उसे गिनने लगता है। फिर एक जगह जाकर बोलता है।)

भट्टाचार्य: बीस रुपया और घट रहा है। कामरेड, आप दे दीजिए तो मलाना क्रीम मिल जाएगा।

एक आवाज: भक् माधरचोद! भिखमंगा साला, भाग यहाँ से!

भट्टाचार्य: अरे आप तो ग़ुस्सा हो गए कामरेड। मैंने तो बस अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत आपसे एक विनती की थी। आप तो निहायत ही गुंडई पर उतर आए।

एक आवाज: हम दिखाएँ अपनी अभिव्यक्ति? साले देह तोड़कर हाथ में रख देंगे। भाग यहाँ से।

(भट्टाचार्य भागता हुआ अनमोल और मुखर्जी के पास पहुँचता है।)

भट्टाचार्य: साला फासीवादी सरकार के लोग पूरे यूनिवर्सिटी में फैल गए हैं। एक तो पैसा भी नहीं दिया और गरिया के भगा दिया।

मुखर्जी: तो गाली सुनना कौन सी नई बात है। हमलोग तो उसमें माहिर हैं। आप भी गरिया लेते।

अनमोल: हाँ! गाली क्या, ये लीजिए कट्टा, मार दीजिए गोली साले को। ये आरएसएस वाले दो चार मर भी जाएँ तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। जाईए, धर दीजिए साले के माथे में। लाल सलाम हो जाएगा।

भट्टाचार्य: वो तो ठीक है। लेकिन वहाँ मारेंगे जहाँ हमारे लोग ज्यादा हों। केरल में देखते हो? हर सप्ताह एक को काट रहे हैं। लेकिन उस साइड में साला फासीवादी सब बैठा हुआ है। उनको भी ढाबा का लत लग गया है। एक ज्ञापन देकर इन सालों को यहाँ बैठने से रुकवाना पड़ेगा। ये लोग हमारी जगहें घेर रहे हैं। ऐसे ही बढ़ते रहे तो क्रांति कैसे आएगी? बीस रूपया है किसी के पास?

अनमोल: हाँ है।

भट्टाचार्य: ये लो पैसे और बाहर से जाकर मलाना क्रीम ले लेना। और ठीक से देखना, साला सब घोड़ा का लीद मिला कर देने लगा है। इसीलिए कामरेड लोग आजकल ज्यादा फँसने लगे हैं। बढिया गाँजा पीते तो साला रेप केस में फँसते? यहाँ हर रात रेप होता है, कभी सुने हो किसी को फँसते हुए। ठीक से ट्रेनिंग नहीं मिला है तुमको। लेकर आओ तो तुमको सिखाते हैं।

(अनमोल पैसे लेकर चला गया। उसके जाते ही भट्टाचार्य ने गाँजा निकाला और रोल करने लगा।)

मुखर्जी: अरे था ही तो उसको काहे भेजे?

भट्टाचार्य: उसको ये पचेगा नहीं। लो रोल करो। (मुखर्जी ने पेपर लिया और गाँजा को मसलने लगा।) सीड सारा ठीक से निकालना। मान लो कि सीड जो है आरएसएस एजेंट है। इनको कुचल के, अलग करो और फेंक दो।

मुखर्जी: कामरेड आपके साथ बैठने का अलग ही आनंद है। अच्छा ये रामजस वाला काण्ड पर आपका क्या कहना है?

भट्टाचार्य: उसमें साले ये सब चूतिए चले गए। इनको पता नहीं कि डीयू अलग जगह है। वहाँ हमारे लोग बहुत कम हैं, ना के बराबर। अब बताओ कि आइसा और एसएफआई वाले खुले आम रॉड लेकर घूम रहे थे। और ऊ साला प्रशांत मुखर्जी! वो तो फोटो में थप्पड़ मारता ‘द हिन्दू’ में छप गया है। तुम्हारा ही जात-भाई है ना? वो तो भला हो ‘हिन्दू’ वालों का कि उसका फोटो लगाकर नीचे एबीवीपी लिख दिया है।

मुखर्जी: वो तो है! नैरेटिव तो अभी भी हम ही डोमिनेट करते हैं कामरेड। देखिए कैसे पेपर में हर जगह एकदम से राइट-लेफ्ट हो रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी… ही ही ही! साला अपने लौंडों ने जो बवाल काटा है कि क्या कहें। वो तो हमारे पत्रकार लोग थोड़े सजग हैं कि मारपीट की ठीकड़ा फासीवादियों पर फोड़ते हैं, तो हमलोग तो पाक साफ़ निकल गए और उनको गाली पड़ रही है…

भट्टाचार्य: वो सब मैनेज करना पड़ता है। ये सब पत्रकार, एकेडमिशियन, रिसर्चर दशकों से हमारी मलाई खाते आए हैं। और हमने वामपंथ को इतना कूल बना दिया है कि हमारा नरसंहार भी एक से ज्यादा दिन कहीं चर्चा में नहीं आता। रामजस देखो एक सप्ताह से चल रहा है ना? दाँतेवाड़ा कै दिन चला था? इसको कहते हैं मैनेजमेंट।

मुखर्जी: ये तो बिल्कुल सही बात है। अच्छा आप कभी बस्तर गए हैं?

भट्टाचार्य: बस्तर? हम तो ख़ाली बिस्तर पर जाते हैं, नई-नई कमसिन कामरेडाइन के साथ… ही ही ही

मुखर्जी: हा हा हा! वो तो है, हमारे लिए भी कुछ इंतजाम कीजिए ना? ये आजादी वाला नारा लगाने में साँस फूल जाता है हमारा।

भट्टाचार्य: नारा लगाते रहो। ये फासीवादियों की साज़िश नहीं चलने देंगे। कन्या का इंतजाम हम कर देंगे। आज बुलाए हैं किसी को, कमरे में रहना। हमारे बाद तुम भोग लेना। और हाँ, कॉन्डोम अपना लाना। ये नहीं कि हमारा वाला ही धो के पहन लिए समाजवाद के नाम पर…

मुखर्जी: इतना चूतिया थोड़े हैं! जिस दिन मेंबर बने थे उसी दिन दस का पैकेट ख़रीद लिए थे। पैसे का कोई टेंशन नहीं है। बस शक्ल ऐसा है कि कोई देना नहीं चाहती।

भट्टाचार्य: पैसा है तो ई घिसा हुआ चप्पल और झोला काहे लेकर चलते हो? वुडलैंड का ले लो ग्लैडिएटर सैंडल। लगता है सिला हुआ, होता है मस्त। झोला भी डिज़ाइनर रखो। बोलो कि फलाने ट्राइब के लोग हाथ से बनाते हैं। ये सब कब सीखोगे? लाओ, हजार रूपया दो हमको? हजार का तो नोट भी नहीं होता अब! ठीक है दो हजार दे दो।

मुखर्जी: काहे? दो हजार रूपया का क्या करेंगे?

भट्टाचार्य: अरे, रात में आओगे कि नहीं। तो वहाँ क्या दारू-चखना भी हम ही लाएँ? तुम ख़ाली हिलाते हुए आ जाओगे? आ जाना टाइम से मेरे हॉस्टल में।

(दोनों खड़े हो गए। मुखर्जी ने दो हजार का नोट निकाल कर दे दिया। भट्टाचार्य ने गाँजे के ज्वाइंट का एक लंबा कश लिया और मुँह ऊपर कर के आगे जाने लगा।)

मुखर्जी: (आँख में चमक लाते हुए) तो आज हो जाएगा ना काम?

भट्टाचार्य: अरे बिल्कुल! फर्स्ट ईयर की है। क्या कहें कि कैसी है। बहुत दिन से कॉफ़ी पिलाते रहे हैं। पूरा मैनिफेस्टो समझा दिए। तब जाकर मानी है। उसको विश्वास हो गया कि देह क्षणभंगुर है, आत्मा अमर है। और जब तक आत्मा को स्वतंत्र नहीं करेगी, तब तक देह इस घृणित पितृसत्तात्मक समाज के बंधनों में बँधी रहेगी।

मुखर्जी: रुकिए एक मिनट! देह-आत्मा-बंधन वाली बात लिख लेते हैं। अगली बार काम आएगा।

(दोनों हँसते हैं। अँधेरा हो जाता है। नैपथ्य में भट्टाचार्य की आवाज में एक गीत सुनाई देता है: साँवली सलोनी तेरी झील सी आँखें, इनमें ना जाने कहाँ खो गया है मेरा दिल। दोनों के गिगलिंग की आवाज आती है।)

पटाक्षेप

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